बिजनेस स्टैंडर्ड - बेहतर जीएसटी
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बेहतर जीएसटी

संपादकीय /  October 09, 2017

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर छोटे कारोबारियों और निर्यातकों में असंतोष के बीच जीएसटी परिषद ने शुक्रवार को व्यापक बदलावों की घोषणा की। इन निर्णयों के पीछे मुख्य बात थी निर्यातकों के लिए नकदी की स्थिति बेहतर बनाना। निर्यातक जीएसटी की प्रक्रिया में अपना पैसा फंसने से परेशान थे। छोटे कारोबारियों के लिए अनुपालन लागत में कमी एक मजबूत कदम था क्योंकि यह लागत उत्पन्न राजस्व से कतई मेल नहीं खाती थी। प्रधानमंत्री ने इन उपायों को करदाताओं के लिए दीवाली का पहले दिया गया तोहफा बताया और कहा कि उनकी सरकार कारोबारियों को लालफीताशाही, नौकरशाही और फाइलों में उलझाना नहीं चाहती। यह एक स्वागतयोग्य बात है क्योंकि भारत को एक सहज और आसान अनुपालन वाली कर व्यवस्था की जरूरत है जिसकी अनुपालन लागत बहुत अधिक नहीं हो। क्योंकि ऐसा होने पर छोटे उद्यमों की उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक असर होता है। एक सामान्य उपाय जो पूरे देश में अपनाया जा सकता है वह यह है कि रिटर्न की फाइलिंग के लिए सबको अधिक समय दिया जाए। जीएसटी परिषद ने इसे मान लिया है। परिषद ने कहा है कि सालाना 1.50 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले उद्यमों को केवल तिमाही रिटर्न दाखिल करना होगा। पहले यह मासिक था। 

 
निर्यातकों के लिए पिछले कुछ वर्ष काफी कठिन सिद्घ हुए हैं। बुनियादी ढांचा संबंधी अधिकांश गतिरोधों को किनारे करके देखा जाए तो हाल के वर्षों में निर्यात में वृद्घि कमजोर पड़ी है। इसके लिए वैश्विक मांग में कमजोरी भी एक वजह है। इस वर्ष वैश्विक व्यापार प्रवाह में सुधार नजर आया लेकिन निर्यातकों को रुपये की मजबूती ने परेशानी में डाले रखा। जीएसटी का लागू होना वांछित था लेकिन इसकी वजह से हालत और खराब हो गई। निर्यातकों ने अनुमान जताया कि उनकी लागत 1.25 फीसदी बढ़ गई। इससे उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रभावित हुई और कपड़ा, विनिर्मित वस्त्र तथा चमड़े का सामान जैसे कम मुनाफा मार्जिन वाले क्षेत्रों में उनका मुनाफा प्रभावित हुआ। निर्यातकों को सबसे अधिक समस्या कर रिटर्न हासिल करने में हो रही देरी की वजह से हुई। जीएसटी के अधीन पहले उनको समेकित जीएसटी चुकाना होता था और उसके बाद वस्तु का निर्यात हो जाने के बाद रीफंड की प्रतीक्षा करनी होती। छोटे निर्यातकों को बॉन्ड भरने होते और स्थानीय कमिश्नर के समक्ष शपथ प्रस्तुत करनी होती। इसकी वजह से कार्यशील पूंजी का जबरदस्त संकट पैदा हो रहा था। एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी के लागू होने से करीब 65,000 करोड़ रुपये मूल्य का निर्यात रुक गया। निश्चित तौर पर अक्टूबर के अंत तक ऑर्डर बुक में 15 फीसदी की कमी आई। यही वजह है कि जीएसटी परिषद का ताजा निर्णय छोटे कारोबारियों और निर्यातकों की समस्या को हल करेगा। हालांकि ई-वॉलेट योजना के विस्तृत ब्योरे की अभी प्रतीक्षा है। ये उपाय यह भी बताते हैं कि जीएसटी की व्यवस्था को कर व्यवस्था में सामंजस्य बनाने में कुछ वक्त लगेगा। आधी-अधूरी कर व्यवस्था लागू करने से यह बेहतर है कि इसे आराम से सुधार के साथ व्यवस्थित होने दिया जाए। 
 
कई दरों के रूप में एक बड़ी समस्या अभी भी विद्यमान है। कई कारोबारी 27 वस्तुओं की दरों में कमी से संतुष्टï हैं लेकिन जीएसटी का मूल उद्देश्य ही था दरों में वस्तु आधारित बदलाव को रोकना। इसके अलावा उसका उद्देश्य ऐसी दरें तय करना था जो तार्किक और अनुमन्य हों। फिलहाल एक ही श्रेणी की वस्तुओं के लिए कई दरें हैं। यह अतार्किक है। परिषद को दरों की संख्या तो कम करनी ही चाहिए, साथ ही उन्हें तार्किक भी बनाना चाहिए ताकि एक व्यापक श्रेणी के सभी उत्पाद एक कर दर के अधीन हों। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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