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पाकिस्तानी सियासत के मिजाज को बदल सकते हैं दक्षिणपंथी दल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 08, 2017

हाल ही में पाकिस्तान के दो अधिकारियों से मुलाकात हुई जिनमें से एक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। क्या वर्ष 2018 में होने वाले आम चुनावों में गठबंधन सरकार बनने के आसार बन रहे हैं? इस सवाल पर उन्होंने हंसते हुए कहा कि साफ तौर पर कुछ कह पाना अभी जल्दबाजी होगी। उनकी हंसी ही उस संदेह को बयां कर रही थी कि पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नैशनल असेंबली में नवाज की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) को मौजूदा सीटें बरकरार रख पाना काफी मुश्किल होगा। फिलहाल उसकी 342 सदस्यीय असेंबली में 188 सीटें हैं। अगर अगले चुनाव में नवाज की पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है तो फिर क्या इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सत्ता साधने की स्थिति में आ जाएगी? इसका जवाब मिलता है कि पंजाब प्रांत पीटीआई का मजबूत गढ़ नहीं है लेकिन चुनाव होने तक काफी कुछ हो सकता है। शरीफ के खानदान पर लटक रही मुकदमों की तलवार कभी भी असर दिखा सकती है।
हालांकि इन दोनों में से सेवानिवृत्त अधिकारी अधिक मुखर थे। उन्होंने कहा कि अगर नवाज और उनके भाई शाहबाज शरीफ (पंजाब के मुख्यमंत्री) का आपसी मनमुटाव खत्म नहीं होता है तो इमरान को इसका फायदा होगा। शाहबाज और उनके परिवार ने एक भी चुनावी सभा में शिरकत नहीं की जिससे पूरा जिम्मा नवाज की बेटी मरयम शरीफ पर ही आ गया था। माना जा रहा है कि मरयम ही आगे चलकर नवाज की सियासी वारिस बनेंगी। उन्होंने कहा कि अगर अगले चुनाव में गठबंधन सरकार के हालात बनते हैं तो कट्टïरपंथी तत्त्वों को भी उसमें जगह देनी होगी। अगर ऐसा होता है तो भारत के साथ बातचीत बहाल होने के मौके लगभग खत्म ही हो जाएंगे।
उनका यह आकलन लाहौर सीट पर पिछले महीने हुए उपचुनाव के नतीजों पर आधारित है। वैसे तो नवाज की पत्नी कुलसुम नवाज ने यह सीट जीत ली है लेकिन 2013 की तुलना में पीएमएल-एन को मिले मत कम हुए हैं। पंजीकृत मतदाताओं की संख्या बढऩे के बावजूद उपचुनाव में मतदान फीसदी कम होने से पता चलता है कि नवाज पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते लोगों का उत्साह कम हुआ है। पाकिस्तान के चुनाव आयोग के मुताबिक पीएमएल-एन ने 2013 की तुलना में 11 फीसदी वोट गंवाए हैं जबकि पीटीआई को तीन फीसदी मत अधिक मिले हैं। हालांकि यह महज एक सीट का उपचुनाव था लेकिन 2013 में इस सीट का प्रतिनिधित्व उस शख्स ने किया था जो अगला प्रधानमंत्री बनने जा रहा था। ऐसी स्थिति में उपचुनाव में मतदाताओं का रुझान कम होना समझ में आने वाली बात है। फिर भी उपचुनाव में मतों का कम होना शरीफ खानदान के लिए अच्छी खबर तो नहीं ही है।
वैसे ये नौकरशाह पाकिस्तान में नागरिक समाज की तुलना में दक्षिणपंथी तत्त्वों के उभार को लेकर कम चिंतित दिखे। लाहौर उपचुनाव में दो निर्दलीय उम्मीदवारों को लेकर अधिक चिंता नजर आई। इसमें एक उम्मीदवार अभी तक गैर-मान्यता प्राप्त दल तहरीक लब्बाइक या रसूलअल्लाह पाकिस्तान (टीएलपी) का था जबकि दूसरा उम्मीदवार हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग का था। इस्लामी विद्वान मौलवी खादिम हुसैन रिजवी ने टीएलपी की स्थापना की है। मौलवी खादिम ने 2011 में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के आरोपी मुमताज कादरी का पुरजोर समर्थन किया था। मौलवी खादिम की राजनीति पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत से भरी हुई है और उसमें शिया और अहमदिया समुदायों के लिए भी जगह नहीं है। वहीं हाफिज सईद अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर जमात-उद-दावा की सामाजिक शाखा फलह-ए-इन्सानियत द्वारा किए जा रहे कार्यों का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।
वर्ष 2013 के चुनाव में दक्षिणपंथी दलों को कुल मतों का महज 1.8 फीसदी ही हासिल हुआ था। लेकिन 2017 में उनका मत प्रतिशत बढ़कर 10.4 पर जा पहुंचा है। इस तरह दक्षिणपंथी दलों के प्रति मतदाताओं का रुझान बढऩे के संकेत मिल रहे हैं। लेकिन पाकिस्तानी अफसरों का मानना है कि इन दलों के बीच आपसी खींचतान काफी अधिक है और उपचुनाव में भी उनका एक साथ नहीं होना इसका सबूत है। दरअसल सियासत का मिजाज ही ऐसा होता है कि कई दलों का एक साथ खड़ा होना मुश्किल है। इस वजह से पाकिस्तानी समाज में भले ही दक्षिणपंथी ताकतें तेजी से जड़ें जमा रही हैं लेकिन संसद के भीतर उनकी आवाज अभी कमजोर ही है और उन्हें अभी लंबा सफर तय करना है।
इससे पाकिस्तानी फौज और उसकी लड़ाइयों के बारे में क्या पता चलता है? अफगानिस्तान सीमा पर कुनार और फाटा इलाके में पाक फौज कट्टïरपंथी तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ जंग में उलझी हुई है। वहीं कश्मीर में पाकिस्तानी फौज आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को प्रशिक्षण और हथियार मुहैया कराती है। अगर अगले साल के चुनाव में पाक संसद के भीतर कट्टïरपंथी तबकों की तादाद बढ़ती है तो फिर पाकिस्तान की फौज का रवैया क्या होगा? इस सवाल का जवाब किसी भी अफसर के पास नहीं था।
यह संभव है कि ये दक्षिणपंथी ताकतें एकजुट नहीं हो पाएंगी और इसके चलते पीएमएल-एन उन्हें काबू में रख पाने में कामयाब हो जाए। लेकिन अगर नवाज की पार्टी खुद ही कमजोर होती है तो फिर क्या हालात होंगे? नवाज के दोबारा पार्टी अध्यक्ष चुने जाने से पार्टी नेताओं के भीतर चुनावी संभावना कमजोर होने की आशंका सता रही है। शरीफ हमेशा पीएमएल-एन के मुखिया नहीं बने रह सकते हैं लिहाजा वह अपनी बेटी मरयम को बड़ी भूमिका देने की योजना बना रहे हैं। वैसे पीएमएल-एन को यह अहसास हो गया है कि यह एकजुट होने का वक्त है, आपस में लडऩे का नहीं। आने वाले महीनों में समूचे दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के हालात खासे रोचक होने जा रहे हैं।

Keyword: PML-N, pakistan, दक्षिणपंथी,
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