बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रोत्साहन पैकेज से परे सोचने की जरूरत
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प्रोत्साहन पैकेज से परे सोचने की जरूरत

राहुल खुल्लर /  October 08, 2017

भले ही त्योहारी माहौल बन गया हो लेकिन इससे खपत में इजाफा होने की संभावना नजर नहीं आती। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं राहुल खुल्लर
बीते वर्ष से ही आर्थिक मोर्चे पर बुरी खबरों का सिलसिला चल रहा है। वित्त मंत्री पूरी बहादुरी से कहते रहे हैं कि ऐसी खबरों को तवज्जो न दी जाए। परंतु यह तरीका कारगर नहीं रहा है। अचानक सरकार ने रुख उलट दिया है और उसने प्रोत्साहन पैकेज की बात शुरू कर दी है। जाहिर है कि सब कुछ ठीक नहीं है।
आखिर हालात यहां तक कैसे पहुंचे? पहली बात, नोटबंदी का फैसला एक त्रासदी की तरह सामने आया। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी से जिन लक्ष्यों को हासिल करने की बात कही थी, वैसा तो कुछ हुआ नहीं, उलटे अर्थव्यवस्था की हालत जरूर पतली हो गई। उस वक्त ही यह बात साफ हो गई थी कि नोटबंदी निकट भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को ठप कर देगी। सबसे बुरी मार विनिर्माण क्षेत्र पर पड़ी है। समूचा अनौपचारिक क्षेत्र ठप हो गया है। कृषि क्षेत्र भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके बाद भी लंबे समय तक बुरी खबरों का सिलसिला चलता रहा।
इसके बाद बारी थी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की। असली समस्या थी इसे लागू करने के लिए चुने गए समय की। मैंने इस संबंध में दलील दी थी कि क्रियान्वयन को एक अक्टूबर तक टाला जा सकता है। मेरा मानना था कि ऐसा करने से कारोबारियों को खाता-बही की अपनी व्यवस्था में सुधार करने का वक्त मिल जाता और हम जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन) को भी भलीभांति परख लेते। वृहद आर्थिक मुद्दों की बात करें तो कुछ सवाल इस प्रकार हैं: आर्थिक उथल-पुथल का आकार क्या होगा, यह स्थिति कब तक बनी रहेगी और राजस्व संग्रह पर इसका क्या असर होगा? इस मोर्चे पर खबर अच्छी नहीं है। पहली बात, जीएसटीएन दबाव में है। कुछ कारोबारियों का कहना है कि वे सरकार से बेहतर तैयारी कर चुके थे। दूसरी बात, असंगठित क्षेत्र को दूसरी बार झटका लगा है। तीसरा, छोटे कारोबार परेशानी में हैं। चौथा, राजस्व लक्ष्य शायद पूरे न हो सकें। राज्य सरकारें पहले ही राजस्व के मोर्चे पर संघर्षरत हैं।
वर्ष 2014 के बाद से अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से गिरावट की ओर है। सरकार में बैठे लोगों के अलावा सबको मालूम था कि ऐसा होगा। एक के बाद एक दो झटकों ने जल्द सुधार की उम्मीदों की हवा निकाल दी। आने वाली कई तिमाहियों तक इन झटकों का असर बरकरार रहेगा।
समेकित मांग के मुख्य घटकों में खपत, निजी निवेश, सरकारी व्यय और शुद्घ निर्यात आदि शामिल हैं। ये सभी आर्थिक वृद्घि के वाहक हैं। सवाल यह है कि इन वाहकों को कौन गति देगा?
खपत व्यय यकीनन समेकित मांग का अहम हिस्सा है। समेकित वृद्घि में इसकी अहम भूमिका है। आय की अनिश्चितता और इसकी वृद्घि का एक नकारात्मक असर भी हुआ है। अब रोजगार जाने का जोखिम काफी बढ़ गया है। वहीं नए रोजगार मिलने की संभावनाएं बहुत सीमित हैं। आय को लेकर निराशा एक हकीकत है।
स्वाभाविक सी बात है कि लोग खपत को लेकर सचेत हैं। मनमाने ढंग से होने वाली खपत बुरी तरह प्रभावित हुई है। आय के क्षेत्र में बढ़ती असमानता को भी शामिल कर लिया जाए तो खपत में धीमेपन की यह भी एक वजह है।
विनिर्माण क्षेत्र का धराशायी होना रोजगार पर भारी पड़ा और खपत की मांग पर भी। असंगठित क्षेत्र पर भी यह बात लागू होती है। ग्रामीण क्षेत्र की मांग पर भी इन दोनों का असर हुआ है। एक बार फिर बचत करने वाले सोने का रुख कर रहे हैं। आयात के आंकड़े इसके गवाह हैं। सकल घरेलू अनुपात में खपत व्यय की हिस्सेदारी वर्ष 2016-17 की आखिरी तिमाही में कम हुई है। वर्ष 2017-18 की दो शुरुआती तिमाहियों में भी इसमें गिरावट देखने को मिली है। ऐसे में त्योहारी मौसम में भी खपत में तेजी नहीं दिख रही है। निवेश की मांग भी ठहरी हुई है। अतिरिक्त क्षमता और वाणिज्यिक अनिश्चितता के चलते नई पूंजी नहीं आ रही है। कम मुद्रास्फीति के चलते समायोजन के बगैर लाभ भी कम रहा और उसका असर निवेश के निर्णयों पर पड़ा है। कारोबारियों में कोई उत्साह नहीं है। ब्याज दरों के चलते पूंजी की लागत बढ़ी हुई है। इससे फंसे हुए कर्ज का आधार तैयार हो रहा है।
हाल की अधिकांश तिमाहियों में वृद्घि दर सरकारी व्यय के भरोसे रही है। इसमें स्थायित्व नहीं रहता। पहले पांच महीनों के दौरान अनुमानित राजस्व घाटे में भारी वृद्घि का अनुमान है। भविष्य के कर और गैर कर राजस्व की स्थिति संदेहास्पद है। इससे सालाना राजकोषीय घाटे की स्थिति बिगड़ सकती है। ऐसे में इस मोड़ पर प्रोत्साहन पैकेज एक ऐसी चीज है जिसके बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते। अगर ऐसा होता है तो राजकोष पर और दबाव पड़ेगा। यानी साल की आखिरी तिमाही में व्यय में कटौती के लिए तैयार रहिए। लब्बोलुआब यह कि आखिरी दो तिमाहियों की संभावनाएं अच्छी नहीं हैं।
शुद्घ निर्यात पर होने वाले खर्च को लेकर भी शुभ संकेत नहीं हैं। निर्यात तो बढ़ रहा है लेकिन आयात कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। वास्तविक विनिमय दर में इजाफा हुआ है। इससे प्रतिस्पर्धा का विनाश हुआ है। जीएसटी ने निर्यातकों की पूंजी रोक दी है। उन्होंने नए ऑर्डर लेने बंद कर दिए हैं। मुनाफे का मार्जिन लगातार कम हो रहा है। आने वाली तिमाहियों में निर्यात वृद्घि में कमी आ सकती है।
उच्च वास्तविक ब्याज दर के चलते कई तरह की समस्याएं पैदा हुई हैं। ब्याज दर के अंतर ने पोर्टफोलियो निवेश की आवक तेज की है। डेट पर प्रतिफल की तलाश में निवेश आ रहा है। दरों में धीमी इजाफे की संभावना देखते हुए कहा जा सकता है कि यह निवेश एकतरफा दांव है। विनिमय दर में आई तेजी ने निर्यात को प्रभावित किया है। इससे मोटे तौर पर यह भी पता चलता है कि शेयर बाजार परिसंपत्तियों में तेजी क्यों आ रही है। विनिर्माण को भी नुकसान हुआ है। एसएमई क्षेत्र पर बहुत बुरा असर हुआ है। ऋण की लागत में इजाफा हुआ है। ब्याज दरें ज्यादा होने के चलते कर्जदारों की लागत बढ़ी है। इसके चलते फंसे हुए कर्ज में इजाफा हो रहा है। आने वाली तिमाहियों में और भी बुरी खबरें सामने आ सकती हैं। खासतौर पर आर्थिक उत्पादन और वृद्घि के क्षेत्र में, राजकोषीय घाटे के मामले में, निर्यात में धीमापन आने और छोटे और सूक्ष्म उद्यमों तथा बैंकों के फंसे हुए कर्ज के मामले में। इस समय हमारी स्थिति ठीक नहीं है। परंतु आगे हालात और बुरे हो सकते हैं।
प्रेस से लेकर पेशवर अर्थशास्त्रियों और अब भाजपा के कुछ नेताओं तक ने आर्थिक प्रबंधन के तरीके की आलोचना की है। सरकार को अब चेत जाना चाहिए और प्रोत्साहन पैकेज से आगे सोचना चाहिए।
    (लेखक ट्राई के पूर्व चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)

Keyword: GST, economy, consumption,
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