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बाजार नियामक ने पहले जो कहा और जो अब बाकी रहा

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  October 06, 2017

अगर इस लेख को पढऩे के बाद आपको यह लगता है कि यह 'भारतीय वास्तविकताओं' के प्रति अव्यावहारिक और सैद्धांतिक दृष्टिकोण है तो ऐसा महसूस करने वाले आप इकलौते शख्स नहीं होंगे। फिर भी हमें यह कहना है कि हमारे नीति-निर्माताओं ने बाजार के प्रति निष्ठा के मामले में दोहरा रवैया अपनाया है। उन्होंने वित्तीय बाजारों के संदर्भ में सच्चाई बयां करने में हिचक दिखाई है जबकि बाजार से संबंधित फैसलों में यह बहुत ही निर्णायक अवयव होता है। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने गत 29 सितंबर को महज एक पंक्ति की प्रेस विज्ञप्ति जारी की। विज्ञप्ति के मुताबिक, 'सेबी की तरफ से 4 अगस्त 2017 को जारी परिपत्र के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाने का निर्णय लिया गया है।' 

 
सवाल उठता है कि 4 अगस्त के परिपत्र में क्या था जिसे लागू होना था? किन वजह से सेबी इन प्रावधानों को लागू करने जा रहा था और फिर किन वजह से उसे अनिश्चित काल के लिए रोक दिया गया? दोनों घटनाओं के बीच ऐसा क्या हुआ कि यथास्थिति बनी रही? यह लेख कानून-निर्माण की प्रक्रिया में अराजकता के बारे में नहीं है। असल में, कानून बनाने से पहले विचार-विमर्श की प्रक्रिया केवल तभी अपनाई जाती है जब नियामक किसी नियम को लागू करने या हटाने के प्रति अनिच्छुक होते हैं। जिन उपायों से अवरोध पैदा होने के आसार होते हैं, उनके बारे में परामर्श लेने की आम तौर पर उम्मीद नहीं होती है। अब उस परिपत्र पर नजर डालते हैं जिसे स्थगित किया गया है। सेबी ने 4 अगस्त 2017 को जो परिपत्र जारी किया, उसे 1 अक्टूबर से लागू किया जाना था। इसमें प्रावधान था कि अगर कोई सूचीबद्ध कंपनी कर्ज के मूलधन या उस पर ब्याज के भुगतान में कोई चूक करती है, तो उसे उसकी चूक के एक दिन के भीतर ही एक्सचेंज को जानकारी देनी होगी। इस कदम से वित्तीय बाजार में पारदर्शिता और स्पष्टता लाने में मदद मिलती। इसके साथ ही इससे ऋणशोधन क्षमता में बढ़ोतरी भी होती और कर्जदार कंपनियां अपने वित्तीय देनदारी के निर्वहन में जानबूझकर चूक भी नहीं करतीं।
 
यह कदम वित्तीय बाजार व्यवस्था के अन्य अंगों के साथ प्रतिभूति बाजारों के एकीकरण के लिहाज से महत्त्वपूर्ण था। अगर एक कंपनी अपने बकाया का भुगतान करने में नाकाम रहती है तो उसके बारे में निवेशकों को बताया जाना चाहिए ताकि उन्हें उसकी प्रतिभूतियों और शेयरों के बारे में वास्तविक आकलन करने में मदद मिले। इसी सोच के साथ खुलासे का प्रावधान रखा गया था। हालांकि भुगतान चूक के बारे में जानकारी होने से बैंकिंग एवं वित्तीय सेवा बाजार को यह पता चल जाएगा कि एक चूककर्ता कंपनी बाजार से कर्ज ले रही है। इससे निवेशकों को ऐसे कर्जदार के साथ रिश्ता रखने के जोखिम का सही अंदाजा हो जाता।
 
यह परिपत्र जारी होने के समय सेबी के तत्कालीन सदस्य ने इसकी खूबियों के बारे में काफी बातें कही थीं। सेबी बाजार की दिशा बदल देने वाले इस उपाय का अग्रदूत होने का श्रेय लेने के लिए आतुर था। वहीं इसे वापस लेने का ऐलान बहुत चुपचाप कर दिया। हालांकि यह समय ऐसी बुरी खबरों के प्रसार के लिए माकूल नहीं लगता है। शायद यह लगा था कि देनदारी में चूक के खुलासों की बाढ़ आने से यह संदेश जाएगा कि अर्थव्यवस्था मुश्किल में है और नीचे की तरफ जा रही है। बाजार नियामक ने भी इस अवधारणा के आगे समर्पण कर दिया। 
जब भी किसी असुविधाजनक नीतिगत सुधार की बात आती है तो अक्सर यही तर्क दिया जाता है कि भारत इसके लिए अभी तैयार नहीं है। मसलन, किसी सूचीबद्ध कंपनी के अधिग्रहण के दौरान उसके अवशेष शेयरों को खरीदने के लिए खुली पेशकश करनी पड़ती है और इसके लिए हरेक सूचीबद्ध कंपनी को अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती है। सेबी के 4 अगस्त के परिपत्र में सूचीबद्ध कंपनियों को कर्ज देनदारी में चूक के बारे में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को भी जानकारी देना वैधानिक रूप से अविवार्य करने का जिक्र था। सेबी इन रेटिंग एजेंसियों से नाखुश चल रहा है कि कर्ज में डूबी कुछ कंपनियों की रेटिंग कम क्यों नहीं की गई? लेकिन अगर सेबी को लग रहा है कि रेटिंग एजेंसियों को कंपनियों की आर्थिक स्थिति के बारे में पारदर्शी जानकारी होना आम निवेशकों के हित में नहीं है तो फिर उसे चूककर्ताओं को दोषी ठहराना बंद कर देना चाहिए।
 
सेबी ने भेदिया कारोबार की कथित शिकायतों को लेकर अपरिपक्व कदम उठाने में तेजी दिखाई है। भेदिया कारोबार की संलिप्तता के संदेह में उन कंपनियों के बैंक खाते भी कानून द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक समय तक जब्त रखे गए। अगर समय-समय पर चूक के बारे में जानकारी देना अनिवार्य कर दिया जाता तो भेदिया कारोबार के खिलाफ सेबी की मुहिम भी परवान चढ़ती। वित्तीय बाजार में नीतिगत सुधार लाने की दिशा में सेबी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। दिवालिया एवं ऋणशोधन संहिता लागू करने के कदम की अदालतों ने भी काफी तारीफ की है। वैश्विक बाजार उम्मीद लगाए बैठा था कि कर्ज भुगतान में चूक की जानकारी का खुलासा अनिवार्य करने से दिवालिया कानून और असरदार हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सकेगा।
 
पुराने परिपत्र से बैंकिंग प्रणाली भी अपनी गलतियों के बारे में जानकारी सामने आने को लेकर सशंकित थी। अगर ऐसा संदेश जाता है कि सूचीबद्ध कंपनियों के साथ बैंकों के लिए भी कर्ज चूक के बारे में पूरा सच सामने आना अरुचिकर होगा तो इसका मतलब यही है कि हम कर्जदार सूचीबद्ध कंपनियों के साथ सूचीबद्ध बैंकिंग संस्थानों के बारे में भी सच्चाई को छुपाकर ही खुश हैं। व्यावहारिक होना अपने आप में खतरनाक धारणा है। घरेलू हिंसा से लेकर कन्या भ्रूण हत्या तक कई सामाजिक समस्याएं नकार जाने और जबरन चुप कराए जाने से और भी गंभीर होती गई हैं। शायद इस मामले में हमें वित्तीय बाजार की चाहत भी पता चल गई।
 
(लेखक एक अधिवक्ता और स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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