बिजनेस स्टैंडर्ड - छवि बरकरार मगर उठने लगे सवाल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, October 18, 2017 05:49 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

छवि बरकरार मगर उठने लगे सवाल

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 06, 2017

इन दिनों आम सामाजिक बातचीत में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। खासतौर पर उन जगहों पर जहां कारोबारी तबके के अहम सदस्य मौजूद हों। ऐसे अवसरों पर अक्सर कोई आपको निजी बातचीत के लिए ले जाएगा और कहेगा:

 
'क्या मैं आपसे एक अनौपचारिक सवाल कर सकता हूं?'
 
मैं कहूंगा, 'महोदय, मैं एक पत्रकार हूं और कभी अनौपचारिक नहीं होता। मुझसे जो भी पूछना है, कृपया औपचारिक रूप से ही पूछिए।'
 
वह व्यक्ति अनुरोध करता है, 'नहीं, नहीं वह तो ठीक है लेकिन यह बहुत संवेदनशील प्रश्न है इसलिए कृपया इसे अनौपचारिक ही रहने दें।'
 
'श्रीमान, मेरे पास अनौपचारिक रूप से कहने को कुछ नहीं है। लोग कई बार पत्रकार से अनौपचारिक बातचीत करते हैं लेकिन पत्रकार को ऐसा करने की आवश्यकता नहीं।'
 
बातचीत इसी तर्ज पर खिंच सकती है और फिर आखिरकार गतिरोध टूटता है और वह व्यक्ति भय और शर्मिंदगी के भाव से कहता है। दरअसल वह ऑफ द रिकॅार्ड बात करना चाहता है। दूसरे शब्दों में, वह नहीं चाहता  कि कोई उसके प्रश्न के बारे में जाने। 
 
अब वह सवाल करता है, 'आप क्या सोचते हैं, कुछ हवा बदल रही है?' यह सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से संंबंधित है। मैं पूरी ईमानदारी से सवाल का जवाब देता हूं और इसलिए यहां पूरी जिम्मेदारी से लिख भी रहा हूं कि मुझे ऐसा नहीं लगता। आप जो सुन रहे हैं वह बस तात्कालिक शोरशराबा है। हालांकि कुछ तो बात है और यह शोरगुल सरकार के आधा कार्यकाल पूरा करने के बाद हो रहा है। 
 
अगर इस सप्ताहांत फिर यह चर्चा सामने आती है तो मेरा जवाब थोड़ा स्पष्टï होगा। हां, मैं इस बार कह सकता हूं कि कुछ तो बात है। कुछ ऐसी बात जो हमने संप्रग-2 के कार्यकाल, उससे जुड़े निराशावाद और संदेह के बाद से नहीं सुनी।
 
नए संदेह और निराशा कमजोर आर्थिक हालात से उपजे हैं। यह ठहराव शायद संप्रग के कार्यकाल के आखिरी दो साल में शुरू हुआ था लेकिन अब यह बात पुरानी हो गई है। जीडीपी में लगातार 6 तिमाहियों की गिरावट, अर्थव्यवस्था को दो-दो झटके (नोटबंदी और जीएसटी के रूप में), बेरोजगारी, वेतन भत्तों में रुकावट (सरकार ने जरूर 7वां वेतनमान लागू किया है) सब लोगों को कष्टï पहुंचा रहे हैं। 
 
अधिकांश लोगों को अभी भी आरबीआई रिपोर्ट मौद्रिक नीति, जीडीपी, चालू खाते का घाटा, व्यापार संतुलन, वास्तविक ब्याज दर  जैसी चीजें और इनकी बारीकियां नहीं समझ में आतीं। परंतु किसी की नौकरी जाने या नौकरी न मिलने का कष्टï परेशान करने वाली बात है। नोटबंदी की वजह से चूड़ी बनाने जैसे छोटेमोटे काम करने वालों को लगा छह माह का झटका भी परेशानी की बात है। अब जीएसटी की जटिलताएं तो जले पर नमक के समान हैं। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता अभी भी कायम है। अगर अभी चुनाव हो रहे होते तो लगता नहीं कि परिणाम 2014 से बहुत ज्यादा अलग होते। इंडिया टुडे ने अगस्त में कहा था कि आज भी राजग 349 लोकसभा सीटें जीतने की स्थिति में है। परंतु दो बातें निश्चित तौर पर कही जा सकती हैंै। सरकार पर भरोसा रखने वालों को बहुत लंबे समय तक बरदाश्त करना पड़ा है और अब उनके मन में संदेह के बादल घर करने लगे हैं। प्रधानमंत्री का पराभव नहीं हुआ है जबकि अधिकांश प्रधानमंत्रियों के साथ उनके दो-तिहाई कार्यकाल के बाद ऐसा होता है। परंतु राजनीति अगले दो साल तक एक बिंदु पर ठहरी तो नहीं रह सकती। 
 
प्रधानमंत्री ने इस सप्ताह कंपनी सचिवों को संबोधित किया तो उनके चेहरे पर चिंता साफ नजर आ रही थीा। उनका यह भाषण आरबीआई द्वारा इस साल के वृद्घि अनुमानों को कम करने के कुछ ही घंटे बाद हुआ। आरबीआई ने आगे दरों में और कटौती से भी इनकार कर दिया। भाषण में पुराने मोदी नजर आए। वही पुराना गुस्सा, आत्मविश्वास और लडऩे का माद्दा नजर आ रहा था। परंतु 2013 के बाद पहली बार वह जूझते नजर आए। उनकी लड़ाई रक्षात्मक थी। उन्होंने बार-बार अपने तीन साल के कार्यकाल की तुलना कांग्रेस सरकार के आखिरी तीन साल के कार्यकाल से की जबकि संप्रग के आखिरी तीन साल निहायत बुरे थे। इसके चलते पार्टी लोकसभा में 44 सांसदों पर आ गई। मैं शर्त लगा सकता हूं उनके समर्थकों पर उनके शब्दों का जादू फिर चला होगा लेकिन इस बार उनके चेहरे पर चिंता नजर आ रही थी। 
 
बीते कुछ सप्ताह के उनके कदम भी इसकी गवाही देते हैं। उन्होंने नकारात्मक और निराशावादी लोगों पर हमला किया। ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी ने अपने संकट के दिनों में 'उन्माद फैलाने वालों' पर किया था। आर्थिक सलाहकार परिषद की वापसी भी इसका एक उदाहरण है। यह बात याद रखनी होगी कि हॉर्वर्ड से पढ़े अर्थशास्त्रियों की चुटकी लेने के बाद उन्होंने प्रिंसटन के अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला को इस परिषद में शामिल किया। दूसरा उदाहरण है पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क की वापसी। ध्यान रहे कि अभी कुछ ही दिन पहले तक तमाम वरिष्ठï मंत्रियों ने आक्रामक ढंग से इसका बचाव करते हुए कहा था कि विकास के लिए संसाधन जुटाने के लिए यह आवश्यक है। नए पर्यटन मंत्री ने तो यहां तक कह डाला कि मोटर साइकिल रखने वाले लोगों को करों की शिकायत बंद कर देनी चाहिए। अब केंद्र सरकार के मंत्री और भाजपा के मुख्यमंत्री इस कदम के लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए ट्वीट कर रहे हैं। वित्त मंत्री ने कहा है कि वह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अपने कर कम करने को कहेंगे। इस बीच दशहरे के अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का सालाना उद्बोधन सामने आया। उन्होंने भी रोजगार, कीमतों, आर्थिक मंदी आदि को लेकर चिंता प्रकट की। भाजपा के सत्ता में रहने पर ऐसा कम ही होता है।
 
सरकार की सहजता की एक बड़ी वजह विपक्ष की कमजोर हालत भी है। उसके पास प्रधानमंत्री की लोकप्रिय छवि, उनकी ऊर्जा का मुकाबला करने के लिए कोई नेता नहीं है। विपक्ष के पास कोई साझा एजेंडा तक नहीं है। परंतु जैसा कि हम अपने राजनीतिक इतिहास से जानते हैं, एक अत्यंत लोकप्रिय नेता को भी पराभव और चुनावी हार का सामना करना पड़ सकता है। बशर्ते कि लोग किसी और को न चुनते हुए भी उसके खिलाफ वोट डाल दें। राजीव गांधी के पास लोकसभा में मोदी से भी बड़ा बहुमत था लेकिन वह हार गए थे। अभी मोदी उस मोड़ पर नहीं पहुंचे हैं।
 
परंतु इस पूरी दास्तान में कुछ रोचक पहलू हैं। किसी नेता के लिए संकट का शुरुआती संकेत उससे प्रेरित चुटकुले और मजेदार टिप्पणियां होती हैं। पिछले छह महीनों से मोदी सरकार को लेकर कई मजेदार चुटकुले न केवल बन रहे हैं बल्कि खूब लोकप्रिय भी हो रहे हैं। दूसरी बात, विपक्ष चाहे जितना कमजोर हो लेकि उसने सोशल मीडिया पर अपनी जगह पा ली है। भाजपा ने कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों की छवि बिगाडऩे में इस हथियार का जबरदस्त इस्तेमाल किया था। अब मामला एकतरफा नहीं रह गया है। 
 
हकीकत में इस इलेक्ट्रॉनिक जंग में संतुलन बदल रहा है। आम आदमी पार्टी इस क्षेत्र में पहले से बेहतर है। कांग्रेस ने अब यह शैली सीख ली है और इकनॉमिक टाइम्स के शब्दों में कहें तो देश के उदारवादी धड़े की ताकत मिला दी जाए तो भाजपा को इस क्षेत्र में तगड़ी चुनौती मिल रही है। 
 
प्रधानमंत्री के समक्ष कोई चुनौती नहीं है यह सच है। परंतु केवल इतना पर्याप्त नहीं है। बीते तीन साल में पार्टी को चुनाव जीतने की आदत डालने में ही बहुत सारी ऊर्जा खपा दी गई। अब शासन पर ध्यान देना होगा। अहम विधानसभा चुनाव करीब हैं। अगर सरकार अपनी खो रही गति हासिल नहीं करती है तो गिरावट आरंभ हो जाएगी। मोदी सरकार को दिखाने के लिए बेहतरीन आर्थिक आंकड़ों की दरकार है। परंतु ये आंकड़े खुद के होने चाहिए। संप्रग से तुलना करना नाकाफी है। 
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सेबी के नए नियम से बढ़ेगी म्युचुअल फंड उद्योग की मुश्किल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.