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कर्ज का नया पैमाना, बैंकों को नहीं सुहाना

अनूप राय और अभिजित लेले / मुंबई 10 05, 2017

कर्ज की दर

► आरबीआई की समिति ने उधारी दर को बाह्य बेंचमार्क से जोड़ने का दिया है सुझाव
बैंकों का कहना है कि भारतीय बाजार के अनुकूल नहीं है यह व्यवस्था
इससे उधारी दरों के साथ जमा दरों पर भी पड़ेगा असर
ऋण दर तय करने की प्रक्रिया में काफी उतार-चढ़ाव संभव
इससे पहले देश में मनी मार्केट को सुदृढ़ बनाना जरूरी

भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज की दर तय करने के लिए बाहरी बेंचमार्क के साथ उधारी दर को जोड़ने की बात कही है लेकिन बैंकर इससे सहमत नहीं हैं कि ऐसा होनो से परिचालन में दक्षता आएगी। उनका कहना है कि अगर संपत्ति का मूल्य निर्धारण बाह्य बेंचमार्क से जोड़ा जाता है तो देनदारी भी उस दिशा में जा सकती है। उनका कहना है कि बाह्य बेंचमार्क से उधारी दर की प्रक्रिया में काफी उतार-चढ़ाव आ सकती है। संभव है कि इससे ग्राहकों को उचित उधारी दर का लाभ भीन मिल पाए क्योंकि जोखिम प्रीमियम का निर्धारण बैंकों द्वारा ही किया जाना है।

आवास ऋण जैसे कुछ मामलों में बमुश्किल व्यक्तिगत जोखिम प्रीमियम होता है। लेकिन नई प्रणाली के लागू होने से आवास ऋण को व्यक्तिगत आधार पर देखा जा सकता है और कई ग्राहकों के लिए इसकी दरें अधिक हो सकती हैं। प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंकर ने कहा कि इस प्रस्ताव के साथ सामाजिक जोखिम जुड़ा है। एक अन्य बैंकर ने कहा, 'इस कदम से जमा दरों में भी कमी आ सकती है। भारत जैसे देश में जहां सामाजिक सुरक्षा काफी सीमित है, ऐसे में यह कदम चिंताजनक हो सकता है।'

कुछ अन्य बैंकरों का कहना है कि बाह्य दरों को बेंचमार्क या मानक बनाना ऐसे बाजार के लिए तार्किक नहीं होगा जहां सुदृढ़ पूंजी बाजार न हो। एक वरिष्ठ बैंकर ने कहा, 'बाह्य दर मेरी कोष की लागत नहीं है। मेरी उधारी दर को बाह्य बेंचमार्क के साथ नहीं जोड़ा जा सकता।' उन्होंने कहा, 'मैं ग्राहक को यह नहीं कह सकता कि आरबीआई ने नीतिगत दर घटा दी है, इसलिए आपकी जमा दरें भी कम हो जाएंगी। यह कहते ही ग्राहक अपनी जमा निकाल लेंगे।'

आरबीआई के बाहरी अध्ययन समूह ने बुधवार को तीन बाह्य बेंचमार्क - ट्रेजरी बिल, बैंकों के डिपॉजिट सर्टिफिकेट या आरबीआई नीतिगत दर के आधार पर उधारी दर तय करने का सुझाव दिया था। इसके साथ ही सुझाव दिया कि जोखिम प्रीमियम को अलग रखा जा सकता है और उसका निर्धारण बैंकों द्वारा किया जा सकता है और एकबार प्रीमियम तय करने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता। इसके अलावा, फ्लोटिंग दर पर लोन देने के बाद उसकी दर हर तिमाही तय की जाएगी जबकि मौजूदा व्यवस्था में सालाना आधार पर ऐसा होता है।

बैंकरों का कहना है कि नई पद्धति से पारदर्शिता में सुधार तो होगा लेकिन केंद्रीय बैंक को दर तय करने की विधि में जल्दी-जल्दी बदलाव नहीं करना चाहिए। उनका कहना है कि एमसीएलआर प्रणाली पहले से ही उधारी दर को बाह्य बेंचमार्क के साथ जोड़ने की स्वतंत्रता है, जैसे कि मुंबई इंटरबैंक ऑफर रेट (मिबोर) लेकिन कोई बैंक ऐसा नहीं कर रहा है क्योंकि इससे कोष की लागत परिलक्षित नहीं होती है।

हालांकि उधारी दर को बाह्य बेंचमार्क से जोड़ने के लिए जारी परिचर्चा पत्र में कहा गया है कि विकसित अर्थव्यवस्था बाले बाजारों में यह मानक प्रणाली है। बैंकरों ने कहा कि इसे भारत में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि यहां ऐसा कोई बाजार नहीं जहां से कोई बैंक तत्काल काफी मात्रा में पैसे उधार ले सकता है। एक अन्य बैंकर ने कहा, 'क्या कोई बैंक बाजार से 1,000 करोड़ रुपये आसानी से उधार ले सकता है? ऐसा कोई बाजार भारत में नहीं है। पहले हमें प्रभावी मनी मार्केट विकसित करना होगा उसके बाद ही बाह्य दरों को बेंचमार्क बनाना उचित होगा।'

हालांकि कुछ बैंकर इसके पक्ष में भी हैं। निजी क्षेत्र के बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इससे उधारी दरों में पारदर्शिता आएगी और इस दिशा में उठाए गए किसी भी कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। विदेशी बाजार में मौजूद भारतीय बैंक पहले से ही बाह्य बेंचमार्क के तहत काम कर रहे हैं और इसे सही तरीके से अपनाया भी है। हालांकि सॉवरिन रेटिंग कम होने के कारण भारतीय बैंक स्थानीय मनी मार्केट से उधार नहीं ले पाते हैं। बैंकरों का कहना है कि बैंकिंग उद्योग में करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी सरकार की है और ऐसे में स्प्रेड तथा मुनाफे में किसी तरह का प्रभाव पडऩे से सरकार के लाभांश पर असर पड़ेगा और आरबीआई तथा सरकार ऐसा नहीं चाहेगी।
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