बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया संहिता में ही सुधार की राह
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दिवालिया संहिता में ही सुधार की राह

अजय शाह /  October 05, 2017

दिवालिया संहिता का क्रियान्वयन अभी संपन्न नहीं हुआ है। इस सिलसिले में अभी काफी कुछ नया करने की आवश्यकता है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह 

दिवालिया सुधार की कुछ घटनाओं को लेकर तमाम तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं। एक लेनदेन में ऋणदाता की ऋण वसूली की दर निहायत कम थी। उनका गुस्सा इस बात पर है कि प्रवर्तकों को अत्यंत कम कीमत पर देनदारी चूकने वाली कंपनी का नियंत्रण वापस मिल गया। मकान खरीदने वाले जिन लोगों ने अचल संपत्ति कंपनियों को भारी भरकम अग्रिम भुगतान कर दिया था, वे अपने नुकसान को लेकर चिंतित हैं। आशंका इस बात की है कि कहीं इसका नुकसान न उठाना पड़े। बहरहाल, दिवालिया सुधार एक आधे भरे गिलास के समान है। हमारे देश में यह कानून कई करतूतें सामने लाएगा। हमें दिवालिया सुधार के नौ क्षेत्रों पर काम करने वाली टीम का आकार दोगुना करना होगा। केवल ऐसा करके ही जरूरी सुधार हासिल किया जा सकता है। 

 
वसूली की कमजोर दर
 
इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) में 180 दिन की अवधि निर्धारित की गई है। इसमें डिफॉल्ट करने वाली फर्म के लिए बोली आमंत्रित की जाती है। अगर 75 फीसदी ऋणदाताओं के मत किसी बोली के पक्ष में पड़ते हैं तो वह बोली आवंटित कर दी जाती है। हाल ही में एक मामले में एक बोली स्वीकार की गई जिसमें ऋणदाताओं को उनके कुल कर्ज का 6 फीसदी मिला। इस निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रक्रिया को लेकर विवाद है। कई लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं अगर ऋण का केवल 6 फीसदी वसूल हुआ तो आईबीसी तो विफल माना जाएगा। दिवालिया क्षेत्र में हमें गति को तवज्जो देनी चाहिए। जब देरी होती है तो आर्थिक मूल्य भी नष्टï होता है। फर्म को बचाने के लिए पहले डिफॉल्ट के बाद तत्काल दिवालिया प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए और तत्काल नई व्यवस्था पेश की जानी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो कंपनी को चलाते रहना मुश्किल होगा। तब केवल नकदीकरण ही एकमात्र उपाय होगा। 
 
आज के भारत में हमारे पास पहले ही बहुत सारे ऐसे मामले लंबित हैं जहां लंबे समय पहले डिफॉल्ट हुआ था। बैंकिंग नियमन बुरी खबर छिपाने में बैंकों की मदद करते हैं और आईबीसी था ही नहीं इसलिए समस्याएं आगे खिसकती गईं। ऐसे कई मामले आईबीसी के सामने आ रहे हैं जहां डिफॉल्ट 10 से 15 साल पहले हुआ था। यहां रिकवरी की दर निराशाजनक होगी, भले ही आईबीसी सही काम करे। आईबीसी की असली परख नए डिफॉल्ट पर होगी। अगर कोई डिफॉल्ट आज घटित हुआ है तो आईबीसी की मशीनरी कितनी तेजी से काम करती है? यह काम कितना सफल रहता है? क्या फर्म को बचाने में सफलता मिलती है? वसूली किस दर से हो पाती है? एक मजबूत आईबीसी में नए डिफॉल्ट में वसूली की दर बेहतर होगी। 
 
प्रवर्तकों का दोबारा नियंत्रण
 
दिवालिया प्रक्रिया में कई लोगों के पास फर्म के लिए बोली लगाने का अवसर है। अगर प्रवर्तक सबसे ऊंची बोली वाला साबित होता है तो यह बात उन लोगों में चिढ़ पैदा होती है जो उसे कंपनी की बरबादी के लिए जिम्मेदार मानते हैं। बहरहाल, अगर खुली और पारदर्शी प्रक्रिया में प्रवर्तक फर्म का नियंत्रण हासिल कर लेता है तो हमें नैतिकता का प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।
 
मकानों के खरीदार
 
दुनिया भर में खरीदार अपना पैसा लगाते हैं और तत्काल उनको मकान पर कब्जा मिल जाता है। परंतु भारत में पिछले 10-15 साल में अचल संपत्ति की कई कंपनियों को दिवालिया हो जाना चाहिए था। आईबीसी के अभाव में उन्होंने भुगतान में देरी की और खरीदारों से पैसे लेते गए। ये खरीदार एक तरह से असुरक्षित ऋणदाता की तरह काम करते हैं। अचल संपत्ति कंपनी के नकदी प्रवाह में इन ऋणदाताओं का बहुत मामूली दावा होता है। आईबीसी वैसे ही काम कर रहा है जैसे उसे करना चाहिए। भविष्य में ये कंपनियां वर्षों तक बिना पूंजी के काम करती नहीं रह सकेंगी। आने वाले दिनों में खरीदार अधिक सतर्क रहेंगे और मकान पर कब्जा मिलने के वक्त ही पैसा देंगे। 
 
खुलासे
 
अतीत में डिफॉल्ट को छिपाकर रखा जाता था। यह बहुत मूल्यवान जानकारी मानी जाती थी जिसे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सौंपा जाता था। इसका इस्तेमाल शेयर बाजार में भेदिया कारोबार के लिए किया जाता था। आईबीसी के ढांचे में जब डिफॉल्ट होता है तो इसे तत्काल सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे आईबीसी का कामकाज सुधारने में मदद मिलेगी क्योंकि इसमें कई पक्ष शामिल हैं। 
 
उन शेयरों और बॉन्ड पर विचार कीजिए जिनका सार्वजनिक रूप से कारोबार किया जाता है। स्थापित मान्यता यह है कि सभी महत्त्वपूर्ण तथ्यों से बाजार को अवगत कराया जाना चाहिए। अगर कोई कंपनी डिफॉल्ट करती है तो यह जानकारी भी तत्काल सार्वजनिक की जानी चाहिए। इसी प्रकार अगर किसी बैंक के पास कोई ऐसी इक्विटी या डेट प्रतिभूति होती है जो कारोबार के लिए सार्वजनिक हो और इस दौरान कोई बड़ा कर्जदार बैंक पर डिफॉल्ट कर जाए तो यह एक ऐसी घटना है जिसे तत्काल सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इन खुलासों को लेकर जहां बैंकों और कर्जदारों के बीच अफरातफरी का माहौल है वहीं भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा इन खुलासों पर जोर देना एकदम सही है। 
 
इकलौती राह
 
आईबीसी के अधिकांश बड़े विचार काफी मजबूत हैं। जब हम निष्कर्षों से चकित हैं तो हमें दो तरह के आश्चर्यों में भी भेद करना होगा। एक तरफ हमारे पारंपरिक तौर तरीकों में अंतर पैदा होता है जिन्हें दुव्र्यवहार के रूप में चिह्निïत किया जाता है तो वहीं दूसरी ओर आईबीसी के क्रियान्वयन में भी कई तरह की दिक्कतें हैं। आईबीसी का क्रियान्वयन अभी पूरा नहीं हुआ है। नौ क्षेत्रों में नए तरह से काम करने की आवश्यकता है। एक संशोधन 2016 के कानून की कमियों को दूर करने के लिए भी आवश्यक है। इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी बोर्ड ऑफ इंडिया (आईबीबीआई) को उच्च प्रदर्शन वाला नियामक बनने के लिए काफी मेहनत करनी होगी।
 
आईबीबीआई को एक बढिय़ा मसौदे वाला नियमन तैयार करना होगा। ऐसा करके ही निजी सूचना उपयोगिता (आईयू) का एक प्रतिस्पर्धी उद्योग विकसित किया जा सकेगा। निजी इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशन एजेंसीज (आईपीए) के लिए भी एक प्रतिस्पर्धी उद्योग विकसित करना होगा। इसके अलावा दिवालिया पेशेवरों का भी एक प्रतिस्पर्धी उद्योग विकसित करना होगा। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट को कॉर्पोरेट दिवालिया प्रक्रिया से निपटने में अपनी जगह बनानी होगी। इसके अलावा ऋण वसूली पंचाट को भी व्यक्तिगत दिवालिया मामलों में यही करना होगा। 
 
वित्तीय संस्थानों को दिवालिया निस्तारण प्रक्रिया को बेहतर बनाने की क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें बेहतर पुनर्गठन सुनिश्चित करने की प्रक्रिया का भी हिस्सा बनना होगा। सामरिक निवेशकों, तनावग्रस्त परिसंपत्ति फंड और निजी इक्विटी फंड को संभावित निष्कर्षों को लेकर भरोसा पैदा करना होगा। यह भरोसा किसी खरीदी जाने वाली परिसंपत्ति के लिए बोली लगाने या उसके नकदीकरण के वक्त काम आएगा। इन सभी नौ क्षेत्रों में टीमों और प्रबंधन प्रक्रिया में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। 
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