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लंबा है सफर

संपादकीय /  October 05, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर बन रही धारणा की लड़ाई को जीतने के लिए बढ़ती आलोचना को खारिज करने की रणनीति अपनाई है। आर्थिक स्थिति की आलोचना करने और मंदी की बात करने वालों में कुछ लोग तो उनकी ही पार्टी के सदस्य हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर के गिरकर 5.7 फीसदी रह जाने के बाद यह आलोचना और गहरी हो गई है। कई लोगों ने दावा किया कि नवंबर में हुई नोटबंदी और जुलाई में जल्दबाजी में लागू किए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कारण ही अर्थव्यवस्था अप्रैल 2016 में शुरू हुई गिरावट से उबर नहीं पाई। देश में रोजगार की स्थिति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। कई क्षेत्रों से छंटनी की खबर आ रही है जबकि आम लोगों के बीच होने वाली बहस में रोजगार के अवसरों की कमी प्रमुखता लेती जा रही है। मोदी ने बढ़ती आलोचना से पार पाने के लिए आर्थिक आंकड़ों का प्रयोग किया। 

 
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार के प्रदर्शन के बचाव में जो बातें कहीं उनमें मुख्यतौर पर तीन तत्त्व शामिल थे। पहला, उन्होंने अपनी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में देश की वृहद आर्थिक स्थिति की तुलना संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल केआखिरी कुछ वर्षों के कार्यकाल से की। उन्होंने हर किसी को पिछली सरकार के कार्यकाल में मुद्रास्फीति की कष्टïप्रद स्थिति, राजकोषीय घाटे और चालू खाते के घाटे की याद दिलाई। मोदी ने जिस दूसरे क्षेत्र का जिक्र किया वह था यह सवाल कि क्या पहली तिमाही में कमजोर वृद्घि दर अधिक व्यापक मंदी के आगमन का संकेत थी? एक बार फिर उन्होंने आलोचना का मुकाबला करते हुए आंकड़ों की एक लंबी सूची पेश की। जून महीने में यात्री कारों की बिक्री में 12 फीसदी का इजाफा हुआ, वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री 23 फीसदी बढ़ी और दोपहिया वाहनों की बिक्री 14 फीसदी उछली। इस बीच दूरसंचार उपभोक्ताओं की संख्या में 14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई जबकि पिछले महीने ही ट्रैक्टरों की बिक्री में 34 फीसदी की उछाल आई। उनका यह कहना सही है कि ऐसी अर्थव्यवस्था को कतई गिरावट वाली अर्थव्यवस्था नहीं कहना चाहिए। 
 
आखिर में उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के अपने निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि इन कदमों से न केवल कर आधार बढ़ा है बल्कि सरकार को कर वंचना करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने में भी मदद मिली। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि ये दोनों उपाय ईमानदारी को बढ़ावा देने वाले हैं। उन्होंने आश्वस्त किया कि कर अधिकारी औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल कंपनियों को परेशान नहीं करेंगे और सरकार आगे चलकर निवेशकों के और अधिक अनुकूल कदम उठाएगी। उनकी ये बातें सकारात्मक माहौल बनाने की नीति का हिस्सा थीं। 
 
मोदी ने बढ़ती आलोचना का जवाब देने का प्रयास किया है जो अपने आप में सराहनीय है। बहरहाल वह इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते हैं कि अधिकांश अहम वृहद आर्थिक कारक लगातार गिरावट पर हैं। सच तो यह है कि बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के ठीक पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष की अनुमानित वृद्घि दर को कम कर दिया। उसने सरकार को मजबूती से यह सलाह दी कि वह राजकोषीय अनुशासन को बरकरार रखे और साथ ही साथ ढांचागत सुधारों की दिशा में भी आगे बढ़ती रहे। सरकारी बैंकों की सेहत दुरुस्त करना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। लोगों को अर्थव्यवस्था के भविष्य के बारे में आश्वस्त करना एक बात है, अगर प्रधानमंत्री अपनी बातों पर अमल करना चाहते हैं तो उनकी सरकार को अभी काफी कुछ करना होगा।
Keyword: india, economy, nrendra modi,,
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