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सही विराम

संपादकीय /  October 04, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अर्थव्यवस्था की ऐसी तस्वीर पेश की है जहां मुद्रास्फीति बढ़ रही है जबकि वृद्घि में कमी आई है और आगे इसके और धीमा होने की आशंका है। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की पिछली बैठक से अब तक वास्तविक मुद्रास्फीति में करीब दो फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन दोनों कारकों का मिश्रण आरबीआई की चौथी दोमाही मौद्रिक नीति समीक्षा में रीपो दर में आगे कटौती न करने के निर्णय को उचित ठहराता है। यह वह दर है जिस पर केंद्रीय बैंक बैंकिंग व्यवस्था में नकदी डालता है। आरबीआई ने पूरे वर्ष के आकलन में सकल मूल्यवर्धन की वृद्घि दर का अनुमान घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया। पहले इसके 7.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था। इसके अलावा उसने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई के अनुमान को 4-4.5 फीसदी से बदलकर 4.20-4.60 फीसदी कर दिया है। 

 
ताजा मौद्रिक नीति समीक्षा उस वक्त आई है जबकि सरकार और उद्योग जगत में यह अनुमान लगाया जा रहा था कि आरबीआई आर्थिक वृद्घि को बढ़ावा देने के लिए काम करेगा। वृद्घि दर में बीती पांच तिमाहियों से लगातार गिरावट आ रही है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर 5.7 फीसदी रही है जो खासी चिंताजनक है। इसका अर्थ यह हुआ कि जब विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा आर्थिक विस्तार के दौर से गुजर रहा है तब भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है। अमेरिका और यूरो क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। जापान की अर्थव्यवस्था में भी तेजी आ रही है। चीन को मजबूत घरेलू मांग का सहारा मिला है जबकि ब्राजील और रूस में भी वृद्घि देखने को मिल रही है। वर्ष 2017 में वैश्विक बाजार का पूर्वानुमान भी बेहतर नजर आ रहा है लेकिन भारत के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब भारत वैश्विक आर्थिक जगत का चमकता सितारा था। 
 
इसमें दो राय नहीं कि आरबीआई असमंजस में है। यह स्पष्टï नहीं है कि मौजूदा मंदी नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर जैसे बदलावपरक कारकों के चलते आई है या फिर यह दीर्घावधि की ढांचागत वजहों मसलन बैंकिंग व्यवस्था के फंसे हुए कर्ज और अत्यधिक नकदी वाले कारोबारी क्षेत्र की वजह से है। आरबीआई ने निजी निवेश को तेज करने की बात दोहराई है और कहा है कि उसकी मदद से ही अर्थव्यवस्था और समग्र ऋण की स्थिति बेहतर की जा सकती है। इसके अलावा 6.7 फीसदी की सकल मूल्यवर्धित वृद्घि हासिल करने के लिए हमें दूसरी तिमाही में 6.4 फीसदी, तीसरी तिमाही में 7.1 फीसदी और चौथी तिमाही में 7.7 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करनी होगी। यह सच है कि अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में हाल के महीनों में मांग में सुधार देखने को मिला है। परंतु उक्त अनुमान अभी भी  अत्यधिक आशावादी नजर आता है। आशावादी नजरिया कहता है कि त्योहारी मौसम में खपत बढ़ेगी। वेतन आयोग से मिलने वाली राशि इसे बढ़ावा देगी और इस दौरान जीएसटी के क्रियान्वयन की दिक्कतें भी समाप्त हो जाएंगी। 
 
बहरहाल, खुदरा महंगाई में से अगर खाद्य और ईंधन महंगाई को हटा भी दिया जाए तो जुलाई और अगस्त में इसमें तीव्र इजाफा हुआ। यह संभावना तो हमेशा रहती है कि यह तेजी जीवन स्तर में आई महंगाई की कीमत पर हासिल हुई हो। यह एक जटिल मुद्दा है खासकर एक ऐसी सरकार के लिए जो अपने कार्यकाल के आखिरी चरण में प्रवेश कर रही हो। आरबीआई ने दोहराया है कि सरकार को अपने व्यय में सुधार और राजकोषीय विचलन रोकते हुए आगे सुधारों की दिशा में काम करना चाहिए। अब सरकार की बारी है। 
Keyword: repo rate, bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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