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भाजपा के लिए यशवंत की बातों में हैं सबक

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 03, 2017

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने पिछले दिनों नरेंद्र मोदी सरकार पर हमलावर रुख अपनाने का जो निर्णय लिया उसने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को उद्विग्न कर दिया है। इसे समझा भी जा सकता है। परंतु, सिन्हा ने अर्थव्यवस्था में आई गिरावट और अर्थव्यवस्था के संचालन के तरीकों की आलोचना की है जो भाजपा नेतृत्व के समक्ष मौजूद संकटों में शायद सबसे कमजोर है। इससे इतर पार्टी नेतृत्व के समक्ष चिंता की दो बड़ी वजह हैं। पहली बात, सिन्हा ने कहा कि उन्हें अब बोलना ही होगा क्योंकि भाजपा के भीतर और बाहर बहुत बड़ी तादाद में लोग नहीं बोल रहे हैं। लोग इसलिए नहीं बोल रहे हैं क्योंकि वे डरे हुए हैं। इसमें दो राय नहीं कि यह एक गंभीर आरोप है जो पार्टी और सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर लगाया गया है। 

 
पार्टी के भीतर का लोकतंत्र भाजपा के लिए हमेशा गर्व का विषय रहा है। पार्टी हमेशा कहती रही है कि यह वह बात है जो उसे कांग्रेस से अलग करती है क्योंकि कांग्रेस में परिवारवाद ने लोकतंत्र के तमाम निशान मिटा दिए हैं। आज जबकि सिन्हा जैसे वरिष्ठï नेता कह रहे हैं कि कई पार्टी नेता डर के मारे बोल नहीं रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह दबाव होगा कि वे इस आलोचना का जवाब दें। सवाल यह है कि क्या ये दोनों नेता पार्टी नेताओं और सरकार के भीतर के लोगों से इस विषय में बातचीत करेंगे।
 
दूसरा, ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्हा ने इस हमले में प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे मंत्रिमंडल गठन के पहले दौर में अटल बिहारी वाजपेयी ने जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन दोनों को शामिल नहीं किया था क्योंकि दोनों लोकसभा के सदस्य नहीं थे। जबकि सभी जानते थे कि दोनों नेता उनके बहुत करीबी हैं। वाजपेयी ने सन 1998 में जो किया, उस बात का आज उल्लेख करने का अर्थ यह दिखाना था कि कैसे मोदी ने अरुण जेटली को लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद देश का वित्त मंत्री बना दिया। जेटली पर वह इसलिए हमलावर हुए क्योंकि उन्होंने अर्थव्यवस्था की इस कदर दुर्दशा होने दी है। परंतु सिन्हा मोदी पर भी यह आरोप लगाते हैं कि उन्होंने मंत्रिमंडल चयन के उस सिद्घांत का परित्याग कर दिया जिसके तहत मंत्रियों को उन नेताओं में से ही चुनना था जो लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। हो सकता है मोदी, जेटली को चुनने के अपने निर्णय का बचाव कर लें लेकिन कोई वरिष्ठï भाजपा नेता ऐसा नहीं है जिसने प्रधानमंत्री के चयन पर सवाल खड़ा किया हो। सिन्हा ऐसा करने वाले पहले नेता हैं और इससे एक ऐसा चलन शुरू हो सकता है जो भाजपा नेतृत्व के लिए मुसीबत लेकर आ सकता है। उसे 2019 के आम चुनाव की तैयारी में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। 
 
इसके विपरीत सिन्हा ने आर्थिक मुद्दों पर जो हमला किया है वह पार्टी के लिए उतना चुनौतीपूर्ण नहीं होगा क्योंकि राजनीति पर या सत्ताधारी दल की चुनावी संभावनाओं पर इसका बहुत बुरा असर नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि धीमी वृद्घि दर अभी भी देश में चुनाव जीतने का प्रभावी मुद्दा नहीं बन सकती। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन में जो गड़बडिय़ां हुईं उन्होंने अवश्य बाजार में निराशा उत्पन्न की। परंतु किसी भी बदलाव के वक्त ये समस्याएं आती हैं और इनसे अगले छह माह से एक वर्ष के भीतर निपटा जा सकेगा। धीमी वृद्घि दर और जीएसटी के कारण आई विसंगति चुनावी जीत का मुद्दा बन सकती है या नहीं इस बारे में अभी बहस की गुंजाइश है। 
 
भाजपा नेतृत्व को ज्यादा चिंता इस बात की होनी चाहिए कि मुद्रास्फीति में तेजी आ सकती है और सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे हैं। यह सच है कि अब तक मुद्रास्फीति चिंता की वजह नहीं बन सकी है लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतें मजबूत बनी रहीं या और बढ़ीं तो खतरा मंडराना शुरू हो जाएगा। यह सरकार की चुनावी संभावनाओं के लिए बुरा साबित हो सकता है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई भी आम लोगों में निराशा की वजह बन सकती है। यह बात भी चुनाव में सत्ताधारी दल के खिलाफ जा सकती है। सरकार को महंगाई पर नजर रखनी होगी। 
 
वैसे बीते साढ़े तीन साल में भ्रष्टाचार भी किसी भी तरह सरकार की छवि को प्रभावित कर पाने में असरदार नहीं रहा है। अब तक सरकार के किसी बड़े नेता का नाम भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में सामने नहीं आया है। हालांकि यह दलील दी जा सकती है कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। आमतौर पर भ्रष्टाचार के मामले किसी भी सरकार के कार्यकाल के चौथे या पांचवें साल में सामने आते हैं। सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों पर कड़ी नजर रखनी होगी। क्योंकि चुनावी संभावनाओं पर यह भी उतना ही असर डाल सकता है जितना कि महंगाई का मुद्दा।
 
भाजपा को सिन्हा के हमले से सबक अवश्य लेने चाहिए। ये सबक राजनीतिक भी हैं और मुद्रास्फीति के प्रबंधन तथा भ्रष्टाचार से लड़ाई से भी जुड़े हैं। अगर सिन्हा की आलोचना के बाद पार्टी के भीतर यह भावना घर करती है कि उसके नेता बोलने में डरते हैं तो लंबा नुकसान हो सकता है। इसी तरह जहां तक वर्ष 2019 की चुनावी संभावनाओं में सुधार की बात है तो भाजपा नेतृत्व को जीडीपी वृद्घि दर या जीएसटी की बहुत अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उसे महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों की चिंता करनी चाहिए। मतदाताओं को कीमतों और भ्रष्टाचार से ज्यादा लेना देना है, बजाय कि वृद्घि दर या नई कर व्यवस्था के।
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