बिजनेस स्टैंडर्ड - दरों में कटौती के प्रश्न का क्या हो जवाब?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 17, 2017 04:58 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

दरों में कटौती के प्रश्न का क्या हो जवाब?

अशोक लाहिड़ी /  October 03, 2017

मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान दरों में कटौती का सवाल सबके जेहन में है। उससे जुड़ी परिस्थितियों पर नजर डाल रहे हैं अशोक लाहिड़ी

 
मुद्रास्फीति खासे कमतर स्तर पर है और कारोबारियों की नजर में ब्याज दरें काफी ऊंची हैं। मकान खरीदने वाले लोगों के एक सर्वेक्षण में भी एक तिहाई लोगों ने यही कहा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से यह मांग बढ़ती जा रही है कि वह दरें कम करे। इस बीच बुधवार को संपन्न हो रही मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की चौथी दोमाही समीक्षा के निष्कर्षों को लेकर रहस्य का वातावरण बना हुआ है। वास्तविक ब्याज दर, मुद्रास्फीति से समायोजित नॉमिनल ब्याज दर होती है। यह किसी ऋणदाता को मुद्रा के मूल्य के आकलन के पश्चात वास्तविक प्रतिफल दर्शाती है। ऋण की परिपक्वता और कर्जदार के जोखिम प्रोफाइल के अंतर के आधार पर अक्सर दीर्घावधि के सॉवरिन बॉन्ड पर मिलने वाली दर को ब्याज दर के समतुल्य मान लिया जाता है। इसमें नाम मात्र का जोखिम रहता है। 
 
ब्याज दर की तरह मुद्रास्फीति के कई पैमाने हैं। मिसाल के तौर पर थोक मूल्य और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के संदर्भ में। संपूर्ण विश्लेषण किया जाए तो सभी आर्थिक गतिविधियां निरंतर खपत से ही तो संबंधित हैं। ऐसे में ब्याज की वास्तविक दर का आकलन करने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा आकलित मुद्रास्फीति को ध्यान में रखा जा सकता है। हालांकि अनुमानित मुद्रास्फीति अधिक प्रासंगिक हो सकती है परंतु अनुमान के आकलन में कठिनाई हो सकती है। वहीं नॉमिनल ब्याज दर को सीपीआई मुद्रास्फीति से समायोजित किया जा सकता है। यह प्रासंगिक तिथि से वास्तविक ब्याज दर का आकलन किया जा सकता है।
 
देश में वास्तविक ब्याज दर कितनी ऊंची है? भारत सरकार के 10 वर्ष के बॉन्ड की सालाना वास्तविक ब्याज दर अगस्त 2016 के एक फीसदी से कम के स्तर पर से बढ़कर जून 2017 में 6 फीसदी के स्तर तक जा पहुंची। हालांकि बाद के दो महीनों में इसमें कमी आई और यह 5 फीसदी हो गई। ओईसीडी के आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर 2016 से देश में वास्तविक ब्याज दर जी-7 देशों यानी कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका से ज्यादा है। क्या 5 फीसदी की वास्तविक ब्याज दर भारत के लिए बहुत ज्यादा है? भारत एक विकासशील देश है जहां पूंजी की कमी है। यह कमी विकसित देशों की तुलना में उच्च वास्तविक ब्याज दर में दिखनी चाहिए। परंतु कितनी ऊंची?
 
अक्टूबर 2016 से जुलाई 2017 के बीच देश की औसत वास्तविक ब्याज दर 4.48 फीसदी रही जबकि जी-7 देशों में यह औसतन 0.16 फीसदी ऋणात्मक थी। बहरहाल, जी-7 का औसत अपने आप में तमाम विभिन्नताएं समेटे है जो अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों में नजर आती है। यह बात ध्यान देने लायक है कि यूरो क्षेत्र के देशों में बतौर मुद्रा उसी यूरो का प्रयोग किया जाता है। उनमें सरकारी बॉन्डों अथवा ब्लू चिप कॉर्पोरेट ऋण की नॉमिनल ब्याज दर करीब-करीब समान रहती है।  इसके बावजूद वास्तविक ब्याज दर में काफी अंतर होता है। उदाहरण के लिए अक्टूबर 2016 से जुलाई 2017 के बीच जर्मनी में औसत ब्याज दर 2.4 फीसदी थी जो कि इटली की दर से कम थी। इटली की दर भारत से 3.4 फीसदी कम थी। 
 
जब चीजें संतुलन में आती हैं तो अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि उस वक्त वास्तविक ब्याज दर उत्पादकता और किफायत के बीच संतुलन को दर्शाते हैं। उत्पादकता की बात करें तो दो अहम कारक हैं पूंजी के संदर्भ में श्रम की उपलब्धता और शेयर बाजार से हासिल प्रतिफल। दोनों में ही निवेश की मांग बढ़ाने की प्रवृत्ति होती है और इसलिए वास्तविक दर को भी। किफायत की बात करें तो बचत दर में गिरावट आने का असर भी उच्च वास्तविक दर पर पड़ता है। इसमें सरकारी बचत भी शामिल है। समय बीतने के साथ जब उत्पादकता और किफायत में बदलाव आता है तो वास्तविक ब्याज दर में भी बदलाव आता है। उदाहरण के लिए जी-7 देशों में सन 1960 के दशक से ही व्यापक रुझान गिरावट का रहा है। सन 1970 के दशक के मध्य से लेकर सन 1980 के दशक के आखिर तक इसमें तेजी आई। सन 1980 के दशक से एक बार फिर गिरावट का रुख देखने को मिला। विभिन्न देशों के बीच की पूंजी प्रवाह को देखें तो वास्तविक दर अब केवल देसी कारकों पर निर्भर नहीं रह गई है। उच्च वास्तविक दर वाला देश पूंजी की आवक को आकर्षित करेगा और दर में अपने आप गिरावट आएगी। फिर भी अल्पावधि में अलग-अलग देशों में वास्तविक दर में अंतर हो सकता है। 
 
देश में मौजूदा परिस्थितियों में वास्तविक ब्याज दर क्या होनी चाहिए? 19वीं सदी के अंत में सुप्रसिद्घ स्वीडिश अर्थशास्त्री नट विकसेल ने कहा था कि अर्थव्यवस्था की एक स्वाभाविक ब्याज दर होती है। वह अर्थव्यवस्था को पूरी क्षमता से काम करने में मदद करती है। अगर स्वाभाविक दर वास्तविक ब्याज दर से ज्यादा है तो कीमत गिरती है। भारत की स्वाभाविक ब्याज दर क्या है? 
 
वर्ष 2014 में आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि लंबी अवधि की वास्तविक जोखिम मुक्त दर 1.5 फीसदी और 2 फीसदी होनी चाहिए। बाद में कुछ अस्पष्टïता उत्पन्न हुई कि यह दर 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड, एक साल के ट्रेजरी बिल अथवा रीपो दर पर लागू होनी चाहिए या नहीं। सितंबर 2017 में ये तीनों दरें 6 फीसदी से 6.7 फीसदी के बीच थी। मान लिया जाए कि सितंबर 2017 में सीपीआई महंगाई दर पिछले महीने के 3.36 फीसदी के स्तर पर अपरिवर्तित रही और वास्तविक दर 2.6 फीसदी तथा 3.3 फीसदी के बीच रही। ऐसे में अगर एमपीसी को लगता है कि मुद्रास्फीति का अनुमान 3.36 फीसदी से अधिक होगा तब 100 आधार अंकों की गुंजाइश बनती है। तभी नीतिगत दर को स्वाभाविक ब्याज दर के साथ सुसंगत किया जा सकेगा। 
 
रीपो दर में कटौती जरूर बैंकों को अधिक सरकारी बॉन्ड खरीदने के लिए प्रोत्साहित करेगी। इससे नए सरकारी ऋण के ब्याज की लागत में कमी आएगी। बैंकों को नए ऋण के बाजार मूल्यांकन का भी फायदा मिलेगा। बहरहाल यह संदेहास्पद है कि बिना समर्थित उपायों के निजी क्षेत्र को बैंक ऋण का प्रवाह सुधरेगा या नहीं? यह बाजार बुनियादी परियोजनाओं में ठहराव और अत्यधिक नकदी वाली बैलेंसशीट जैसी मूलभूत वजहों से अधिक प्रभावित हुआ है और ऋण के गलत मूल्यांकन से कम। यह भी याद रखना होगा कि सन 1960 के दशक के आरंभ से तीन दशक तक वास्तविक ब्याज दर अक्सर नकारात्मक रही। इसने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। इसके अलावा वास्तविक ब्याज दर में गिरावट बचतकर्ताओं को भी प्रभावित करेगी। ऐसे में अगर नीतिगत दर में कमी आती भी है तो भी इसके प्रभाव के अनुमानों का प्रबंधन अहम होगा। 
Keyword: india, economy, IIP, RBI,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या गोल्ड रिफाइनरियों को मिले आईजीएसटी से छूट?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.