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सुधर सकते हैं आर्थिक हालात बशर्ते सरकार दे ये सौगात

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 02, 2017

इन दिनों हर कोई कह रहा है कि अर्थव्यवस्था संकट में है। हर व्यक्ति इस बात पर सहमत है कि नोटबंदी जैसी गलत नीति और उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के गलत क्रियान्वयन के चलते यह दुर्दशा हुई है। अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो अत्यंत पुराने राजनेताओं सुब्रमण्यन स्वामी (78 वर्ष) और यशवंत सिन्हा (तकरीबन 80 वर्ष) ने अचानक मुखालफत शुरू कर दी है। इन दोनों ने भविष्यवाणी की है कि आने वाले दिन बहुत बुरे हो सकते हैं। स्वामी की चिढ़ तो समझी जा सकती है। वह वित्त मंत्री बनना चाहते थे लेकिन प्रधानमंत्री को यह मंजूर नहीं था। 

 
सिन्हा का गुस्सा कम समझ में आने योग्य है। वह सन 1998 से 2002 के बीच वित्त मंत्री रहे। उन्होंने भी अर्थव्यवस्था को बहुत बेहतरीन ढंग से नहीं संभाला। चाहे जो भी हो, उन्होंने खुलकर हमला बोला है। यह लड़ाई किस नतीजे पर पहुंचेगी, यह अभी तक स्पष्टï नहीं है। इस बात ने देश के सबसे बुरे वित्त मंत्री तक को प्रसन्न कर दिया है। उनका फौरी जवाब है- मैंने आपसे कहा था कि ऐसा ही होगा। वह यह भूल जाते हैं कि जब अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर शुरू हुआ था तब वह वित्त मंत्री थे। इस पूरी कवायद में जब हर कोई इसी मसले पर बात कर रहा है, एक अपेक्षाकृत बड़ी विडंबना की अनदेखी कर दी गई है। इसे समझने के लिए हमें सन 1990-91 की समस्याओं और मौजूदा दौर की कठिनाइयों के बीच साम्य कायम करना होगा। 
 
विरोधाभास
 
सन 1991 में जब अर्थव्यवस्था का पराभव हुआ तब इसकी वजह बना था विदेशी मुद्रा का अभाव। आज अर्थव्यवस्था इसलिए डूब रही है क्योंकि विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद हमारे पास रुपये की कमी है। जनवरी 1991 में देश में केवल 1.1 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। आज हमारे पास 400 अरब डॉलर मूल्य की विदेशी मुद्रा है। उस वक्त देश का राजकोषीय घाटा भी 8 फीसदी से ऊपर था जबकि आज यह 3.5 फीसदी के आसपास है। 
 
इसके निहितार्थ एकदम स्पष्टï हैं। सन 1985 और 1989 के बीच राजीव गांधी ने डॉलर और रुपया दोनों जमकर खर्च किया। सन 2014 और 2017 के बीच नरेंद्र मोदी ने दोनों बेहद कम खर्च किए। राजीव गांधी के कार्यकाल में आरबीआई सरकार को असीमित ऋण देने को तैयार था जबकि विदेशी तैयार नहीं थे। मोदी के मामले में इसका एकदम उलट देखने को मिला। 
राजीव गांधी की आर्थिक नीति सन 1981 में एल के झा द्वारा की गई अनुशंसाओं पर आधारित थी। उन्होंने कहा था कि वृद्घि सरकार द्वारा उच्च ऋण से ही हासिल हो सकती है और इसी दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। 
 
परंतु इन अनुशंसाओं को सन 1985 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी क्योंकि सन 1982 और 1984 के बीच भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के राजकोषीय अनुशासन का पालन कर रहा था। इसके पश्चात सन 1986 में राजीव गांधी ने पहल शुरू की। सन 1989 तक भारत संकट में था। वह चुनावी साल था इसलिए राजीव गांधी ने तमाम चेतावनियों की अनदेखी की। मोदी भी ऐसा ही करते दिख रहे हैं। यानी चेतावनियों की अनदेखी करना। अभी यह स्पष्टï नहीं है कि किसकी सलाह पर मोदी इस तरह काम कर रहे हैं। परंतु यह बात एकदम स्पष्टï है कि उन्होंने वृद्घि की मदद के लिए काले धन को उजागर करने और इस तरह सरकार की वित्तीय स्थिति दुरुस्त करने का बीड़ा उठाया है। 
 
जैसा कि मेरे मित्र और स्वराज्य के संपादकीय निदेशक आर जगन्नाथन ने कहा यह कदम नाकाम साबित हुआ। भारत जैसे देश में जहां बैंक निहायत गैर लचीले और भ्रष्टï हैं वहां काला धन ही अर्थव्यवस्था को जरूरी नकदी मुहैया कराता रहा है। मोदी के प्रयासों में चाहे जितनी नेकनीयती हो लेकिन उनकी वजह से अर्थव्यवस्था में नकदी का घोर संकट उत्पन्न हुआ है। सरकार के समक्ष एकदम सामान्य और सहज जिम्मेदारी है: अर्थव्यवस्था में नकदी दोबारा बहाल करना।
 
क्या किया जाना चाहिए?
 
नई नीति का सबसे अहम तत्त्व होना चाहिए उस नुकसान को कम करना जो अर्थव्यवस्था को गत वर्ष नवंबर में हुई नोटबंदी के बाद हुआ है। नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को जो झटका दिया है, उसके प्रभाव को महसूस करना मुश्किल नहीं। 
 
पहली बात, मोदी को बैंकों को कहना होगा कि वे ऋण देना शुरू करें और बैलेंस शीट के बारे में अपनी बनाई हुई धारणा पर आश्रित नहीं रहें। यह संप्रभु शक्ति का बेहतरीन इस्तेमाल होगा। हो भी क्यों न, आखिर अधिकांश बैंकों पर सरकार का ही तो कब्जा है। विमुद्रीकरण के बाद इन सभी बैंकों के पास भरपूर नकदी है। 
दूसरी बात, आरबीआई से और अधिक नकदी लेने की आवश्यकता है भले ही यह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्रभावित करे। आखिर 3 फीसदी के लक्ष्य की ही क्या वैधता है? छोटे देशों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह ठीक हो सकता है लेकिन भारत जैसे विशाल देश के लिए यह आंकड़ा सही नहीं है। हम आसानी से 5 फीसदी तक के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर रह सकते हैं। 
 
तीसरी बात, उन्हें जीएसटी की विविध दरों की समस्या को तत्काल हल करने की आवश्यकता है। शून्य, 18 और जरूरत पडऩे पर 43 फीसदी की दर। इतने से हमारा काम सुचारु रूप से चलेगा। इससे जीएसटी से जुड़ी अधिकांश समस्याओं का निदान हो जाएगा। 
 
चौथा, जरूरत इस बात की भी है कि जीएसटी की टर्नओवर सीमा को बढ़ाया जाए। इसे मौजूदा 20 लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये करने की आवश्यकता है। अनौपचारिक कारोबार जो कर नहीं चुकाते उनकी भी श्रम-अधिशेष अर्थव्यवस्था में अपनी अलग अहमियत है। एक करोड़ रुपये से कम टर्न ओवर वालों से पंजीयन के बाद आसानी से एक तयशुदा दर की मांग की जा सकती है।
 
पांचवां, मोदी को कर अधिकारियों द्वारा की जाने वाली निरंतर प्रताडऩा को भी रोकना होगा। इसकी शुरुआत जरूर संप्रग के कार्यकाल में हुई थी लेकिन अब वक्त है इस पर विराम लगाने का।  इससे कुछ हासिल नहीं हो रहा है उलटे नाखुशी का माहौल तैयार हो रहा है।
 
Keyword: india, economy, IIP,,
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