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दूर हों बाधाएं

संपादकीय /  October 02, 2017

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एक बार राजस्व निरपेक्ष हो जाए तो इसे और अधिक तार्किक बनाया जा सकता है। यहां तार्किक बनाने से तात्पर्य है कर दरों की संख्या तथा उनके दायरे में कमी। उदाहरण के लिए जेटली ने अगस्त में लोकसभा में एक चर्चा में कहा था कि 12 और 18 फीसदी की दरों को एक साथ मिलाया भी जा सकता है। यह मिश्रण कुछ इस तरह किया जा सकता है कि इससे महंगाई न बढ़े। 

 
फिलहाल जीएसटी के ढांचे में पांच कर दरें हैं-0, 5, 12, 18 और 28 फीसदी। इसके अलावा अतिरिक्त क्षतिपूर्ति उपकर भी इसका हिस्सा है। दरों को तार्किक बनाने का यह काम शुरुआत में ही कर लिया जाना चाहिए था, हालांकि कभी नहीं से तो थोड़ा देर से इसे अंजाम देना सही माना जाएगा। उस दृष्टिï से देखें तो मंत्री की रविवार की टिप्पणी में उन सभी लोगों के लिए आश्वस्ति है जो इसे लेकर चिंतित हैं। 
 
जहां तक जीएसटी की बात है तो कहीं और अधिक बड़े और अहम मुद्दे हैं जिन पर जेटली को तत्काल ध्यान देना चाहिए। जीएसटी व्यवस्था के कुछ अन्य पहलुओं के खिलाफ भी माहौल बन रहा है। ये पहलू अनुत्पादक साबित हुए हैं। जुलाई में जीएसटी लागू होने की हड़बड़ी के चलते शायद ऐसा हुआ हो। परंतु अब सरकार के पास इनमें से कुछ कमियों को दूर करने का पर्याप्त समय है। अब वक्त आ गया है कि हकीकत का सामना किया जाए। उदाहरण के लिए अब जबकि यह बात एकदम स्पष्टï है कि सरकार द्वारा तैयार किया गया मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक ढांचा मोटेतौर पर अपर्याप्त है तो वस्तुओं के परिवहन के लिए ई-वे बिल पर जोर देना सही नहीं है। यह उलटा पड़ सकता है। ई-वे बिल की व्यवस्था इसलिए की गई ताकि कर अधिकारी वस्तुओं की बिक्री पर नजर रख सकें और यह सुनिश्चित करें कि कर चुकाया जा रहा है। परंतु इससे विक्रेता या माल ढोने वाले पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा। इसका दुरुपयोग भी संभव है।
एक अन्य क्षेत्र जिसने करदाताओं को दिक्कत में डाला है वह है रिटर्न फाइल करने का मुद्दा। शुरुआत में तो सरकार ने हर महीने तीन रिटर्न दाखिल करने को कहा था। जब यह अव्यावहारिक साबित हुआ तो मासिक रिटर्न की व्यवस्था की गई। परंतु इसके बावजूद हर साल हर राज्य में फाइल किए जाने वाले रिटर्न की संख्या बहुत ही ज्यादा होने वाली है। 
 
रिटर्न फाइल करने से जुड़ा एक बड़ा काम है इनवॉइस का मिलान करना। अक्सर एक फर्म द्वारा जमा किए गए इनवॉइस उसके वेंडर या क्लाइंट के इनवॉइस से मेल नहीं खाते। ऐसा देरी की वजह से हो सकता है या उस स्थिति में जबकि कुछ ऑर्डर क्षतिग्रस्त हो गए हों। परंतु चूंकि सरकार ने साम्य वाले इनवॉइस की मांग की है इसलिए करदाताओं के अनुपालन की लागत बहुत बढ़ जाती है। मासिक समयसीमा के चलते वे पहले ही हड़बड़ी में रहते हैं। विशेषज्ञों ने कहा है कि इनवॉइस के मिलान की यह मांग दुनिया में किसी अन्य स्थान पर 
नहीं है।
 
ये उन तमाम बाधाओं में से चंद हैं जो जीएसटी के क्रियान्वयन में हमारे सामने आ रही हैं। जीएसटी जैसे अहम ढांचागत सुधार को राजनीतिक समझौतों की वजह से पहले ही नुकसान पहुंच चुका है। यह नुकसान नाना प्रकार की रियायतों, विविध कर दरों और ऊंची अवांछित कर दरों के रूप में हुआ है। सरकार अगर महत्त्वहीन परिचालन संबंधी मुद्दों को हल करने की दिशा में काम करती है तो यह बेहतर होगा क्योंकि वे जीएसटी के प्रभाव को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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