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सूखा घोषित करने को लेकर असमंजस में प्रदेश

संजीव मुखर्जी और साहिल मक्कड़ / नई दिल्ली 10 02, 2017

मॉनसून के सटीक पूर्वानुमान को लेकर मौसम विभाग और स्काईमेट के बीच एक बार फिर ठन गई है। स्काईमेट मौसम की भविष्यवाणी करने वाली देश की सबसे बड़ी निजी संस्था है। जून और जुलाई में मॉनसून की शुरुआत सामान्य रही लेकिन अगस्त और सितंबर के शुरू में लंबे अंतराल तक यह कमजोर रहा। इसके कारण मॉनसून में कुल मिलाकर बारिश सामान्य से कम रही। 2017 का दक्षिणपश्चिम मॉनसून सत्र शनिवार को समाप्त हो गया। 
 
इस दौरान सामान्य से 5 फीसदी कम बारिश हुई। मौसम की शब्दावली में इसे दीर्घावधि औसत के 95 फीसदी के साथ सामान्य से कम कहा जा सकता है। अलबत्ता मौसम विभाग ने पूरे सत्र के लिए दीर्घावधि औसत के 98 फीसदी के साथ सामान्य मॉनसून की भविष्यवाणी की थी। इसके 4 फीसदी कम या ज्यादा रहने की गुंजाइश थी। खासकर अगस्त और सितंबर के लिए मौसम विभाग ने दीर्घावधि औसत के 99 फीसदी के साथ सामान्य बारिश का अनुमान जताया था। इसमें 9 फीसदी कम या ज्यादा की गुंजाइश रखी गई थी। अगस्त में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश हुई जबकि सितंबर में यह सामान्य से करीब 12 फीसदी कम रही।
 
मौसम विभाग के मुताबिक बंगाल की खाड़ी के ऊपर सक्रिय प्रशांत महासागरीय चक्रवाती तूफानों ने मॉनसून की धाराओं को अपनी तरफ खींच लिया जिससे देश के मध्य और उत्तरी इलाकों से बारिश गायब हो गई और वहां सूखे के हालात पैदा हो गए। मौसम विभाग के महानिदेशक के जे रमेश ने कहा, 'पूर्वानुमान मॉडल में इस तरह के बदलाव का पता लगाना मुश्किल है लेकिन बुआई के आंकड़ों और जलाशयों में पानी के स्तर को देखने से लगता है कि पिछले सालों की तुलना में इस बार मॉनसून में रुकावट से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।' 
 
मॉनसून में रुकावट और पूर्वानुमान की सटीकता के संबंध में मौसम विभाग के दावों से स्काईमेट सहमत नहीं है। स्काईमेट के मुख्य कार्याधिकारी जतिन सिंह ने कहा, 'आमतौर पर अल नीनो की परिस्थितियां बनने के कारण मॉनसून में लंबे समय तक रुकावट आती है और हम हमेशा अपने पूर्वानुमान में इस बात को कहते हैं।' स्काईमेट का कहना है कि उसने मार्च में ही बता दिया था कि इस बार मॉनसून दीर्घावधि औसत के 95 फीसदी के साथ सामान्य से कम रहेगा और वह पूरे समय अपने इस पूर्वानुमान पर अडिग रहा। इसके उलट मौसम विभाग ने बार-बार पूर्वानुमान को अद्यतन किया और मॉनसून के सामान्य रहने का दावा किया। 
 
स्काईमेट ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक नोट में कहा, 'स्काईमेट वेदर ने 28 मार्च को मौसम की भविष्यवाणी की थी और मॉनसून खत्म होने तक हम इस पर अडिग रहे। दूसरे संस्थानों ने समय-समय पर अपने पूर्वानुमानों में बदलाव किए। यहां तक कि देश में मौसम की नोडल एजेंसी मौसम विभाग ने भी मॉनसून की भविष्यवाणी में बदलाव किया और इसे 96 फीसदी से 98 फीसदी किया।'
 
चिंताजनक संकेत
 
जहां मौसम विभाग और स्काईमेट पूर्वानुमानों के गलत होने के वास्तविक कारणों को ढूंढने में लगे हैं, वहीं आंकड़ों के मुताबिक 27 सितंबर तक देश में 660 जिलों में  से करीब 34 फीसदी में कम बारिश हुई है, जबकि बाकी 66 फीसदी जिलों में बारिश सामान्य रही है। पिछले साल इस दौरान 67 फीसदी जिलों में सामान्य और 33 फीसदी जिलों में कम बारिश हुई थी। आंकड़ों में यह स्थिति भले ही चिंताजनक नजर नहीं आ रही है लेकिन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, विदर्भ और दिल्ली में स्थिति चिंताजनक है जहां इस साल सामान्य से करीब 20 फीसदी कम बारिश हुई है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के 33 जिलों, उत्तर प्रदेश में 42 जिलों और ओडिशा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कुछ इलाकों को निगरानी सूची में रखा गया है जहां अगले कुछ हफ्तों में सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। 

सूखा है या नहीं 
 
खरीफ सत्र के लिए राज्य 30 अक्टूबर तक किसी इलाके को सूखा घोषित कर सकते हैं जबकि रबी सत्र के लिए 31 मार्च तक इसकी घोषणा की जा सकती है। रमेश ने कहा, 'अभी तक किसी भी राज्य ने किसी जिले या किसी इलाके को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया है। लेकिन कई राज्यों ने अब तक  इसे निगरानी सूची में रखा है।' उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि देश के कुछ मध्य और उत्तरी इलाकों में 8-10 अक्टूबर तक बारिश की संभावना है। सूखे की घोषणा के बारे में पिछले साल लाए गए संशोधित दिशानिर्देशों के कारण राज्यों के लिए भी सूखा घोषित करना मुश्किल हो रहा है। दिशानिर्देशों में बदलाव के कारण केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों को कम बारिश के बावजूद सूखा घोषित करना मुश्किल हो रहा है। नए दिशानिर्देश अंतरराष्टï्रीय व्यवस्थाओं पर आधारित है और इसे उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बनाया गया है। इनके मुताबिक अगर कोई राज्य किसी इलाके को सूखाग्रस्त घोषित करना चाहता है तो उसे बारिश, वनस्पति, जल विज्ञान सूचकांक, फसल संबंधी सूचकांक, जमीनी सत्यापन और दूसरे मानकों को पूरा करने की जरूरत है। जब किसी जिले को सूखाग्रस्त घोषित किया जाता है तो संबंधित राज्य को राष्टï्रीय आपदा राहत कोष से आर्थिक सहायता मिलती है। कम सूखे की स्थिति में राज्यों को खुद ही इससे निपटने के उपाय करने पड़ते हैं। सूखे से संबंधित पिछले दिशानिर्देशों में मानक ज्यादा कड़े नहीं थे।
 
समस्या वाले राज्य
 
केरल सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'नए दिशानिर्देशों ने केरल और पूर्वाेत्तर जैसे नमी वाले राज्यों के लिए समस्या खड़ी कर दी है। इसके लिए बुलाई गई सचिव स्तर की बैठक में हमने इस पर आपत्ति जताई थी। 300 पन्नों की मसौदा रिपोर्ट पर सुझाव देने के लिए हमें केवल 15 दिन का समय दिया गया था।' केरल के मंत्रियों और अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल केंद्र सरकार को ज्ञापन देने की तैयारी कर रहा है। अधिकारी ने कहा कि केरल और पूर्वाेत्तर में सूखे का ज्यादा संबंध पेयजल से है। उन्होंने कहा, 'जलाशय के पानी से फसल उगाई जा सकती है लेकिन हमारा इलाका ऐसा है कि बारिश के पानी को जमा नहीं किया जा सकता है। भूजल का स्तर पहले ही घट रहा है और हमने राज्य में हैंड पंप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है।' कर्नाटक के कई जिलों में भी इस साल कम बारिश हुई है। राज्य ने इस बारे में अपनी चिंताओं से केंद्र सरकार को वाकिफ कराया है और प्रधानमंत्री को भी ज्ञापन भेजा है।
 
कुछ राज्यों ने की नए दिशानिर्देश की वकालत
 
मध्य प्रदेश जैसे भारतीय जनता पार्टी राज्य 30 फीसदी जिलों में सामान्य से कम बारिश के बावजूद नए दिशानिर्देशों का पालन करना चाहते है। राज्य के प्रधान सचिव (राजस्व) अरुण पांडे ने कहा, 'नए दिशानिर्देश ज्यादा वैज्ञानिक हैं। केंद्र सरकार ने दूर संवेदी और भूमिगत जल के आंकड़ों का ब्योरा मांगा है और मुझे नहीं लगता है कि इस पर किसी को आपत्ति होनी चाहिए। हम नए दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हैं।' क्या देश के कुछ इलाके सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं? अगर ऐसा होता है तो इससे अर्थव्यवस्था की हालत और बदतर हो सकती है और कृषि संकट गहरा सकता है। इस बारे में आने वाले महीनों में ही स्थिति साफ होगी।
Keyword: agri, farmer, monsoon,,
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