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भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पद्र्धी क्षमता की परीक्षा का वक्त

अभिषेक वाघमारे /  October 01, 2017

अमेरिकी विद्वान थॉमस पेन ने 18वीं शताब्दी के परंपरागत सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने के लिए मुक्त व्यापार का समर्थन किया था लेकिन उनके समकालीन आयरलैंड के एंडमंड बर्के का मानना था कि मुक्त व्यापार उपयोगिता पर नहीं बल्कि न्याय पर आधारित है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के तीन महीने बाद भारत में कम से कम निर्यातकों के लिए मुक्त व्यापार की परीक्षा हो रही है। जीएसटी लागू होने से पहले भारत से निर्यात लगभग मुफ्त था मगर थोड़े ही समय में यह बहुत महंगा हो गया है। उद्योग के जानकारों का कहना है कि इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पद्र्घा क्षमता प्रभावित होगी। जीएसटी लागू होने के बाद पहली तिमाही में रिफंड में देरी और ड्यूटी ड्रॉबैक में कमी जैसी वित्तीय अड़चनों ने अंतरराष्टï्रीय मांग के बरकरार रहने के बावजूद निर्यात की हवा निकाल दी है, निर्यात करने वाली कंपनियों में कुशल रोजगार का टोटा पड़ गया है, छोटी और मझोली कंपनियों की रफ्तार थम गई है और नए तथा बेहतर व्यापार अनुबंध मिलने की संभावना घट गई है। 

 
भारतीय निर्यातकों की संस्था फियो के निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी अजय सहाय ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'भारतीय निर्यातक अर्थव्यवस्था के पैमाने पर निर्भर करते हैं और इसकी प्राप्ति के लिए वे नकदी को साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जीएसटी लागू होने के बाद पहली तिमाही में नकदी में कमी आई है।' भारत इस सिद्घांत में यकीन करता है कि कर निर्यात के लिए नहीं होते हैं और जीएसटी के तहत भी निर्यात पर कोई कर नहीं है। लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद निर्यातकों को शुरुआती देर में ही ज्यादा कर देना पड़ रहा है। निर्यात की बिक्री के बाद ही बाद में चरण में इनपुट टैक्स उपलब्ध होगा। अक्टूबर शुरू हो गया है लेकिन जुलाई के लिए दाखिल किए गए रिटर्न को अभी प्रोसेस नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप जीएसटी रिफंड के रूप में कंपनियों का पैसा सरकार के पास फंस गया है।
 
परिधान क्षेत्र के संकेत
 
एक बड़ी परिधान निर्यात कंपनी के प्रॉडक्शन मैनेजर ने कहा कि नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी के कारण पहली बार कंपनी का उत्पादन बड़े पैमाने पर गिर रहा है। कंपनी की हरियाणा स्थित फैक्ट्री में मई के पहले सप्ताह में 600 लोगों को रोजगार मिल रहा था लेकिन सितंबर के अंतिम सप्ताह में यह संख्या घटकर 440 रह गई। सितंबर के दूसरे सप्ताह में तो यह संख्या 399 तक पहुंच गई थी। मैनेजर ने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है। कंपनी ने एक प्रोडक्शन लाइन में मशीनों की संख्या 45 से घटाकर 36 कर दी ताकि फैक्ट्री खाली न लगे। फैक्ट्री में अप्रैल में जहां 60,000 परिधान बनाए गए वहीं सितंबर में यह संख्या घटकर 40,000 रह गई।
 
छोटी-मझोली कंपनियों पर बड़ी मार 
 
बड़ी कंपनियों ने जीएसटीएन के तहत पंजीकरण किया है लेकिन आमतौर पर उनके लिए वेंडर का काम करने वाली छोटी कंपनियां अपने बहुत कम मुनाफे के कारण पंजीकरण से खौफजदा हैं। बड़ी कंपनियां कपड़ों पर कढ़ाई करने जैसे काम छोटी कंपनियों को देते हैं। उदाहरण के लिए 50 कर्मचारियों वाली छोटी कंपनी ए ने तो तुरंत जीएसटीएन में पंजीकरण करवा लिया लेकिन 15-20 कर्मचारियों वाली कंपनी बी के लिए ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि इससे उसका लाभ खत्म हो जाएगा। बी अब ए के माध्यम से अनुबंध दे रही है, उसे कमीशन दे रही है और अपने मुनाफे को थोड़ा कम कर रही है। बी कंपनी ने अपने 15 कर्मचारियों में से 4 की छुट्टïी कर दी है। परिधान निर्यात संवद्र्घन बोर्ड के वाइस चेयरमैन एचकेएल मागू ने कहा, 'निर्यातक कंपनियों का 5-6 फीसदी सालाना टर्नओवर रुक गया है जबकि छोटी कंपनियों के मामले में यह 10 फीसदी है।'
 
परिधान क्षेत्र एक अजीब दौर से गुजर रहा है क्योंकि यार्न पर इनपुट टैक्स क्रेडिट उपलब्ध नहीं है। मागू ने कहा, 'विस्कोस यार्न पर जीएसटी 18 फीसदी है जबकि इस यार्न के इस्तेमाल से बनने वाले फैब्रिक पर जीएसटी की दर 5 फीसदी है। फैब्रिक बनाने वाली कंपनी यार्न पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा नहीं कर सकती इसलिए पूरा कर तैयार फैब्रिक के मूल्य में जोड़ दिया जाता है।' इससे बांग्लादेश जैसे देशों से परिधान निर्यात सस्ता पड़ रहा है। नतीजतन भारतीय निर्यातकों को उन खरीदारों के साथ निभाना पड़ रहा है जिनके साथ उनके दीर्घकालिक रिश्ते हैं।
 
चमड़ा उद्योग भी संकट में 
 
आगरा की कंपनी डावर फुटवियर के मालिक पूरन डावर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, 'अंतरराष्टï्रीय बाजार में भारतीय जूते अपनी गुणवत्ता और किफायत के लिए जाने जाते हैं। लेकिन जूता बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर 18 फीसदी और 28 फीसदी की दर से जीएसटी लगता है जो पहले से ज्यादा है।' जीएसटी लागू होने से पहले चमड़े के सामान का निर्यात करने वाली कंपनियां अपना अधिकांश काम छोटी कंपनियों से कराती थीं जिन्हें उनके छोटे आकार के कारण उत्पाद शुल्क से छूट मिली थी। डावर ने कहा, 'आज हमें जीएसटीएन पंजीकृत कंपनियों से कराना पड़ता है और फिर रिफंड के लिए इंतजार करना पड़ता है।' उनकी फैक्ट्री में जूतों के उत्पादन में प्रतिदिन 20 फीसदी की गिरावट आई है।
 
बड़ी निर्यातक कंपनियों के छोटे-छोटे काम करने वाली कंपनियों की हालत खस्ता है। जूतों की छोटी फैक्ट्री चलाने वाले भरत सिंह कहते हैं, 'जूते बनाने में प्रमुख कच्चा माल तला और चमड़ा होता है। इससे जूते की कीमत 150 से 183 फीसदी बढ़ गई है क्योंकि मुझे जीएसटी अग्रिम देना पड़ता है।' वह इस बात से परेशान हैं कि त्योहारों के दौरान कारोबार बढऩे के बजाय घट रहा है। निर्यात उद्योग को अब सरकार से मदद की उम्मीद है। सहाय ने कहा, 'हमने अपनी मांगें वित्त मंत्री के समक्ष रख दी हैं और हमें उम्मीद है कि सरकार जल्दी ही इन पर कदम उठाएगी।'
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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