बिजनेस स्टैंडर्ड - सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के हालात
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सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के हालात

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 29, 2017

 

बीते वर्ष हुई सर्जिकल स्ट्राइक से हमने क्या खोया और क्या पाया, इसका आकलन करते वक्त दो तरह के प्रमाण हमारे सामने हैं। पहले वो जिन्हें राजनीतिक नेतृत्व के कहने पर सैन्य प्रतिष्ठïान प्रस्तुत कर रहा है। इसके लिए संवाददाता सम्मेलन जैसा पारंपरिक तरीका नहीं अपनाया गया जहां कोई जनरल आकर लेजर पेन की मदद से स्क्रीन पर ऑपरेशन के बारे में बताए और तस्वीरें दिखाए। या फिर जहां प्रमाण के तौर पर ऑपरेशन से हुई बरामदगी दिखाई जाए। यह काम अब पारंपरिक समाचार माध्यमों के जरिये किया जा रहा है। 
 
दूसरा, सर्जिकल स्ट्राइक की पहली वर्षगांठ पर दो महत्त्वपूर्ण किताबें आई हैं। दोनों किताबें प्रमुख रक्षा संवाददाताओं की लिखी हैं जिनका सैन्य और राजनैतिक हलकों में अच्छा दखल है। दोनों लेखकों को सैन्य अभियानों की कवरेज का अनुभव है इसलिए उनकी किताबों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। दोनों ने कहा है कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई। इसका प्राथमिक प्रमाण है विशेष बलों के युवा अधिकारियों का साक्षात्कार। वरिष्ठï जनरलों और राजनेताओं के उद्घरण भी इसका हिस्सा हैं। इन्हें स्ट्राइक के आंतरिक राजनीति इरादे के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। मैं कहना चाहूंगा कि एक लोकतांत्रिक देश में यह पूरी तरह वैध लक्ष्य है। टेलीविजन चैनलों पर इसे लेकर हो रही बचकानी कवरेज जरूर अविश्वास पैदा करती है। नकाब पहने हुए वर्दीधारी पैरा-कमांडो अधिकारियों के 'साक्षात्कार' इसका हिस्सा हैं। उड़ी हमलों के समय वे कितने नाराज थे, कैसे स्ट्राइक की योजना बनी और कैसे सफल हमले के बाद वे लौट आए। इस दौरान टीवी स्क्रीन पर इन्फ्रा रेड हरे नाइट विजन कैमरों की तस्वीरें तैरती रहती हैं जो कथित रूप से सैन्य अभियान की हैं। इस दौरान कैमरा कई बार कमांडो के साथ-साथ आतंकियों को भी कैद करता है जिन्हें गोली लगते दिखती है। काफी कुछ सनी देओल की फिल्मों की तरह।
 
अगर इन वीडियो को बहुत सतही स्तर का मान लिया जाए तो भी तीन बातें हैं: पहली, इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई। दूसरा, भारतीय विशेष बल बिना किसी गंभीर नुकसान के हमला करने के बाद वापस लौट आए क्योंकि नुकसान छिपाना संभव नहीं। तीसरा, कोई यह दावा नहीं कर रहा है कि इन हमलों से कौन सा लक्ष्य हासिल हुआ? सैन्य अभियान के दो पहलू हैं। नीतिगत और सामरिक। नीतिगत रूप से सर्जिकल स्ट्राइक सफल रही, हालांकि दोनों ही पक्षों ने नुकसान और हताहत होने वालों का कोई आंकड़ा नहीं दिया। परंतु यह माना जाना चाहिए कि नियंत्रण रेखा के पार जाकर एक खतरनाक सैन्य कार्रवाई की गई। इस दौरान जबरदस्त पेशेवर हुनर का प्रदर्शन किया गया। इस दौरान जबरदस्त गोपनीयता बरती गई। 
 
स्ट्राइक के व्यापक सामरिक लक्ष्य के बारे में कुछ नहीं कहा गया। क्या यह पाकिस्तान को यह बताने की कोशिश थी कि जब भी वह उड़ी जैसी हरकत करेगा तो उसे जवाबी हमला झेलना होगा? या फिर उसे भविष्य के हमलों से रोकने के लिए ऐसा किया गया? बीते वर्ष के उदाहरण बताते हैं ऐसा कुछ नहीं हुआ है। कम से कम दूसरी बात तो नहीं ही हुई। मेरे सहयोगी मनु पबी देश के सुप्रसिद्घ रक्षा संवाददाताओं में से एक हैं। उन्होंने आधिकारिक रिकॉर्ड का शोध करके आंकड़े जुटाए हैं। इसमें संसद में पूछे गए प्रश्न भी शामिल हैं। शोध बताता है कि इस वर्ष नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की हरकतें कम होने के बजाय और बढ़ गई हैं। उदाहरण के लिए इस वर्ष 11 जुलाई तक 228 बार युद्घविराम का उल्लंघन हुआ। वर्ष 2016 में पूरे साल में इतनी घटनाएं हुई थीं। हालांकि बीएसएफ द्वारा प्रबंधित अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हालात सुधरे हैं। वहां इसी अवधि में पिछले साल युद्घविराम उल्लंघन की 221 घटनाएं हुई थीं जो इस साल मात्र 23 हैं। परंतु यह सीमा नियंत्रण रेखा से एकदम अलग है। गत वर्ष नियंत्रण रेखा पर जहां आठ भारतीय जवान मारे गए थे (इसमें उड़ी का आंकड़ा शामिल नहीं है), वहीं इस वर्ष 11 जुलाई तक यह तादाद चार है। ये आंकड़े लोकसभा में रक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुभाष भामरे द्वारा दिए गए जवाब से लिए गए हैं। उड़ी जैसे और हमले करने के प्रयास भी हुए जिन्हें सतर्कता से टाल दिया गया। 
 
राज्य सभा में डॉ. भामरे ने नियंत्रण रेखा पर नाकाम की गई घुसपैठ की कुछ घटनाओं का भी आंकड़ा दिया। वर्ष 2016 में ऐसी 27 घटनाएं हुई थीं, वहीं इस वर्ष जुलाई तक ही यह आंकड़ा 16 तक पहुंच गया है। कुलमिलाकर औसत बरकरार है। हां सेना की यह उपलब्धि अवश्य है कि मरने वाले घुसपैठियों की तादाद बढ़ गई है। पिछले वर्ष कुल मिलाकर 37 घुसपैठिए मारे गए थे जबकि इस साल जुलाई तक ही यह आंकड़ा 36 हो चुका है। इससे पता चलता है कि नियंत्रण रेखा का प्रबंधन बेहतर हुआ है। लेकिन समग्रता में देखें तो आंकड़े बताते हैं कि अगर सर्जिकल स्ट्राइक का लक्ष्य भविष्य के हमलों को रोकने का था तो इसमें नाकामी मिली है। 
 
सामरिक विज्ञान और सैन्य बुनावट की यही प्रवृत्ति होती है। वहां नए सॉफ्टवेयर या ऐप की तरह आए दिन नए विचार सामने नहीं आते। दो दशक पहले सैन्य मामलों में एक अहम क्रांति हुई थी जो युद्घ में नई तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ी थी। सन 2005 में ब्रिटिश जनरल रुपर्ट स्मिथ की किताब द युटिलिटी ऑफ फोर्स आई जिसकी काफी सराहना हुई। इस पुस्तक में अधिकांश बहस (मैंने वैश्विक प्रभाव वाली 10 समीक्षाओं में से छह पढ़ीं) चार शब्दों वाले भड़काऊ वाक्य से शुरू हो रही थी: 'अब युद्घ का अस्तित्व नहीं रहा।'
 
यह बहुत मारक वाक्य था। उन्होंने कहा कि पारंपरिक औद्योगिक पैमाने पर होने वाले युद्घ में जहां बड़े पैमाने पर इंसान और मशीनें एक दूसरे पर सीधी जीत हासिल करने के लिए भिड़ते थे, उनका वक्त बीत गया है। उन्होंने कहा कि नई जंग लोगों के बीच या लोगों से होगी। ये युद्घ कम तीव्रता वाले और बंटे हुए भौगोलिक क्षेत्र या समय में होंगे। बड़ी और भारी-भरकम सेनाएं इन युद्घों को किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा पाएंगी। उन्होंने कहा कि ऐसे में इस तरह की जंग की कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। 
 
आगे कहा गया कि ऐसे युद्घ शायद कभी समाप्त नहीं भी हो सकते। इजरायल और अमेरिका इसका उदाहरण हैं जो क्रमश: अपने पड़ोस और अफगानिस्तान में उलझे हुए हैं। कुछ मामलों में मामला और जटिल हो जाता है जब देशों को लोगों के भड़काव का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए कश्मीर में भारत, जहां पाकिस्तान के रूप् में एक दूसरा देश नियंत्रण रेखा के दोनों ओर लोगों के साथ संपर्क में है। 
 
इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि सर्जिकल स्ट्राइक की सामरिक सफलता की तुलना में हमें नीतिगत सफलता हासिल नहीं हो सकी। आतंकियों की जान जाने का पाकिस्तान पर कोई असर नहीं हो रहा है क्योंकि बतौर संसाधन उनकी कोई कमी नहीं है बल्कि वे बढ़ ही रहे हैं। इस अपारंपरिक युद्घ में उनको सैन्य तरीके से रोकने के लिए ऐसी स्ट्राइक बार-बार करनी पड़ सकती हैं। जाहिर है एकतरफा कार्रवाई। क्या भारत, पाकिस्तान पर ऐसी कार्रवाई बार-बार कर सकता है। 
 
देश में इन दिनों दो उदाहरण खूब चल रहे हैं: फिलीस्तीनी इलाकों पर इजरायल की छापेमार कार्रवाई और अफगानिस्तान-पाकिस्तान के इलाके और अब आईएसआईएस के इलाके पर अमेरिकी ड्रोन हमले। दोनों देश पूरी तरह सैन्य असममिति और हवाई श्रेष्ठïता के माहौल में काम करते हैं। बिना हवाई श्रेष्ठïता के ड्रोन भी बहुत कामयाब नहीं होंगे क्योंकि वे बेहतर हवाई रक्षा प्रणाली का सामना नहीं कर सकते। भारत को खुद से यह पूछना होगा कि क्या वह रक्षा व्यय में उल्लेखनीय वृद्घि करना चाहता है। शायद उसे जीडीपी के मौजूदा 2 फीसदी से बढ़ाकर दोगुना करना पड़ेगा। राजीव गांधी ने सन 1987-88 में इसे बढ़ाकर 3.38 फीसदी किया था। परंतु सन 1990-91 का आर्थिक संकट भी काफी हद तक उनकी वजह से ही था। अगर यही प्रतिरोध का एकमात्र तरीका है तो भारत को गहरी सांस लेकर प्रतिबद्घता के साथ इस दिशा में आगे बढऩा चाहिए। क्या इसके और किफायती तरीके हैं? देश के सामरिक समुदाय को इस विषय पर बहस करनी चाहिए बजाय कि सर्जिकल स्ट्राइक की वर्षगांठ पर रस्म अदायगी के।
Keyword: india, surgical strike,,
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