बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक हालात में सुधार पर रखनी होगी नजर
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आर्थिक हालात में सुधार पर रखनी होगी नजर

अजय छिब्बर /  September 28, 2017

उच्च ब्याज दर और अवमूल्यन के कम जोखिम के साथ पोर्टफोलियो आवक में तेजी से वृद्घि हुई है। इससे रुपया मजबूत हो रहा है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं अजय छिब्बर 

 
मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में बड़ी  उम्मीदों के बीच काम संभाला था। उसने भ्रष्टाचार में डूबी हुई संप्रग सरकार का स्थान लिया था जिसके कार्यकाल में महंगाई बढ़ी थी और वृद्घि दर में तेजी से कमी आई थी। परंतु तीन साल बाद विकास का इंजन बेपटरी नजर आ रहा है। शुरुआती दो साल में अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार नजर आया। मोदी सरकार को उस वक्त कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट का लाभ मिला। जीडीपी वृद्घि दर जो वर्ष 2014-15 की तीसरी तिमाही में 6 फीसदी थी, वह 2015-16 की चौथी तिमाही में 9.1 फीसदी तक पहुंच गई। महंगाई कम होने की चौतरफा सराहना हुई और देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था करार दिया गया। चीन से भी तेज। 
 
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक जीडीपी में 3-4 फीसदी की इस तेजी ने मोदी की आर्थिक टीम की सहायता की और उसने निजी निवेश में आ रही कमी की अनदेखी कर दी। बैंकों के फंसे हुए कर्ज पर भी जरूरी ध्यान नहीं दिया गया जो अब बढ़कर 19,000 करोड़ डॉलर हो चुका है। यह राशि जीडीपी के 8 फीसदी के बराबर है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय यह राशि बमुश्किल 4,000 करोड़ डॉलर थी। 
 
गंभीर सुधारों के अभाव में और बड़ी नीतिगत गलतियों के चलते सुधार की प्रक्रिया ठहर गई और अब लगातार छह तिमाहियों से जीडीपी में गिरावट देखने को मिल रही है। ताजातरीन तिमाही में जीडीपी वृद्घि दर 5.7 फीसदी रही जो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सबसे धीमी गति है। निवेश का स्तर भी गिरकर जीडीपी के 30 फीसदी से कम हो गया है और क्षमता के कम इस्तेमाल के बीच वह लगातार गिर रहा है। 
 
वृद्घि दर में गिरावट का दौर मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी किए जाने के पहले ही शुरू हो गया था। गत वर्ष 8 नवंबर को की गई नोटबंदी ने एक झटके में 86 फीसदी मुद्रा चलन से बाहर कर दी। यह कदम कालेधन के खिलाफ था लेकिन पूरी तैयारी न होने से इसने जबरदस्त आर्थिक झटका दिया। इसकी वजह से जीडीपी में एक फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है। इसका पूरा प्रभाव कुछ तिमाहियों के बाद ही आंका जा सकेगा। नया वस्तु एवं सेवा कर कानून आने के बाद सरकार की सुधार संबंधी विश्वसनीयता मजबूत होनी चाहिए थी। अल्पावधि में इसकी जटिलता और जटिल क्रियान्वयन ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया। 
 
जीडीपी में गिरावट की जड़ें कहीं अधिक गहरी हैं और इस समस्या का तत्काल हल आवश्यक है। तीन नीतिगत मुद्दे ऐसे हैं जो लंबी अवधि के सुधार के लिहाज से अहम हैं। पहला आरबीआई का मौद्रिक नीति ढांचा जो मुद्रास्फीति को लक्षित कर रहा है। इस सरकार ने बिना इसके निहितार्थ को समझे इसे अपना लिया। मुद्रास्फीति को लक्षित करने में यह बात निहित है कि केंद्रीय बैंक पहले मुद्रास्फीति पर ध्यान देगा, बाद में विकास पर। 
 
विडंबना यह है कि भारत जैसे विकासशील देश में जहां खाद्य महंगाई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के 40 फीसदी के बराबर है और जिस पर आरबीआई का कोई नियंत्रण नहीं है वहां मुद्रास्फीति को लक्षित करने का ढांचा अनुत्पादक हो सकता है। इसलिए क्योंकि अगर खाद्य कीमतें आपूर्ति क्षेत्र के झटके से बढ़ती हैं तो सीपीआई अधिक रहता है और आरबीआई द्वारा ब्याज दरें ज्यादा रखने का असर वृद्घि पर पड़ता है। 
 
इतना ही नहीं जैसा कि हमने हाल में देखा, आरबीआई मौजूदा मुद्रास्फीति को लक्षित नहीं करता बल्कि भविष्य की संभावनाओं पर पहल करता है। आरबीआई ने बीते तीन साल में ऐसे अनुमान जताने में कई गलतियां की हैं और ब्याज दर ऊंची बनाए रखी। यही वजह है कि वास्तविक रीपो दर 2014 के 50 आधार अंक से बढ़ते हुए आज 600 आधार अंक पर है। वास्तविक ऋण वृद्घि जो 2011-14 में औसतन 18 फीसदी थी वह 2017 में गिरकर 6 फीसदी रह गई। इससे निवेश और जीडीपी वृद्घि दोनों में गिरावट आई। दूसरा मुद्दा है विनिमय दर का। उच्च ब्याज दर और अवमूल्यन की कम आशंका के साथ पोर्टफोलियो की आवक में तेजी से सुधार हुआ है। इसके चलते वर्ष 2014 से अब तक रुपया 15-20 फीसदी तक मजबूत हुआ है। इसका निर्यात पर बुरा असर हुआ और निर्यात बढ़ा। इससे घरेलू क्षमता, निवेश और वृद्घि तीनों प्रभावित हुए। वर्ष 2011 से 2014 के बीच औसत निर्यात 26-27 अरब 
डॉलर प्रति माह था जो 2014-2017 के बीच घटकर 22-23 अरब डॉलर रह गया है। 
 
हमें अल्पावधि की पोर्टफोलियो आवक को हतोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए ब्याज दर में कमी समेत अन्य उपाय अपनाने चाहिए। एक बड़ा संकेत यह भी हो सकता है कि मुद्रास्फीति को निशाना बनाने की प्रवृत्ति समाप्त की जाए। कोशिश यह भी हो कि मुद्रास्फीति को लेकर भविष्य के अनुमान लगाने के बजाय वर्तमान स्तर पर कदम उठाए जाएं। बैंकों को भी अपनी ऋण दर को स्वत: समायोजित करना चाहिए ताकि रीपो दर से तालमेल कायम हो। रुपये के मूल्य में कमी और अधिमूल्यन में सुधार आवश्यक है। 
 
तीसरा, दोहरी बैलेंस शीट की समस्या को हल करने के लिए गंभीर योजना बनाने की आवश्यकता है क्योंकि इसके चलते निवेश रुका हुआ है और सुधार नहीं हो पा रहा है। सरकार बैंकों के विलय पर विचार कर रही है। परंतु बिना आक्रामक ढंग से निस्तारण और पुनर्पूंजीकरण के केवल विलय से समस्या हल नहीं होने वाली। ऐसे में सरकार को बॉन्ड जारी करने की जरूरत है। 
 
आर्थिक समीक्षा में जिस आरबीआई बॉन्ड का सुझाव है वह पहले से कमजोर आरबीआई को और दिक्कत में डालेगा। घरेलू बॉन्ड से नकदी कम होगी और नए निवेश का माहौल बनेगा। एक विकल्प अंतरराष्ट्रीय सॉवरिन बॉन्ड का भी है। भारतीय स्टेट बैंक जैसा बड़ा बैंक भी पुनर्पूंजीकरण के लिए बॉन्ड जारी कर सकता है। सॉवरिन बॉन्ड से बाहरी घाटा बढ़ेगा लेकिन यह सस्ता विकल्प हो सकता है क्योंकि बाहर ब्याज दर कम है। बैंकों को बेचे गए पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड का इस्तेमाल भी हो सकता है लेकिन इससे घरेलू कर्ज बढ़ेगा। इसका असर रेटिंग्स पर पड़ सकता है। 
 
अधिक आक्रामक ढंग से निजीकरण को अपनाकर भी धन जुटाया जा सकता है। इससे बुनियादी विकास के लिए निवेश आ सकता है और बैंकिंग क्षेत्र की साफ-सफाई में भी मदद मिल सकती है। कृषि बाजारों का विनियमन भी सकारात्मक कदम होगा। इससे भी कृषि क्षेत्र में सुधार आएगा। यह कर्ज माफी से अधिक उपयोगी कदम हो सकता है क्योंकि उसने पहले से खस्ता सरकारी खजाने पर और बोझ डाला है। वर्ष 2019 का आम चुनाव जीतने के क्रम में यह बात याद रखनी होगी कि संप्रग को 2014 के आम चुनाव में खराब अर्थव्यवस्था की कीमत चुकानी पड़ी थी। 
Keyword: india, economy, IIP, rupee,,
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