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आर्थिक सलाहकार परिषद के बाद क्या होगी नीति आयोग की भूमिका!

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 27, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया है जो महत्त्वपूर्ण आर्थिक मामलों पर उन्हें सलाह देने के साथ अपने विचारों से अवगत भी कराएगी। लेकिन नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय की अध्यक्षता में आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन संभवत: देर से उठाया गया कदम है। मोदी सरकार का दो-तिहाई कार्यकाल पूरा हो चुका है। बाकी बचे हुए कार्यकाल में अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी को ही तवज्जो दिए जाने की संभावना है। चुनाव तक सरकार के कामकाज की दिशा और दशा सोची-समझी आर्थिक सलाह के बजाय चुनावी राजनीति से संचालित होने की उम्मीद करना बेमानी भी नहीं है।

 
राजनीतिक जरूरतों को समझने में नाकाम विवेकपूर्ण आर्थिक नीतियां लोकतंत्र में कारगर नहीं हो पाती हैं। भारत का पिछला अनुभव बताता है कि सरकार की राजनीतिक बाध्यताएं इतनी बड़ी होती हैं कि वे सरकारी संस्थाओं की तर्कसंगत आर्थिक सलाह पर भी भारी पड़ जाती हैं। इस तरह चुनाव करीब होने पर अच्छी-भली आर्थिक नीतियों से संबंधित सुझावों को भी अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है। आर्थिक नीतियों को राजनीतिक रूप से मुफीद बनाने के लिए उन्हें तोड़ा-मरोड़ा भी जाता है। यह अलग बात है कि मनचाहे नतीजे हासिल करने के लिए ऐसा करना आर्थिक रूप से गलत होता है।
 
आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन इस समय होने की शायद यह वजह है कि सरकार को लगातार आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विकास की रफ्तार धीमी हुई है, कच्चे तेल की कीमतें स्थिर बनी रहने पर मुद्रास्फीति सहज दायरे को पार कर सकती है, राजस्व में कमी आने की आशंका और निवेश प्रोत्साहन पैकेज की मांग आने से चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को लक्षित दायरे के भीतर रखना भी चुनौतीपूर्ण लग रहा है, निर्यात अभी तक तेजी नहीं पकड़ पाया है, चालू खाते का घाटा बढ़ चुका है और धन की आसान उपलब्धता के मामले में वैश्विक परिवेश में बदलाव होने से भारतीय रुपये पर दबाव देखने को मिल सकता है। उम्मीद यही है कि परिषद का गठन इन्हीं मुद्दों पर ध्यान देने के लिए किया गया है। 
इस लिहाज से सरकार का इस सलाहकार परिषद को स्वतंत्र दर्जा देने का बयान आश्वस्त करता है। आर्थिक घटनाओं का स्वतंत्र आकलन और उसके लिए जरूरी नीतिगत कदमों के बारे में स्वतंत्र परामर्श देना इस परिषद की प्रभावकारिता और विश्वसनीयता तय करने में प्रमुख कारक होगा। इसे असरदार बनाने में इस पहलू का भी खासा योगदान होगा कि प्रधानमंत्री का इस परिषद के अध्यक्ष और उसके सदस्यों के प्रति कितना भरोसा बना रहता है।
 
अगर पिछली सरकारों के दौरान गठित सलाहकार परिषदें असरदार और भरोसेमंद तरीके से काम कर पाई थीं तो इसकी वजह यह थी कि परिषद के अध्यक्ष रहे सुखमय चक्रवर्ती, सुरेश तेंडुलकर या सी रंगराजन सभी को तत्कालीन प्रधानमंत्रियों से पूरी स्वतंत्रता मिली थी और उन्हें उनका भरोसा भी हासिल था। मोदी सरकार को यह समझना होगा कि आर्थिक सलाहकार परिषद जैसी संस्था का गठन कर देना ही काफी नहीं है, इससे भी अधिक अहम यह है कि उसे काम करने की आजादी मिले और उसके सुझावों पर ध्यान दिया जाए।
 
वित्त मंत्रालय के लिए इसके क्या मायने हैं? अभी तक आर्थिक मामलों में प्रधानमंत्री पूरी तरह से वित्त मंत्रालय पर निर्भर रहे हैं। लेकिन परिषद के वजूद में आने के बाद इस निर्भरता में गुणात्मक बदलाव आएंगे। वित्त मंत्रालय के भीतर सलाह की गहराई को देखते हुए प्रधानमंत्री आगे भी नॉर्थ ब्लॉक से जानकारियां लेते रहेंगे। लेकिन परिषद के रूप में अब उनके पास सलाह लेने का एक नया जरिया होगा और सरकारी व्यवस्था के भीतर दूसरी राय लेने का एक अवसर भी मिलेगा।
 
इसी के साथ परिषद बनने से आर्थिक नीतियों को तय करने में लोकसेवकों के प्रभाव और अर्थशास्त्रियों की राय के बीच जरूरी संंतुलन भी स्थापित हो सकेगा। मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार अर्थशास्त्रियों को आर्थिक मामले तय करने में अहमियत मिलने की संभावना है। उनकी राय को लोक सेवक आसानी से खारिज भी नहीं कर पाएंगे। इस लिहाज से भी यह फैसला स्वागतयोग्य है।
 
परिषद के गठन के बाद नीति आयोग की भूमिका पर भी अहम सवाल खड़ा होता है। क्या आयोग को नए मॉडल पर काम करना होगा क्योंकि अब सरकार को आर्थिक सलाह देने के लिए एक विशेषज्ञ संस्था बन चुकी है। नीति आयोग के पास प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय एजेंडा का प्रारूप सौंपने, राज्यों की विकास संभावनाओं का दोहन करने में उनकी मदद करने, समावेशी विकास सुनिश्चित करने और अंतर-विभागीय एवं अंतर-क्षेत्रीय मुद्दों का निपटारा कर विकास एजेंडे को लागू करने में मदद देने का दायित्व है।
 
लेकिन ऐसा लगता है कि नीति आयोग और आर्थिक सलाहकार परिषद दोनों के ही काम एक-दूसरे का अति-व्यापन करेंगे। ऐसे में सरकार को आयोग की जिम्मेदारियों में स्पष्टता लानी चाहिए ताकि वह राज्यों के विकास, व्यापक विकास के एजेंडे और परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों की निगरानी पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके। आयोग के दायरे से समष्टि-अर्थशास्त्रीय विश्लेेषण और नीतिगत मामलों में परामर्श को अलग कर देना चाहिए ताकि परिषद उस पर ध्यान केंद्रित कर सके।
 
हमें ध्यान रखना होगा कि परिषद के अध्यक्ष देबरॉय भले ही नीति आयोग के भी सदस्य हैं लेकिन परिषद से संबंधित मामलों में वह सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करेंगे। परिषद के सदस्य-सचिव रतन वाटल अब भी आयोग के प्रमुख सलाहकार हैं। पहले यह परिषद प्रशासनिक एवं बजट संबंधी उद्देश्यों के लिए योजना आयोग का इस्तेमाल नोडल एजेंसी के तौर पर करती थी लेकिन दोनों की भूमिकाओं में कोई दोहराव नहीं होता था। परिषद अब भी नीति आयोग का इस्तेमाल अपनी नोडल एजेंसी के तौर पर कर सकती है लेकिन भ्रम और टकराव से बचने के लिए इसके अध्यक्ष एवं सदस्य सचिव की दोहरी भूमिकाओं पर भी गौर करना चाहिए।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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