बिजनेस स्टैंडर्ड - निवेश में सुधार के दीर्घकालिक उपाय
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निवेश में सुधार के दीर्घकालिक उपाय

नितिन देसाई /  September 27, 2017

चक्रीय सुधार की प्रतीक्षा करने के बजाय, सरकार को वृद्घि दर में सुधार के लिए दीर्घकालिक कार्यसूची तैयार करनी चाहिए। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

 
शेयर बाजार में तेजी के बावजूद कंपनियों के बोर्ड रूम में निराशा का माहौल दिखाई देता है। एक तरफ चौकन्नापन है तो वहीं दूसरी ओर कई जगहों पर कंपनियों की बैलेंस शीट चिंता का विषय बनी हुई है। देश में विदेशी मुद्रा की आवक जारी है। यह भी हो सकता है कि आयात की ओवर इनवॉयसिंग और नोटबंदी के दौरान हवाला के जरिये बाहर गया धन वापस आ रहा हो। परंतु बड़े कारोबारी चौकन्ने हैं और इक्विटी के बजाय डेट पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। सेंसेक्स और निफ्टी में तेजी के बावजूद निवेश के वास्तविक इरादे नदारद हैं।
 
निजी क्षेत्र निवेश को लेकर काफी निराश है और सकल तयशुदा निवेश में आ रही लगातार गिरावट में उसे महसूस किया जा सकता है। यह वर्ष 2011-12 में जीडीपी के 34.3 फीसदी के स्तर से घटकर वर्ष 2015-16 में 29.2 फीसदी के स्तर पर आ गया। तब से इसमें लगातार गिरावट आ रही है और वर्ष 2016-17 की दूसरी तिमाही में यह करीब 27 फीसदी के आसपास रहा। यह स्तर चिंताजनक है। तयशुदा निवेश की इस दर के साथ हम 8-9 फीसदी की वृद्घि दर हासिल नहीं कर सकते। खासतौर पर तब जबकि बुनियादी विकास के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता हो और निवेश का अधिकांश हिस्सा उसमें चला जाता हो। 
 
गिरावट का यह लंबा दौर केवल चक्रीय नहीं हो सकता। समस्या को समझना बेहद आवश्यक है। तभी हम निवेश में सुधार के लिए उचित नीतियां तैयार कर पाएंगे। बीते पांच सालों के दौरान निजी क्षेत्र के गैर वित्तीय उपक्रमों का तयशुदा निवेश जीडीपी के 11 फीसदी के बराबर रहा है और सरकारी निकायों तथा सरकार का जीडीपी के 7 फीसदी के बराबर। परंतु गैर कॉर्पोरेट और गैर सरकारी क्षेत्र का निवेश जीडीपी के 15.6 फीसदी से घटकर 10.8 फीसदी रह गया। इसे घरेलू निवेश कहा जाता है और निर्माण इसका अहम घटक है। परंतु इसमें निजी उद्यमों का निवेश भी शामिल होता है। संगठित क्षेत्र में निवेश को लेकर निराशा और बढ़ी है। नोटबंदी और जीएसटी को लागू करने का इस पर खासा बुरा असर हुआ है।
 
निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के संगठित कारोबार निवेश की मांग के वाहक रहे हैं। निवेश की बढ़ती मांग से ही वेतन और आय बढ़ते हैं। यह असंगठित क्षेत्र के उद्यमों को बढ़ावा देता है। यह पूरी प्रक्रिया वृद्धि में सहायक है। संगठित क्षेत्र का निवेश शेष अर्थव्यवस्था को जो गति प्रदान करता है वह उसके सकल निवेश पर नहीं बल्कि उसकी बचत पर आधारित होता है।
सरकारी क्षेत्र और सरकार की बात करें तो इस अवधि में यह शुद्ध प्रभाव जीडीपी के 3-4 फीसदी के बीच रहा है। परंतु निजी क्षेत्र में इसका शुद्ध असर जीडीपी के 3 फीसदी से कम होकर वर्ष 2015-16 में शून्य हो गया। इस बीच कई निगम अपनी नकदी म्युचुअल फंड में डाल रहे हैं। जून 2017 में उनकी धारिता 890,000 करोड़ रुपये थी। यह राशि जून 2017 से 62 फीसदी ज्यादा है। अगर निजी क्षेत्र की गैर वित्तीय कंपनियों का निवेश वर्ष 2014-15 और 2015-16 में उनकी बचत से केवल 3 फीसदी ज्यादा होता तो इन दो सालों में 750,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश आया होता। यह बजट के अलावा बहुत बड़ा प्रोत्साहन होता। 
 
निजी क्षेत्र में निवेश को लेकर सतर्कता की एक बड़ी वजह यह भी है कि मांग में होने वाली वृद्धि कमजोर पड़ती जा रही है। इसके लिए आम घरों के हालात और असंगठित क्षेत्र के निवेश व्यय, निर्यात वृद्धि में कमी और आयात आदि कई वजहें उत्तरदायी हैं। इसके अलावा सरकारी क्षेत्र की ओर से ग्रामीण इलाकों में बुनियादी विकास और रोजगार पर किए जाने वाले व्यय की मांग वृद्धि में स्वत: आई कमी भी एक कारण है।
 
कंपनियों की बैलेंस शीट भी एक अन्य अहम पहलू है क्योंकि तेजी के दिनों में जब नकदी आसानी से उपलब्ध थी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्याज दरें काफी कम थीं तब उन्होंने काफी पैसा जुटाया था। समस्या यह है कि कई भारतीय निगम अच्छे दिनों में सही प्रबंधन नहीं अपनाते और बुरे दिनों में कठिनाइयों से घिर जाते हैं। फंसे हुए कर्ज की समस्या का सामना भी हमें हमेशा से करना पड़ा है। परंतु इधर इसका आकार बढ़ा है और लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे देश की वित्तीय व्यवस्था और हमारी अर्थव्यवस्था को तगड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई है। अब बैंकों की ओर से प्रभावशाली प्रवर्तकों को गैर जरूरी ऋण का विकल्प भी उपलब्ध नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के लिए यह जरूरी हो गया कि वे ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाएं। हालिया इतिहास में शायद पहली बार कॉर्पोरेट प्रमुखों के सामने यह जोखिम उत्पन्न हुआ है कि कहीं उनको इस सब की कीमत न चुकानी पड़ जाए। इन्सॉल्वेंसी और बैंगक्रप्टसी के नए प्रावधानों ने भी इस संबंध में आवश्यक दबाव बनाया है। इस मोर्चे पर सरकार ने एकदम वांछित कदम उठाया है। परंतु आंशिक तौर पर वह भी दोषी है। फंसे हुए कर्ज के कई मामले ऐसे हैं जो निजी क्षेत्र को दीर्घावधि के बुनियादी निवेश की परियोजनाओं में साझेदार बनाने से ताल्लुक रखते हैं। इसे देखते हुए अर्थव्यवस्था में निवेश को लेकर आशावाद सुधारने के लिए क्या किया जा सकता है?
 
विनिमय दर के विचलन को थामना होगा और मौद्रिक नीति के ढांचे में आरबीआई का घोषित लक्ष्य मुद्रास्फीति से बदलकर निवेश वृद्धि की दिशा में करना होगा। ठ्ठ छोटे और सूक्ष्म उद्यम बहुत बुरी स्थिति में हैं। जीएसटी के तात्कालिक प्रभाव को कम करना होगा। दीर्घावधि के सुधार के लिए ऋण, प्रौद्योगिकी और कौशल विकास तक सहज पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। सभी एमएसएमई को बेहतर बुनियादी सुविधा देनी होगी। इस क्षेत्र में निवेश की भावना में सुधार करना होगा। रोजगार वृद्धि के लिए ये वजहें अहम हैं। 
 
पीपीपी नीति में केलकर समिति के सुझाव के मुताबिक सुधार करना होगा। खासतौर पर यह सुनिश्चित करने के लिए जोखिम की साझेदारी बेहतर हो सके। दीर्घावधि में यह साझेदारी तभी कामयाब होगी जबकि बुनियादी सेवाओं के बाजार को अधिक तार्किक बनाया जाएगा। यह तार्किकता मूल्य निर्धारण, साझा सुविधाओं तक पहुंच, प्रवेश, निर्गम और बाजार प्रतिभागिता में होनी चाहिए।
 
प्रवर्तकों के मन में यह भय होना चाहिए कि नियंत्रण उनके हाथ से निकल सकता है। इसके लिए संस्थागत अंशधारकों में अधिक सक्रियता की जरूरत है। अगर वे सार्वजनिक क्षेत्र में हैं तो उनको सरकार से अलग रखना होगा। अधिग्रहण के नियमों को आसान करना होगा क्योंकि वे पिछले प्रबंधन के पक्ष में झुके रहते हैं। इसके अलावा अंशधारकों की शिक्षा को भी बढ़ावा देना होगा। यह चक्रीय सुधार की कार्यसूची नहीं है बल्कि यह अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक कार्यसूची है जहां निजी क्षेत्र पर निर्भरता आगे और बढ़ेगी, कम नहीं होगी। 
 
Keyword: company, share market, invest, निवेश,
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