बिजनेस स्टैंडर्ड - निर्यात और जीएसटी
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निर्यात और जीएसटी

संपादकीय /  September 27, 2017

बीते कुछ वर्ष देश के वाणिज्यिक निर्यात पर भारी पड़े हैं। बीती कई तिमाहियों से निर्यात में लगातार गिरावट आई है। इस बीच वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों का निर्यात बढ़ा है। परंतु कमजोर वैश्विक मांग के बीच भारत अपनी प्रतिस्पर्धा और विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा पाने में नाकाम रहा। ऐसा करने की कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि घरेलू आपूर्ति शृंखला और श्रम जैसे क्षेत्रों में जरूरी सुधार नहीं हो सका है। भारत के व्यापार संतुलन को देखें तो रुपये की अनावश्यक मजबूती भी इसकी एक वजह है। 

 
पहले इक्विटी और फिर डेट बाजार में विदेशी धन की मजबूत आवक ने रुपये को मजबूत बनाए रखा। इससे निर्यात प्रतिस्पर्धा पर असर हुआ और मुनाफे पर भी। अब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में निर्यातकों के सामने एक नई बाधा है। हालांकि जीएसटी एक वांछित बदलाव है लेकिन फिर भी इस नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था ने कई ऐसी समस्याएं पैदा की हैं जिन्हें निर्यातकों ने विभिन्न अवसरों पर सरकार के सामने रखा है। निर्यातकों का दावा है कि अक्टूबर तक उनकी ऑर्डर बुक में 15 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। उन्होंने यह चिंता भी जताई है कि क्रिसमस का त्योहार करीब है और यह गिरावट आगे और बढ़ेगी। जबकि पारंपरिक तौर पर क्रिसमस का मौसम निर्यातकों के लिए बहुत अच्छा रहा है। निर्यातकों ने आगे यह दावा भी किया है कि जीएसटी के आगमन के बाद उनकी लागत में 1.25 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। कम मार्जिन वाले निर्यात मसलन कपड़ा, वस्त्र और चमड़े का सामान आदि के क्षेत्र में लागत में मामूली इजाफा भी प्रतिस्पर्धा पर बहुत बुरा असर डालता है। यही वजह है कि इससे फर्म के आकार, फर्म के अस्तित्व और रोजगार आदि सभी पर असर हो रहा है। निर्यातकों का दावा है कि जीएसटी के आगमन से निर्यात को करीब 65,000 करोड़ रुपये का झटका लगेगा।
 
प्रश्न यह है कि जीएसटी के लागू होने के बाद निर्यातकों के लिए क्या समस्याएं उत्पन्न हुई हैं? शायद सबसे स्पष्टï समस्या तो यही है कि इसकी वजह से कार्यशील पूंजी फंस सकती है। निर्यातकों को यह अधिकार है कि वे निर्यात की गई वस्तु के इनपुट पर रिफंड हासिल करें। इस प्रक्रिया में बहुत अधिक समय लग रहा है क्योंकि रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा को लगातार पीछे धकेला जा रहा है। हकीकत में जुलाई में चुकाए गए करों का रिफंड दिसंबर तक आने की उम्मीद है। दुर्भाग्यवश सरकार इन वाजिब चिंताओं को लेकर भी बहुत अधिक सचेत नहीं दिख रही। बल्कि वित्त मंत्रालय की ओर से जारी किए गए एक वक्तव्य में इन चिंताओं को खारिज कर दिया गया। सरकार ने एक मौजूदा ड्यूटी ड्रॉबैक योजना की ओर भी संकेत किया है जिसे इस समस्या से निजात पाने के लिए आगे बढ़ाया गया है। परंतु निर्यातकों का कहना है कि हकीकत में आगे बढ़ाई गई योजना का कोई खास लाभ नहीं है और राज्य सरकारों से रिफंड हासिल करना काफी मुश्किल काम है।
 
यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार निर्यातकों की चिंताओं को लेकर कहीं अधिक सहयोगी रुख अपनाएगी। सरकार पहले कुछ समायोजन कर चुकी है। मसलन, आंशिक तौर पर भरे हुए जीएसटी कर फॉर्म के साथ भी रिफंड हासिल करना और कुछ निर्यातकों को अधिकारियों की मदद लेने के बजाय स्वयं कंटेनर सील करने की इजाजत दी गई। निर्यातकों की चिंताओं को धैर्यपूर्वक सुना जाना चाहिए। ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए ताकि जीएसटी सुधार अनावश्यक रूप से अर्थव्यवस्था के इस अहम घटक को परेशान न करें।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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