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कंपनी पर नियंत्रण के मामले में सही है सेबी की राह

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  September 26, 2017

देश की बाजार नियामक संस्था, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कहा है कि वह किसी कंपनी के अधिग्रहण से संबद्ध नियमों में संशोधन नहीं करेगा। सेबी का यह निर्णय कई कारणों से सही प्रतीत होता है। जब किसी सूचीबद्घ कंपनी के प्रबंधन और नीतिगत निर्णयों पर किसी अन्य का नियंत्रण होता है तो अन्य अंशधारकों की हिस्सेदारी खरीदने की पेशकश करना अनिवार्य है। इसी तरह 25 फीसदी या अधिक के मताधिकार के साथ शेयरों का अधिग्रहण करने के लिए खुली पेशकश करना जरूरी है। सामान्य तौर पर नियंत्रण का अधिग्रहण, हिस्सेदारी के अधिग्रहण के साथ आता है। बहरहाल, नियमों में एक प्रावधान के अनुसार शेयरों की मात्रा चाहे जितनी भी हो लेकिन नियंत्रण हाथ में लेने के दौरान खुली पेशकश जरूरी है। 

 
यह अपने आप में एक अहम व्यवस्था है। अगर कोई चाहे तो बिना 25 फीसदी मताधिकार के नियंत्रण हासिल कर सकता है और तब खुली पेशकश सामने होगी। इसके बाद जो होगा उसका पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं। सूचीबद्घ कंपनियां विभिन्न अनुबंधित अधिकारों और व्यवस्थाओं से संबद्घ रहती हैं। अब जबकि निवेशक सूचीबद्घ कंपनियों के साथ निवेश समझौते करते हैं और विभिन्न अनुबंधों के अधीन तयशुदा निर्णयों में अपना अधिकार मानते हैं तो अक्सर इस तरह का सवाल भी उठ खड़ा होता है कि क्या उन्होंने सही मायनों में नियंत्रण हासिल कर लिया है?
 
उदाहरण के लिए अगर कोई कागज बनाने वाली कंपनी अपने काम की प्रकृति में पूरी तरह बदलाव लाए और वह इस्पात का उत्पादन करने का इरादा करती है और अगर एक निवेशक ने उसके साथ किए गए अनुबंध में उसे रोकने का प्रावधान और अधिकार अपने पास रखा है तो उसे कंपनी के रोजमर्रा के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं मिल जाता है। ऐसे में उसके पास केवल इतना विकल्प है कि वह केवल यह दबाव बना सके कि कंपनी अपने काम की प्रकृति में बदलाव न करे। यानी वह कागज के कारोबार में ही शामिल रहे, बजाय कि इस्पात निर्माण में दखल देने के। परंतु वहीं दूसरी ओर अगर कोई निवेशक को यह अधिकार हो कि वह कंपनी के हर अनुंबध में अपनी बात रख सके तब वह कंपनी के प्रबंधन पर नियंत्रण का दावा कर सकेगा।
 
इन दो अतिरंजित छोरों के बीच में काफी कुछ हो सकता है। इसके कई उदाहरण हो सकते हैं। मिसाल के तौर पर एक निवेशक किसी ऐसे लेनदेन पर अपनी आपत्ति जताने का अधिकार रखता है जिसमें कंपनी के विशुद्घ मूल्य का बड़ा हिस्सा दांव पर लगा हो। दूसरे शब्दों में कहें तो कंपनी का शुद्घ मूल्य क्या है और इसकी सीमा कितने प्रतिशत पर निर्धारित होगी, किस तरह के लेनदेन को कवर किया जाएगा, ये सारे कारक मिलकर इस प्रश्न का उत्तर देंगे कि क्या ऐसा अधिकार प्रबंधन और नीतिगत निर्णय पर नियंत्रण देता है। उदाहरण के लिए किसी सूचीबद्घ कंपनी के कमरों का शुल्क तय करने की नीति पर नियंत्रण का अधिकार उस कंपनी पर पूरा नियंत्रण मानी जाएगी, अगर उस कंपनी का इकलौता काम होटल कारोबार हो तो। होटल पर ऐसा अधिकार जो कई होटल चलाने वाली कंपनी के लिए बड़े राजस्व का सबब नहीं बनता, अधिकार का रूप नहीं लेता। अब किसी कानून द्वारा यह तय कर पाना मुश्किल है कि आखिर कौन सी बात ऐसे अधिकार का रूप लेती है जो हर संभव स्थिति में उसे पूरा नियंत्रण देती है। यही वजह है कि उक्त अधिकार जो केवल कुछ हद तक प्रभाव और सामान्य आचरण में मामूली बदलाव निर्मित करता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि इससे पूर्ण नियंत्रण कायम हो जाएगा। 
 
ऐसी दिशा किसी कानून के बजाय फैसलों और केस लॉ से निकल सकती है। इनके आधार पर नियम बन सकते हैं, जो शायद हर स्थिति में ठीक न बैठें। सेबी ने इन मुद्दों पर एक सार्वजनिक कवायद भी की कि कथित नियंत्रण के लिए एक सी व्यवस्था बनाना गलत होगा। ठीक उसी तरह जैसे यह सुरक्षा मुहैया करा पाना कि कुछ तरह के अधिकार कभी नियंत्रण का रूप नहीं लेते। 
 
हाल के अपने आदेशों में सेबी ने इस स्थिति को स्वीकार करने का एक परिपक्व तरीका तलाश किया है। अन्य कानूनों में भी नियंत्रण के संदर्भ हैं। अगर यह कानून बना दिया जाए कि जब तक 25 फीसदी स्वामित्व नहीं होगा तब तक कोई नियंत्रण नहीं होगा तो यह सही विकल्प नहीं होगा और इसके तमाम नुकसानदेह परिणाम हो सकते हैं। लब्बोलुआब यह कि ऐसा कानून बनाना मूलभूत रूप से गलत होता कि कुछ खास तरह के अधिकार कभी नियंत्रण का रूप नहीं लेंगे या फिर वे हर स्थिति में नियंत्रण माने जाएंगे। यही वजह है कि अच्युतन समिति ने जानबूझकर इस मामले को तात्कालिक तथ्यों पर छोड़ दिया है। गौरतलब है कि इस समिति द्वारा बनाया गया मसौदा ही अधिग्रहण नियमन का आधार है। 
(स्पष्टीकरण: लेखक भी इस समिति का सदस्य था)।
निश्चित तौर पर सेबी निर्देशन करने वाले नोट जारी कर सकता है। इनमें उन सिद्घांतों का जिक्र हो सकता है जो वह इस संबंध में प्रवर्तन के दौरान लागू करेगा। इसके अलावा, किसी व्यक्ति ने नियंत्रण हासिल किया है या नहीं इसका निर्णय तात्कालिक तथ्यों और परिस्थितियों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। 
 
(लेखक स्वतंत्र अधिवक्ता हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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