बिजनेस स्टैंडर्ड - मौसम परिवर्तन औरजमीनी जोखिम
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मौसम परिवर्तन औरजमीनी जोखिम

पार्थसारथि शोम /  September 26, 2017

जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ते जोखिम के बीच जरूरी बुनियादी ढांचा सुनिश्चित करना चुनौती बना हुआ है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
हाल के दिनों में अमेरिका में अतिरंजित मौसम की कई घटनाएं घटीं। हार्वी और इरमा तूफानों ने टैक्सस समेत दक्षिणी राज्यों को प्रभावित किया। वहीं भारतीय उपमहाद्वीप में अतिवृष्टि और बाढ़ ने उत्तरी बिहार, बांग्लादेश और नेपाल को चपेट में लिया। इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन और गर्मी से समुद्रों के बढ़ते जल स्तर का मामला चर्चा में ला दिया। हार्र्वी सतह पर आने से पहले मैक्सिको की खाड़ी से गुजरा। वहां के तापमान ने उसकी तीव्रता में इजाफा किया। समुद्र की सतह का तापमान बीती एक सदी से लगातार बढ़ता आ रहा है और यह अब भी जारी है। 
 
आर्कटिक सागर के आंकड़े भी बताते हैं कि कैसे वहां समुद्री सतह और आसपास के सागरों की सतह का ताप बढ़ रहा है। अलास्का और ग्रीनलैंड के समुद्र का तापमान सबसे तेजी से बढ़ा है। सन 1982 के बाद से इसमें 1/2 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। अन्य स्थानों पर भी समुद्रों का यही रुझान है। अंटार्कटिका में तो अमेरिका के आकार का एक टुकड़ा अलग होकर बह रहा है।
 
संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का गठन किया है। उसका कहना है कि उन्हें इनके बीच कोई सीधा संबंध नहीं मिला है। साथ ही वैज्ञानिक समुदाय के एक बड़े तबके का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और तूफानों की बढ़ती तादाद के बीच का रिश्ता स्वयंसिद्ध है। धरती को जो नुकसान पहुंचाया जा रहा है, भला वह उससे कैसे और कब तक बच सकेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 2017 में पेरिस में आयोजित जलवायु परिवर्तन वार्ता को बाधित कर दिया था। 
 
वहां इस सिलसिले में बात चल रही थी कि आखिर वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक थामने पर कैसे प्रतिबद्धता कायम की जाए और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उचित संसाधन कैसे आवंटित किए जाएं। कड़वी हकीकत को ध्यान में रखें तो वह यह है कि बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के आलोक में हर देश को यह प्रयास करना होगा कि वह जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर अपना उत्तरदायित्व निबाहे। वर्ष 2017 के वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक का एक खंड इस पर भी केंद्रित है कि आखिर जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव किन पर पड़ रहा है? इस प्रश्न का उत्तर है कि जलवायु जोखिम वाले 182 देशों की सूची में भारत का स्थान चौथा है। 
 
सूचकांक बताता है कि वर्ष 2015 में केवल मोजांबिक, डोमिनिका और मलावी को ही भारत से अधिक परेशानी का सामना करना पड़ा। यहां तक कि वानुआटू, म्यांमार, बहामस, घाना और मेडागास्कर जैसे देशों पर भी भारत से कम असर हुआ। ये देश भी शीर्ष 10 देशों में शुमार हैं। यह सूची जारी करने वाली जर्मन वाच नामक संस्था कहती है कि वर्ष 2015 में भारत में क्रय शक्ति समता के संदर्भ में 40 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ जबकि 4,300 लोगों की मौत हुई। बेमौसम की बारिश के कारण फरवरी और मार्च में बाढ़ आई और लू की वजह से 2,300 जानें गईं। 
 
वहीं अगस्त और दिसंबर में एक बार फिर बाढ़ से बहुत अधिक नुकसान हुआ। हालात लगातार खराब हो रहे हैं। वर्ष 2017 के यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में अतिवृष्टिï से 1,288 लोगों की जान गई है। करीब 4 करोड़ लोग (1.6 करोड़ बच्चों समेत) बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। भारत में अलग-अलग प्राकृतिक घटनाओं में 800 लोगों की मृत्यु हुई। अमेरिका में हार्वी तूफान ने 60 जानें लीं जबकि इरमा के चलते क्यूबा में 10 लोगों की जान गई।
 
एक अहम बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली आपदाओं के पैटर्न में भी बदलाव आ रहा है। प्रिंट मीडिया में आई खबरों के मुताबिक बिहार के बाढ़ की आशंका वाले जिले ही इस वर्ष के इकलौते प्रभावित जिले नहीं रह गए हैं।  इसके अलावा कुल बारिश जहां पहले जैसी बनी हुई है, वहीं बाढ़ की तीव्रता में इजाफा हुआ है। यही वजह है कि अप्रत्याशित रूप से बाढ़ आने का खतरा पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा है। 
 
इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर तैयारी की आवश्यकता है और इस तैयारी के लिए अधिक से अधिक संसाधनों तथा बुनियादी ढांचे की जरूरत है। तभी सही अनुमान जताया जा सकेगा, तैयारी की जा सकेगी और आपदा के प्रभाव को कम किया जा सकेगा। ठीक वैसे जैसे अमेरिका में देखने को मिला।  अमेरिका की ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनैंस के मौसमविज्ञानी सुनंद बसु ने ब्लूमबर्ग टीवी पर विस्तार से बताया कि कैसे हार्वी ने अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र को तात्कालिक रूप से बहुत बुरी तरह प्रभावित किया। उन्होंने अमेरिका के ऊर्जा बाजार पर हार्वी के प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया। 
 
गैसोलिन का उत्पादन, पेट्रोकेमिकल और अन्य रिफाइंड उत्पादों में तेजी से गिरावट देखने को मिली। तूफान के वक्त और उसके तत्काल बाद यह गिरावट साफ देखी जा सकती थी। रिफाइनरी बंद हो गईं और पाइपलाइन को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। इसकी वजह से अचानक आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो गई। गैसोलिन की कीमतों में  देश भर में इजाफा हुआ। उत्तर पूर्वी अमेरिका की पाइपलाइन भी प्रभावित हुई। टैक्सस के पावर ग्रिड एरकॉट को 40 फीसदी नुकसान हुआ। चूंकि बिजली उत्पादन में प्राकृतिक गैस को ही मूल ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है इसलिए इसकी मांग में भारी कमी आई। कच्चे तेल के टैंकर बंदरगाहों तक पहुंचने के बजाय सागर में ही तैरते रहे। प्राकृतिक गैस का अमेरिका को होने वाला निर्यात भी बाधित हुआ। कई जगह पाइपलाइन को जबरदस्ती बंद करना पड़ा।
 
बाद के बुलेटिनों में बसु ने उद्योग जगत के सुधार के पहलू पर बात की। तूफान के बावजूद शेल गैस उत्पादन जल्दी पटरी पर आ गया। अगस्त के अंत तक परिचालन सामान्य हो गया। इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका में हालात अपेक्षाकृत जल्दी सामान्य हुए। इसमें सरकार की मदद का भी काफी योगदान रहा। इसके विपरीत भारत जैसे देश में बुनियादी व्यवस्था को दोबारा बहाल करना अपेक्षाकृत मुश्किल काम है। इसके अलावा राहत वितरण में होने वाली लीकेज को दूर करना भी भारत के लिए समस्या बना रहा है। भारत उत्सर्जन में कटौती के मोर्चे पर और पुनर्वास के मामले में, दोनों स्तरों पर धीमा है। इस मोर्चे पर भ्रष्टाचार से निपटने का सारा भार कमजोर तबके पर है। अगर भ्रष्टïाचार को लेकर पूरी सक्रियता नहीं बरती गई तो हमारा देश आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लगातार पिछड़ा रहेगा। खासतौर पर जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं से निपटते वक्त यह बात और अधिक भारी पड़ेगी। 
Keyword: india, environment,,
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