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दिवालिया कंपनी के प्रवर्तकों की वापसी बैंकों के गले में फंसी!

अनूप रॉय /  September 24, 2017

बैंकों ने सिनर्जीज डूरे ऑटोमेटिव विवाद का हल निकाले जाने के तरीके को लेकर अपनी नजरें टिकाई हुई हैं। उनका मानना है कि यह केस दिवालिया प्रक्रिया के बारे में भविष्य की राह दिखाएगा और यह भी पता चल पाएगा कि कर्जदाताओं के लिए दिवालिया संहिता का सहारा लेना किस हद तक कारगर हो पाएगा? इस कर्ज निपटान प्रक्रिया में मुख्य मुद्दा यह है कि बैंकों को अपने कर्ज का कितना हिस्सा बट्टे खाते में डालना पड़ेगा? हालांकि सभी कर्जदाताओं के लिए कोई एक नियम नहीं हो सकता है। बट्टे खाते का अनुपात कर्ज के 30 फीसदी से लेकर 80 फीसदी तक भी हो सकता है। लेकिन सिनर्जीज डूरे मामले में कर्जदाता बैंक को 94 फीसदी कर्ज बट्टे खाते में डालनी पड़ी थी। बैंकर यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि यह मामला महज एक अपवाद साबित होगा। 

 
माना जा रहा है कि फंसे कर्ज की वसूली के लिए बने नए कानून दिवालिया एवं ऋणशोधन संहिता के तहत सिनर्जीज डूरे मामले को सबसे पहले अंजाम तक पहुंचाया जा सकेगा। लेकिन एडलवाइस एआरसी ने दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने को अदालत में चुनौती दे दी है। उसका कहना है कि प्रमोटर जटिल ढांचे के जरिये कंपनी के बहुलांश कर्जदाता बन गए और फिर जोरदार घाटे की वकालत करने वाली प्रक्रिया अपनाने के पक्ष में हामी भर दी।
 
सार्वजनिक क्षेत्र के एक बड़े बैंक के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'अगर सिनर्जीज डूरे से संबंधित दिवालिया प्रक्रिया को अपीलीय न्यायाधिकरण मंजूरी दे देता है तो फिर बैंक यही चाहेंगे कि फंसे कर्ज के मामले संपत्ति की नीलामी के पहले ही निपटा लिए जाएं। अगर इस मामले को एक नजीर की तरह पेश किया जाता है तो ऐसे कई और मामलों के भविष्य में सामने आने की संभावना है और फिर बैंकों के हाथ में कुछ भी नहीं आएगा।'
 
दिवालिया संहिता में प्रावधान है कि प्रमोटर समूह या उसका कोई भी सदस्य कर्ज निपटारे का प्रस्ताव रख सकता है। हालांकि इस तरह के प्रस्ताव को कर्जदाताओं के बहुमत की मंजूरी मिलनी जरूरी है। बैंक अब कह रहे हैं कि चालाकी दिखाते हुए प्रमोटरों का ही बहुलांश कर्जदाता बन जाना उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं है। एक अन्य बैंक अधिकारी कहते हैं कि प्रमोटरों की तरफ से पेश कर्ज समाधान प्रस्ताव को ही अधिक आकर्षक दिखाने से पूरी समाधान प्रक्रिया गिनती के लोगों तक सिमटकर रह जाती है। उनका मानना है कि बैंकों के लिए यह प्रवृत्ति एक बड़ी चिंता बनने जा रही है। वह कहते हैं, 'अगर किसी कर्जदार कंपनी की नीलामी से कुछ ठोस राशि मिलने की संभावना न हो तो बाहरी निवेशकों के उस कंपनी में रुचि दिखाने की बहुत कम संभावना है। इस स्थिति में, अगर प्रमोटर नीलामी से मिलने वाली राशि को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है तो कर्ज निपटान प्रस्ताव अधिक आकर्षक लग सकता है। खासकर छोटे कर्जों के मामले में यह स्थिति वास्तविकता बन सकती है।'
 
इन आशंकाओं को देखते हुए बैंकों ने चुपके सेे गिरवी रखने के तरीकों में बदलाव करने शुरू कर दिए हैं। आम तौर पर बैंक किसी कंपनी को कर्ज देने के पहले जमीन एवं साजो-सामान जैसी उसकी चल-अचल संपत्तियों को गिरवी रख लेते हैं। लेकिन जब कोई कर्जदार कंपनी मुश्किल में घिर जाती है तो उसकी संपत्ति का मूल्य तेजी से गिरने लगता है। संकटग्रस्त कंपनी नकदी और अन्य तरल संपत्तियों का इस्तेमाल अपनी जरूरतों की भरपाई में करने लगती है। इसी तरह उसके साजो-सामान का मूल्य भी कम हो चुका होता है। ऐसे में केवल उस कंपनी की जमीन और इमारतें ही बची रह जाती हैं जिनकी बिक्री से रकम जुटाई जा सकती है। इसी वजह से बैंकों को यह डर सता रहा है कि अगर प्रमोटर समूह को भी अपना प्रस्ताव रखने का मौका मिलता है तो वे हमेशा फायदे की स्थिति में रहेंगे। वैसे जहां पर कर्ज की राशि अधिक है वहां प्रमोटरों की तरफ से कर्ज निपटान प्रस्ताव रखने की संभावना काफी कम है। पूरी आशंका है कि ऐसी कंपनियां टुकड़े-टुकड़े में बेच दी जाएंगी। इस तरह बैंकों को बड़ी राशि बट्टे खाते में डालने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। 
 
बाजार अनुसंधान फर्म मैक्वेरी के विश्लेषक सुरेश गणपति का कहना है कि बैंकों को दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के पहले ही अपने कर्जों के पुनर्गठन और खरीदारों की तलाश पर ध्यान देना होगा। गणपति कहते हैं, 'सिनर्जीज मामले को सामान्य नहीं बनाया जा सकता है लेकिन बट्टे खाते में बड़ी राशि जाने की आशंकाएं गंभीर हैं।' भारतीय रिजर्व बैंक ने जून महीने में बड़े कर्ज में डूबी जिन 12 कंपनियों की सूची जारी की थी उनमें शामिल पांच स्टील कंपनियों की दिवालिया प्रक्रिया के दौराने बैंकों को 40-74 फीसदी तक का कर्ज बट्टे खाते में डालना पड़ सकता है। गणपति कहते हैं कि इन कंपनियों का औसतन 57 फीसदी कर्ज बट्टे खाते में चला जाएगा। बैंकरों के बीच इसे लेकर आम राय है कि दिवालिया प्रक्रिया के दौरान औसतन 50-60 फीसदी कर्ज तो बट्टे खाते में चला ही जाएगा। हालांकि इन कंपनियों में दिवालिया प्रक्रिया पूरी होने में करीब छह महीने बाकी हैं लिहाजा साफ तौर पर कुछ कह पाना मुमकिन नहीं है।
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