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बाजार का सबक, अब कम रिटर्न पर भी सब्र!

संजय कुमार सिंह /  09 24, 2017

ऐसा लगता है कि शेयर बाजारों में खुदरा निवेशक समझदार होते जा रहे हैं। हर महीने 4,500 रुपये तक के मासिक सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिये निवेश में लगातार बढ़ोतरी इसका स्पष्ट उदाहरण है। बिड़ला सन लाइफ ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) ए बालासुब्रमण्यन कहते हैं, 'इस समय करीब 50 फीसदी निवेश एसआईपी के जरिये हो रहा है। निवेशक एकमुश्त निवेश के लिए सही समय के इंतजार के चक्कर में नहीं पडऩा चाहते। इसलिए वे एसआईपी और एसटीपी (सिस्टमैटिक ट्रांसफर प्लान) का विकल्प ले रहे हैं।' 

 

फंड प्रबंधकों और वित्तीय योजनाकारों का कहना है कि निवेशकों ने प्रतिफल को लेकर अपनी उम्मीदें भी काफी घटा दी हैं। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार (आरआईए) पर्सनल फाइनैंस प्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'मेरे ग्राहक यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि शेयरों से लंबी अवधि में 10 से 12 फीसदी का ही प्रतिफल मिल जाए तो भी ठीक है। '

फंड प्रबंधकों का कहना है कि इससे पहले हर कोई 100 फीसदी से अधिक प्रतिफल देने वाले शेयर या फंड चाहते थे। अब वे 5 से 10 साल तक की लंबी अवधि के लिए भी इंतजार करने को तैयार हैं। यह निवेश अवधि में अहम बढ़ोतरी है। पहले म्युचुअल फंडों में औसत निवेश अवधि 18 से 20 महीने होती थी। अब यह बढ़कर 36 महीने या उससे अधिक हो गई है। 

 

यह बदलाव क्यों आया? इसकी कई वजह हैं। पहली, बचत दरों, यहां तक कि बुनियादी बचत जमा दरों में भी गिरावट आई है, जिससे निवेशक ज्यादा आकर्षक निवेश विकल्प तलाशने लगे हैं। उदाहरण के लिए पिछले कुछ समय में ज्यादातर बड़े बैंकों ने अपनी बचत जमा दरें घटाकर 3.5 फीसदी कर दी हैं। पिछले कुछ समय से सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ), राष्ट्रीय बचत पत्र और वरिष्ठ नागरिक बचत योजनाओं सहित अन्य लघु जमा योजनाओं की दरों पर दबाव बढ़ा है। इसके साथ ही रियल एस्टेट और सोना भी आकर्षक नजर नहीं आ रहे हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति लगातार घट रही है। जुलाई में यह 2.36 फीसदी रही जबकि अगस्त में 3.36 फीसदी। इससे साफ है कि निवेशकों को अगर हर साल 10 से 12 फीसदी प्रतिफल भी मिले तो यह उनके लिए बुरा नहीं है। 

 

इन सब कारणों से निवेशक सामान्य उम्मीदों के साथ शेयरों का रुख कर रहे हैं। क्रिसिल रिसर्च में वरिष्ठ निदेशक (फंड एवं फिक्स्ड इनकम कारोबार) जिजू विद्याधरन कहते हैं, 'मार्च 2016 की मामूली गिरावट को छोड़ दें तो म्युचुअल फंडों के इक्विटी फंडों में मई 2014 से ही लगातार निवेश बढ़ रहा है। ज्यादातर निवेश खुदरा निवेशकों से आ रहा है। उतार-चढ़ाव के झटकों के बावजूद मई 2014 से जुलाई 2017 के बीच इक्विटी फंडों में कुल 2.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।' उन्होंने कहा कि निवेशक एसआईपी का विकल्प चुन रहे हैं और उनमें कम घबराहट है। बालासुब्रमण्यन कहते हैं, 'जब बाजार गिरता है तो हमें यूनिट भुनवाने के अनेक अनुरोध मिलते हैं मगर हाल के वर्षों में इन अनुरोध में कमी आई है।' आउटलुक एशिया कैपिटल के मुख्य कार्याधिकारी मनोज नागपाल कहते हैं कि पहले निवेशक कुछ क्षेत्र विशेष में अपनी भारी दिलचस्पी दिखाते थे। अब वे डायवर्सिफाइड इक्विटी फंडों में निवेश कर रहे हैं और सेक्टर फंडों से दूर हो गए हैं।

 

इन दिनों युवा निवेशक इक्विटी बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। पहले शेयर बाजार में उतरने वाले निवेशकों की औसत उम्र 40 साल से ऊपर होती थी। अब बाजार में प्रवेश करने वाले निवेशकों की औसत उम्र 30 से 35 साल है। शेयर बाजारों में बीते वर्षों की तेजी के दौरान निवेशक उधार लेकर भी शेयरों में पैसा लगाते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि अब बहुत कम लोग कर्ज लेकर शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। 

 

बेहतर जानकारी

 

आज सीधे शेयर बाजार में निवेश करने वाले औसत निवेशक को 10 से 20 साल पहले के निवेशकों की तुलना में बेहतर जानकारी होती है। सेबी में पंजीकृत स्वतंत्र इक्विटी शोध फर्म स्टॉल्वर्ट एडवाइजर्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी जतिन खेमानी कहते हैं, 'बेहतर नियम बनाए गए हैं और सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक्सचेंजों को नियमित रूप से सूचनाएं देना, हर तिमाही में कॉन्फ्रेंस कॉल, निवेशक प्रस्तुति और विस्तृत सालाना रिपोर्ट देना अनिवार्य किया गया है, जिससे कंपनियों का परिचालन बेहतर तरीके से समझने में मदद मिली है।'

मित्राज फाइनैंशियल सर्विसेज में डायरेक्ट इक्विटी के प्रमुख विनोद एम एस कहते हैं कि बहुत से निवेशक प्रबंधन द्वारा बुलाई गईं सालाना आम बैठकों और कॉन्फ्रेंस कॉल में हिस्सा लेते हैं। विनोद कहते हैं, 'निवेशक यह भी महसूस करने लगे हैं कि सीधे शेयर बाजार में हाथ आजमाने की बजाय पेशेवरों की मदद लेना ज्यादा अक्लमंदी है। नतीजतन पंजीकृत निवेशक सलाहकारों के साथ सेवा-करार करने वाले निवेशकों की तादाद बढ़ रही है।'

 

लंबा रास्ता 

 

निवेशकों की रुचि में बढ़ोतरी के बावजूद भारत के म्युचुअल फंड उद्योग को एक लंबा रास्ता तय करना है। इस उद्योग की परिसंपत्तियों का आकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 10 फीसदी है, जबकि वैश्विक औसत 54 फीसदी है। खुदरा निवेशकों ने डेट फंडों में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई है, जो फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रुमेंट (जिनकी दरें गिर रही हैं) के विकल्प के रूप में काम कर सकते हैं।  

 

विद्याधरन कहते हैं, 'खुदरा निवेशकों का 70 फीसदी से ज्यादा पैसा इक्विटी म्युचुअल फंडों में है। उन्हें अपनी जोखिम लेने की क्षमता और निवेश अवधि के आधार पर हाइब्रिड, डेट और मनी मार्केट फंडों पर भी गौर करना चाहिए।' ज्यादातर निवेशकों को यह नहीं पता होता है कि डेट फंड कैसे काम करते हैं। राघव कहते हैं, 'पिछले प्रतिफल के आधार पर निवेशक अपना पैसा लंबी अवधि के फंडों में लगा देते हैं, भले ही ब्याज दरें निचले स्तरों के आसपास हों।' 

 

अब निवेशक जोखिम के बारे में कम सोचते हैं। नागपाल कहते हैं, 'बहुत से निवेशक मूल्यांकन की अनदेखी कर रहे हैं। वे मिड-कैप और स्मॉल कैप शेयरों के भावों में तेजी के बावजूद उनमें निवेश कर रहे हैं।' ऐसी यकीनी तौर पर माना जा रहा है कि खुदरा निवेशक और घरेलू संस्थागत निवेशक शेयर बाजारों में निवेश जारी रखेंगे, जिससे वर्तमान मूल्यांकन बरकरार रहेगा या फिर शेयरों के दाम बढ़ेंगे। नागपाल कहते हैं कि अगर आमदनी में जल्द सुधार नहीं आया तो बाजार केवल पी/ई (प्राइस टू अर्निंग) में बढ़ोतरी के कारण ही बढ़ता नहीं रह सकता।

 

एसआईपी के बारे में निवेशकों के दिमाग में यह बैठा दिया गया है कि यह शेयरों में जोखिम से बचाव का यह अचूक हथियार है। राघव कहते हैं, 'अगर आप उस समय एसआईपी शुरू करते हैं, जब मूल्यांकन ऊंचा होता है तो आप केवल तभी अच्छा प्रतिफल अर्जित कर सकते हैं, जब आप लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं। अगर आपको दो-तीन साल में ही अपना निवेश निकालने की जरूरत पड़ती है, जिस समय बाजार नीचे हैं तो आपके लिए यह तरीका कारगर नहीं भी रह सकता है।'

 

कुछ दिक्कतें बरकरार 

 

अब भी सीधे निवेश करने वाले बहुत से ऐसे निवेशक हैं जो मूल्यांकन के बजाय कीमत पर ध्यान देते हैं। विनोद कहते हैं, 'वे शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग से शुरुआत करते हैं और वे लघु अवधि में कीमतों के उतार-चढ़ाव के बारे में अपने अनुमान को लेकर बहुत आश्वस्त हो जाते हैं। वे वायदा एवं विकल्प में भी हाथ आजमाते हैं और जल्द ही उनका निवेश जुए की तरह बन जाता है।' 

 

बहुत से लोगों के पास अच्छी पोर्टफोलियो रणनीति भी नहीं होती है। निवेशकों को यह फैसला लेना चाहिए कि वे कितने- 10, 25, या 50 शेयर रखेंगे। उन्हें केंद्रीकरण और विविधीकरण के बीच संतुलन को समझना चाहिए। उन्हें शेयरों की खरीद की संख्या पर भी ध्यान देना चाहिए और उस समय बड़ा दांव लगाना चाहिए, जब परिस्थितियां उनके अनुकूल हों। अत्यधिक सूचनाएं भी एक बड़ी दिक्कत है। खेमानी ने कहा, '99 फीसदी सूचनाएं अनुपयोगी होती हैं और केवल 1 फीसदी सूचनाएं काम की होती हैं। सोशल मीडिया की वजह से स्थिति और खराब हुई है।'

 

आपको क्या करना चाहिए? इस साल अब तक की गिरावट मामूली रही है, इसलिए निवेशकों की निवेश बनाए रखने की क्षमता की परीक्षा नहीं हुई है। जब 10 से 15 फीसदी की बड़ी गिरावट आएगी तो उन्हें शेयरों में अपना निवेश बनाए रखने की जरूरत होगी। राघव कहते हैं, 'एसआईपी के जरिये निवेश करने और शेयर लंबी अवधि का निवेश होने की बढ़ती धारणा से इस बार गिरावट के समय ज्यादा निवेशक शेयरों में अपना निवेश बनाए रख सकते हैं।' जिन लोगों की उम्र 60 साल या इससे अधिक है, उन्हें शेयरों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही बातों में नहीं आना चाहिए और इनमें निर्धारित स्तर से ज्यादा निवेश नहीं करना चाहिए। 
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