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मध्यस्थता से पहले की तनातनी निपटान की मंशा पर पड़ती भारी

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  September 24, 2017

जब किसी विवाद में उलझे पक्ष अदालत की शरण में जाते हैं तो उनके पास अपनी पसंद का न्यायाधीश चुनने का कोई अधिकार नहीं होता है लेकिन उनके मन में इसकी ख्वाहिश जरूर होती है। अपने पसंदीदा मंच या पीठ के समक्ष मुकदमा रखकर अनुकूल फैसले की कोशिश करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस तरह की गतिविधियों में लिप्त पाए जाने वाले पक्षों को न्यायाधीश प्रतिबंधित कर देते हैं। महाराष्ट्र सरकार को इसी तरह के एक मामले में पिछले महीने माफी मांगनी पड़ी थी। राज्य सरकार बंबई उच्च न्यायालय के एक खास न्यायाधीश को ध्वनि प्रदूषण के एक मामले की सुनवाई से अलग रखना चाहती थी। 

 
लेकिन विवाद निपटान की वैकल्पिक प्रणाली मध्यस्थता के तहत विवादित पक्षों के पास अपनी पसंद का न्यायाधीश चुनने की आजादी है। विवाद में शामिल सभी पक्षों को अपनी पसंद का मध्यस्थ नामित करने का अधिकार है और अगर किसी मामले में तीन न्यायाधीशों के अधिकरण का गठन करना होता है तो पहले से चुने गए दो न्यायाधीश तीसरे सदस्य को अंपायर के तौर पर नामित करेंगे। सुनने में यह काफी सरल लगता है लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में कई ऐसे फैसले सामने आए हैं जिनमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने मध्यस्थों के चयन की प्रक्रिया को स्पष्ट किया है। मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम में 2015 में संशोधन किया गया ताकि मध्यस्थों के मनोनयन को लेकर पैदा होने वाली कड़वाहट कम की जा सके। वैसे मध्यस्थों का चयन एक ऐसा मसला है जिस पर दुनिया भर में सवाल उठते रहे हैं। इसीलिए इंटरनैशनल बार एसोसिएशन ने संभावित मध्यस्थों के चयन को लेकर तीन सूचियां बना रखी हैं। विधि आयोग ने मध्यस्थता अधिनियम में संशोधन कर मध्यस्थों के चयन के संबंध में अपात्रता की दो सूचियां भी तय कर दी।
 
हालांकि वैधानिक परिभाषाएं और विस्तृत सूचियों की मौजूदगी भी कानूनी पेशेवरों को मध्यस्थों के चयन एवं उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर पूरी प्रक्रिया को बाधित करने से नहीं रोक पाती है। विरोधी पक्ष किसी भी नामित मध्यस्थ पर पक्षपाती होने का आरोप लगाकर प्रक्रिया में अड़चन डालने की कोशिश करता है। इस तरह के आरोप अक्सर मध्यस्थता प्रक्रिया को लंबा खींचने का काम करते हैं। 
 
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अमेरिकी कंपनी एचआरडी कॉर्पोरेशन और सार्वजनिक कंपनी गेल इंडिया के बीच हुए विवाद का निपटारा करते समय मध्यस्थों की निर्योग्यता संबंधी प्रावधानों पर स्थिति स्पष्ट की है। अमेरिकी कंपनी ने दो न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उन्हें मध्यस्थता के अयोग्य ठहराया था। उसका आरोप था कि दोनों न्यायाधीश पहले गेल के साथ जुड़े रह चुके हैं, लिहाजा वे निष्पक्ष सुनवाई नहीं कर पाएंगे। एक न्यायाधीश ने गेल की संलिप्तता वाले किसी अन्य मामले में मध्यस्थ के रूप में काम किया था। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि इसे गेल के साथ कारोबारी रिश्ता नहीं कहा जा सकता है। दूसरे न्यायाधीश पर आरोप लगा था कि उन्होंने किसी मामले में गेल को कानूनी परामर्श दिया था। न्यायालय ने इसे भी नकारते हुए कहा कि न्यायाधीश स्थायी तौर पर गेल को परामर्श नहीं दे रहे थे। किसी स्वतंत्र परामर्शदाता से किसी एक मामले में सलाह लेने का मतलब यह नहीं है कि उसका उस पक्ष के साथ रिश्ता रहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय की राय से सहमति जताते हुए उच्चतम न्यायालय ने एचआरडी की अपील को खारिज कर दिया।
 
ऊपरी अदालतों ने मध्यस्थता के मामलों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के रवैये पर नाखुशी भी जताई है। ये उपक्रम अक्सर बड़ी परियोजनाओं का ठेका निजी कंपनियों को देते हैं लेकिन उन्हें बराबरी का मौका नहीं देते हैं। अनुबंध समझौतों में प्राय: ऐसा प्रावधान होता है जिसमें विवाद की स्थिति में पीएसयू के ही वरिष्ठ अधिकारी को मध्यस्थ बनाने का जिक्र होता है। बीएसएनएल की तरफ से मोटोरोला इंडिया के समक्ष रखी गई पेशकश पर गौर करने से यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इस अनुबंध पत्र में कहा गया था, 'मध्यस्थ के सरकारी अधिकारी होने या विवाद के मुद्दों में उसके शामिल रहे होने या विवादित बिंदुओं पर अपनी राय रखने जैसे कारणों को आधार बनाकर आपत्ति नहीं उठाई जाएगी।' उच्चतम न्यायालय ने इस प्रावधान को अनुचित करार दिया।
 
मध्यस्थता में शामिल अधिकारियों के सेवानिवृत्त हो जाने या स्थानांतरित हो जाने की स्थिति में यह प्रक्रिया दशकों तक खिंच जाती है। झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष जब साहिल प्रोजेक्ट्स बनाम ईस्टर्न रेलवे विवाद पहुंचा तो उसने रेलवे अधिकारियों के रवैये पर कड़ा एतराज जताया। इस मामले में एक ठेका कंपनी के साथ विवाद होने पर उसके निपटारे के लिए तीन अधिकरण गठित किए गए लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी उसकी कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी है। न्यायालय ने इसे पीडि़त पक्ष का अपमान बताते हुए कहा कि आरोपी अधिकारियों को ही मध्यस्थ बनाने से पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता प्रभावित होती है। न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया जल्द पूरा करने के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मध्यस्थ नियुक्त कर दिया। हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को भी दिल्ली उच्च न्यायालय की फटकार का सामना करना पड़ा था। न्यायालय ने मध्यस्थता संबंधी मामलों में बार-बार आपत्तियां दर्ज कराने पर प्राधिकरण की आलोचना की।
 
सार्वजनिक कंपनियों को नए कानून के साथ तालमेल बिठाने वाले अनुबंध तैयार करने होंगे। अधिनियम में  संशोधन के बावजूद मध्यस्थों के चयन को लेकर होने वाला झगड़ा खत्म नहीं हुआ है। अदालतें इस कानून में शामिल अपात्रता सूची में वर्णित शब्दों की व्याख्या करने की जद्दोजहद में लगी हुई हैं। इसमें कई ऐसी शब्दावली हैं जो न्यायाधीशों के माथे पर शिकन और वकीलों के जबड़े में दर्द ला सकती हैं। 
Keyword: supreme court, high court,,
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