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दिवालिया कानून में आरंभ से घालमेल

देवाशिष बसु /  September 24, 2017

यह अधिनियम ऐसा है कि इसके चलते बड़े पैमाने पर नौकरशाही और कई स्तरों पर पेशेवरों की जरूरत होगी। इन सभी को प्रमाणन की भी आवश्यकता होगी। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
लगभग हर कोई मानता है कि नया इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड (आईबीसी) फंसे हुए कर्ज से लदे सरकारी क्षेत्र के बैंकों की समस्या को हल कर सकता है। ऐसे लोगों को यह जानना चाहिए कि आईबीसी पहले ही तमाम दिक्कतों से घिरा हुआ है। इस अधिनियम को संहिता का नाम दिया गया है और इसे व्यापक नौकरशाही और कई स्तरों पर ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता होगी जिन्हें प्रमाणन चाहिए होगा। इस काम में और अधिक नौकरशाही हस्तक्षेप चाहिए जो लागत में इजाफा करेगा। 
 
एक आदर्श दुनिया में यह सारा नौकरशाही ढांचा बड़ा अच्छा प्रतीत होता है। जिस समय अधिनियम बना था, उस समय मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि भारतीयों में यह नैसर्गिक गुण और प्रवृत्ति होती है कि वे किसी भी व्यवस्था को घुमा सकते हैं। उन्होंने सवाल किया कि हम यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि न्याय व्यवस्था और दिवालिया निस्तारण पेशेवर सही ढंग से काम करें। मैंने इस बात को खारिज कर दिया था क्योंकि व्यवस्था कायम होने में वक्त लगेगा और इस व्यवस्था को एक मौका देना तो बनता है।
 
बहरहाल, मेरे मित्र की आशंका को सही साबित होने में बहुत अधिक वक्त नहीं लगा। निस्तारण के लिए सामने आए पहले ही मामले से गलत व्यवहार के आरोप सामने आने लगे। कुछ दिन पहले एडलवाइस ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन ने राष्टï्रीय कंपनी लॉ अपील पंचाट (एनसीएलएटी) के पास एक शिकायत दर्ज कराई और कहा कि आईबीसी के समक्ष निस्तारण के लिए सिनर्जीज डोरे ऑटोमेटिव लिमिटेड का जो पहला मामला आया था वह एक धोखाधड़ी का मामला था। बाद में एडलवाइस ने इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी बोर्ड ऑफ इंडिया (आईबीबीआई) के समक्ष निस्तारण पेशेवर (आरपी) ममता बिनानी की शिकायत की। आरोप था कि उन्होंने पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया और बिना ऋणदाताओं की समिति की मंजूरी लिए काम किया। बिनानी ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया। एडलवाइस ने शिकायत में कहा कि बिनानी ने सिनर्जी डोरे द्वारा की गई धोखाधड़ी के आरोपों की जांच करने से इनकार कर दिया था। आरोप यह भी था कि उन्होंने विशेषज्ञ से विधिक सलाह नहीं ली और न ही इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्युशन प्रोफेशनल के रूप में उनकी भूमिका भी स्पष्टï नहीं थी।
 
दिवालिया निस्तारण के अधीन सिनर्जीज डोरे के निस्तारण का मामला अवश्य दिखावटी प्रतीत होता है। सिनर्जीज डोरे ने राष्टï्रीय कंपनी लॉ पंचाट, हैदराबाद के समक्ष निस्तारण का आवेदन दिया। तीन निस्तारण आवेदकों: एसएमबी एशेज इंडस्ट्रीज, सिनर्जीज कास्टिंग्स लिमिटेड (एससीएल) और सुइया इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड ने अपनी-अपनी निस्तारण योजना प्रस्तुत की। इनके बारे में कोई ब्योरा उपलब्ध नहीं है। सिनर्जीज कास्टिंग्स ऋण लेने वाले समूह की ही एक कंपनी जिस पर पहले ही काफी कर्ज है। सुइया की कुल चुकता पूंजी ही मात्र 25 लाख रुपये है। यानी वह इस बोली के लिहाज से काफी छोटी कंपनी है। ऋणदाताओं की एक समिति तैयार की गई जिसमें एडलवाइस एआरसी, अल्केमिस्ट एआरसी लिमिटेड, मिलेनियम फाइनैंस लिमिटेड और सिनर्जी कास्टिंग्स लिमिटेड (एससीएल) शामिल थे। इनमें से एडलवाइस की मत हिस्सेदारी 9.84 फीसदी थी, अल्केमिस्ट की 13.83 फीसदी, मिलेनियम फाइनैंस की 76.33 फीसदी जबकि सिनर्जीज कास्टिंग्स की कोई मत हिस्सेदारी नहीं थी क्योंकि वह संबंधित पक्षकार थी। 
 
ऋणदाताओं के समूह ने इनमें से दो की योजना को खारिज कर दिया और एससीएल की योजना को स्वीकार कर लिया जबकि वह प्रवर्तक समूह की कंपनी थी। इस योजना में बकाया कर्ज का केवल 4.84 फीसदी चुकाने की बात शामिल थी। जाहिर सी बात है मिलेनियम फाइनैंस ने, जिसके पास मजबूत मत शक्ति थी, उसने प्रवर्तकों की योजना का समर्थन किया। जाहिर सी बात है इस प्रक्रिया में खमियाजा कर्जदारों को उठाना पड़ा। तो क्या अब हमें ऐसे ही दिवालिया निस्तारण देखने को मिलेंगे? एससीएल और मिलेनियम ने भारतीय प्रवर्तकों को वह प्रारूप मुहैया करा दिया है जिसके तहत बैंक को पैसा न चुकाने के बावजूद अपनी कंपनियों पर नियंत्रण बनाए रखा जा सकता है। प्रारूप कुछ ऐसा है: एससीएल के पास देनदारी में चूक करने वाली कंपनी के ऋण की 75 फीसदी हिस्सेदारी थी। उसने ऋण का बड़ा हिस्सा मिलेनियम फाइनैंस लिमिटेड को स्थानांतरित कर दिया। इससे सिनर्जीज कास्टिंग्स को मिलेनियम के रूप में छद्म कंपनी को ऋणदाताओं की समिति में जगह देने का मौका मिल गया। 
 
रोचक बात यह है कि एक विशेषज्ञ ने सार्वजनिक रूप से इस निस्तारण का स्वागत करते हुए कहा कि यह कर्ज देने वालों के खुलेपन की बानगी है। बहरहाल, एडलवाइस ने एनसीएलएटी में गत 8 सितंबर को अपील की और इस निस्तारण योजना की शिकायत की। अगर आईबीसी को काम करना है तो उसे कुछ अहम सुधार अपनाने होंगे। कानून की धारा 29 के तहत निस्तारण पेशेवर का सूचना ज्ञापन तैयार करना आवश्यक है। इसमें कहा गया है कि निस्तारण पेशेवर आवेदकों की बोली आमंत्रित करे। इनमें से सबसे बेहतर बोली को संकटग्रस्त कंपनी सौंपी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक आदर्श निस्तारण प्रक्रिया वह है जहां पर्याप्त प्रतिस्पर्धी बोलियां हों, किफायती मूल्य निर्धारण हो और अधिकतम कर्ज की वसूली की जा सके। 
 
जाहिर है अगर प्रक्रिया से समझौता किया जाता है तो यह एक किस्म की नकली हरकत है। सबसे बुरी स्थिति में यह पूरी प्रक्रिया प्रवर्तक को ही फायदा पहुंचाएगी और वह दूसरी तरह से वापसी कर लेगा। सिनर्जीज डोरे के मामले में दो ऐसे पक्षों ने एक बड़ी कंपनी की बोली लगाई जिनका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं। राजेंद्र गंतारा नामक एक निस्तारण पेशेवर जो सन 2003 में सिनर्जीज डोरे में आईडीबीआई के निदेशक रह चुके हैं, वह कहते हैं कि समुचित वित्तीय और तकनीकी योग्यता न देखते हुए ऐसे पक्षों को इजाजत दी गई। तीन तथाकथित निस्तारण आवेदकों के आगमन के साथ ही यह प्रक्रिया पूरी तरह लक्ष्य से च्युत हो गई। इसका उद्देश्य केवल यह रह गया कि प्रवर्तक अपनी परिसंपत्ति बचा ले जाए। यह सही नहीं था। सिनर्जीज का मामला तो केवल एक उदाहरण है। ऐसी तमाम खामियां होंगी जिनको दूर किया जाना आवश्यक है। जैसा कि मैं पहले भी दो बार कह चुका हूं, आईबीसी का ढांचा खामियों से भरा हुआ है। 
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