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थमेगा तेजी का दौर!

संपादकीय /  September 24, 2017

गत शुक्रवार को शेयर बाजारों में जबरदस्त फिसलन देखने को मिली और सेंसेक्स में 10 माह में अबतक की सबसे बड़ी गिरावट आई। इस गिरावट के लिए कई वजह जिम्मेदार थीं। पहली बात तो यह कि देश की अर्थव्यवस्था की मूल दशा ठीक नहीं है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्घि दर में लगातार पांच तिमाहियों से गिरावट दर्ज की जा रही है। जून तिमाही में तो यह दर गिरकर 6 फीसदी के स्तर से भी नीचे आ गई। खबरों के मुताबिक सरकार वृद्घि दर में इजाफा करने के लिए एक प्रोत्साहन कार्यक्रम लाने जा रही है। इससे यह आशंका पैदा हुई है कि कहीं राजकोषीय घाटा बेपटरी न हो जाए। बाजार इस बात को लेकर भी चिंतित है कि कहीं वैश्विक मुद्दे, मसलन अमेरिका में ब्याज दरों में इजाफा, डॉलर की मजबूती और जिंस कीमतों में आ रही गिरावट आदि मिलकर उभरते बाजारों की रही सही चमक न छीन लें। भारत उभरते बाजारों में प्रमुख स्थान रखता है। उत्तर कोरिया के हालात भी अनिश्चितता में इजाफा कर रहे हैं। 

 
अब तक बाजार में नकदी के बल पर तेजी देखने को मिल रही थी। बाजार उम्मीद कर रहे थे कि कारोबारी मुनाफे की स्थिति में भी बदलाव आएगा। परंतु कारोबारी मुनाफा अगली कुछ तिमाहियों तक सुधरता नजर नहीं आ रहा है। सितंबर तिमाही में आर्थिक वृद्घि में कोई सुधार होने की उम्मीद नहीं है क्योंकि इसके नतीजों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का प्रभाव रहेगा। इस बीच चालू खाते का घाटा चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है और निर्यातक जो रुपये के अधिमूल्यन से पहले ही परेशान थे, अब वे कार्यशील पूंजी की कमी से जूझ रहे हैं। पूंजी की कमी इसलिए हुई क्योंकि जीएसटी का रिफंड आना अभी शेष है। इतना ही नहीं सरकारी व्यवस्था और जीएसटी फाइलिंग सॉफ्टवेयर सही ढंग से काम नहीं कर रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन की हालत खस्ता है और निजी क्षेत्र का पूंजीगत व्यय और बैंक ऋण वृद्घि में सुधार केवल तभी होगा जब मौजूदा क्षमताओं का बेहतर उपयोग शुरू होगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सन 2015 के बाद से ब्याज दरों में 200 आधार अंकों की कमी की है लेकिन इससे कॉर्पोरेट क्षेत्र की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज तब तक समस्या बना रहेगा जब तक कि इसके बेहतर निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। 
 
विदेशी निवेशकों ने चालू वित्त वर्ष के पहले छह माह बिकवाली कर मुनाफा कमाया है। उन्हें नए निवेश में भरोसा नहीं दिखता। अप्रैल से सितंबर के बीच 2,868 करोड़ रुपये की राशि बाहर गई। यह राशि ज्यादा नहीं है लेकिन इससे जुड़ी चेतावनी स्पष्टï है। घरेलू खुदरा निवेशकों की बात करें तो उन्होंने इक्विटी म्युचुअल फंड को अपने पोर्टफोलियो के बड़े हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है। अकेले अगस्त में यहां 20,000 करोड़ रुपये की आवक हुई। परिणामस्वरूप म्युचुअल फंडों ने 66,000 करोड़ रुपये की खरीद की। एक अनुमान के मुताबिक वे 50,000 करोड़ रुपये के और शेयर खरीदना चाहते हैं। 
 
जो बाजार नकदी की बहुलता से संचालित होते हैं वहां हमेशा यह जोखिम रहता है कि नकदी के वापस लौटने पर हालात बिगड़ जाएंगे। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि शेयर बाजार के बेहतर दिन बीत गए हैं। शायद कीमतों में सुधार की बुनियाद रखी जा चुकी है। शेयर बाजार निवेशकों के लिए सबसे बेहतर हालात में कीमतों में अल्पावधि में मामूली सुधार होगा। जब निवेशकों को सही मूल्य मिलेगा तो मध्यम अवधि का सुधार देखने को मिलेगा। रुपये का अवमूल्यन जरूर संघर्षरत निर्यातों की मदद कर सकता है। इससे जीडीपी वृद्घि में भी सुधार आने की संभावना है।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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