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हासन-केजरीवाल की मुलाकात बदलेगी तमिलनाडु की सियासत!

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 22, 2017

चेन्नई में आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल और कमल हासन की मुलाकात पर उठे सवालों के जवाब अभी नहीं मिल पाए हैं लेकिन इतना तय है कि यह पर्यटन का हिस्सा तो नहीं है। कुछ महीने पहले हासन का दिया वह बयान काफी मशहूर हो चुका है कि 'भगवा मेरा रंग नहीं है'। उन्होंने उस समय राजनीति से जुडऩे होने की संभावना को भी खारिज किया था। ऐसे में क्या उन्होंने नई संभावना को गले लगा लिया है?
तमिलनाडु की राजनीति, यहां के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कमल हासन की टिप्पणियों और तमिल संस्कृति से जुड़े जल्लीकट्टू जैसे मुद्दों पर उनकी बेबाक राय पिछले कई महीनों से चर्चा का विषय बनी हुई है। जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक कई धड़ों में बंट गई है और मुख्य विपक्षी दल द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) के पास भी सत्ता संघर्ष के लिए जरूरी ताकत का अभाव होने से तमिलनाडु में नेतृत्व शून्यता की स्थिति बनी हुई है। तमिल फिल्म सुपरस्टार रजनीकांत ने पिछले दिनों राजनीति में शामिल होने के काफी संकेत दिए हैं। वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के ऐन पहले प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने रजनीकांत से मुलाकात भी की थी। तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता एच राजा ने कहा था कि रजनीकांत एक लोकप्रिय हस्ती हैं और उनका पार्टी में स्वागत किया जाएगा। लेकिन शुरुआती चर्चाओं के बाद रजनीकांत की तरफ से कुछ ज्यादा सुनने को नहीं मिला।
भाजपा का पहले तमिल फिल्मों के एक और अभिनेता विजयकांत के साथ चुनावी गठजोड़ रह चुका है। लेकिन वह रिश्ता कुछ खास मुकाम तक पहुंचे बगैर ही खत्म हो चला है। विजयकांत ने वर्ष 2005 में देसीय मुरपोक्कू द्रविड़ कषगम (डीएमडीके) बनाई थी। इस पार्टी के गठन के पीछे अन्नाद्रमुक और द्रमुक का विकल्प पेश  करने का मकसद था। डीएमडीके ने 2006 का विधानसभा चुनाव और 2009 का लोकसभा चुनाव अकेले ही लड़ा था। विजयकांत की पार्टी को विधानसभा चुनाव में आठ फीसदी मत मिले थे वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में मत बढ़कर 10 फीसदी हो गए। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में डीएमडीके ने अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और 29 सीटें जीतने में सफल रही थी। हालांकि यह गठजोड़ अधिक दिनों तक नहीं चल पाया जिसका नतीजा यह हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में डीएमडीके एक भी सीट नहीं जीत पाई।
तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभिनय से राजनीति में कदम रखने वाला कोई भी सितारा किसी दूसरी हस्ती के साथ मंच साझा करने को तैयार नहीं होता है। जयललिता और एम जी रामचंद्रन के करीबी रिश्ते ने इसकी उम्मीद जगाई थी लेकिन जैसे ही एमजीआर को यह पता चला कि जयललिता सभाओं में सुनहरा राजदंड और मुकुट पहनकर जाने लगी हैं तो उन्होंने अपनी इस निकट सहयोगी को राज्यसभा का सदस्य बनाकर दिल्ली भेजने में देर नहीं लगाई। जयललिता का विजयकांत के साथ हुआ सियासी गठजोड़ भी इन्हीं कारणों से खत्म हो गया था। सवाल यही खड़ा हुआ था कि अपने समर्थकों के बीच 'करुप्पु एमजीआर' के रूप में मशहूर विजयकांत ही मुख्यमंत्री बनेंगे या जयललिता केंद्रीय भूमिका में होगी?
रजनीकांत और कमल हासन के बीच भी ऐसी ही असुविधाजनक स्थिति पैदा होती दिख रही है। दोनों दिग्गज अभिनेता कह चुके हैं कि राजनीति में उनका प्रवेश संभव है। लेकिन रजनीकांत ने राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हासन के प्रवेश को अधिक तवज्जो नहीं दी। कमल हासन इस पर कह चुके हैं कि रजनीकांत को इस संदर्भ में उनसे संपर्क करना चाहिए था।
ऐसा लगता है कि केजरीवाल और आप के रूप में हासन को एक माकूल राजनीतिक विकल्प मिल गया है। हालांकि तमिलनाडु में आप का कोई वजूद नहीं है। न तो उसका यहां पर ढांचा है और न ही उसके कार्यकर्ता हैं। लेकिन हासन के प्रशंसकों के बड़े समूह को आप कार्यकर्ताओं के रूप में तब्दील किया जा सकता है। एक ही पार्टी अन्नाद्रमुक से जुड़े होने के बावजूद ओ पनीरसेल्वम और ई पलनिस्वामी धड़े अलग इसलिए हो गए कि दोनों समूहों ने अपने नेताओं को ही महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाने की कोशिश की। हालांकि अब दोनों धड़ों के बीच विलय पर सहमति बन चुकी है लेकिन इसमें वक्त लग रहा है। असल में छोटे एवं मझोले स्तर के नेता दूसरे गुट के लिए अपनी पद एवं हैसियत छोडऩे को राजी नहीं हैं। कारोबारी जगत में भी विलय एवं अधिग्रहण की कुछ कोशिशों के ही कामयाब होने के पीछे यही वजह रही है कि पहले से अहम पदों पर बैठे लोगों को नए लोगों से खतरा महसूस होने लगता है। उसी तरह राजनीति में भी कोई शख्स दूसरे गुट के लिए अपनी जगह छोडऩे को तैयार नहीं होता है।
लेकिन हासन और आप के मामले में ऐसी कोई भी समस्या खड़ी होने के आसार नहीं हैं। आप उत्तर भारत की एक उभरती पार्टी के तौर पर स्थापित हो चुकी है और अब वह नया जोखिम उठाने एवं दक्षिण भारत की तरफ अपना विस्तार करने के लिए तैयार है। इसकी विचारधारा अभी तक केवल सत्ता में बैठे लोगों पर सवाल और हमले करने तक सीमित रही है लिहाजा वह आगे बढऩे के लिए लचीला रुख अपना सकती है।
अगर आप का कमल हासन के साथ सियासी नाता बन जाता है तो यह तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ी क्रांति जैसा होगा। हालांकि कुछ सवालों के जवाब तलाशे जाने बाकी हैं। तमिलनाडु में हासन की अगुआई वाली आप का जाति को लेकर क्या रुख होगा? श्रीलंका में रह रहे तमिलों के अधिकारों जैसे सवालों पर क्या सोच होगी? उत्तर-दक्षिण विवाद और हिंदी के प्रति इस गठजोड़ के नजरिये पर भी नजर होगी।
तमिल मनीला कांग्रेस भी एक समय तमिलनाडु की सियासत में एक धूमकेतु की तरह चमकी थी लेकिन वह कोई वैकल्पिक तस्वीर नहीं पेश कर पाई। क्या कमल हासन और आप की जोड़ी ऐसा विकल्प पेश कर पाएगी?

Keyword: AAP, Arvind kejriwal, kamal hasan,
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