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आजाद खयाली और बलात्कार का रिश्ता!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  09 22, 2017

यह धारणा बदलनी होगी कि शराब और सिगरेट पीने वाले तथा कमरे में कंडोम रखने वाले आजाद जिंदगी जी रहे युवा मुसीबत को न्योता दे रहे हैं

आखिर कोई युवती अपने पुरुष मित्र के साथ देर रात का फिल्म शो देखने जाती ही क्यों है? वह भी टी शर्ट और बदन से चिपकी जींस पहनकर? क्या इससे रिश्ते की गड़बड़ी उजागर नहीं होती और उसने अपने मां-बाप और कॉलेज को सूचित क्यों नहीं किया?
यह सब तब जबकि उसके पिता इतने अमीर नहीं कि वह उसे सुरक्षित यात्रा के लिए ड्राइवर समेत कार दे सकें। न ही उसके या उसके मित्र के पास इतना पैसा था कि वे टैक्सी या कम से कम ऑटो बुक कर सकें।
वे देर रात दिल्ली की सुनसान सड़क पर क्या कर रहे थे और वे ऐसी खाली बस में क्यों चढ़े जिसमें छह लफंगे दिखने वालों के सिवा कोई यात्री नहीं था। ऐसे हालात में जब बलात्कार की आशंका प्रबल थी, वे इतने लापरवाह क्यों थे? दोनों में से किसी ने आसन्न खतरे को क्यों नहीं भांपा? यह कैसा गैरजिम्मेदाराना व्यवहार था? उन्होंने मदद या सलाह के लिए अपने मां-बाप को क्यों नहीं फोन किया? बस में सवार लोगों ने लड़की का बलात्कार कर और उसके साथी को पीटकर ठीक नहीं किया लेकिन उनको इसका बढ़ावा कैसे मिला? जब वे हार्मोन के शिकार होकर टूट ही पड़े तो आसाराम बाबू की सलाह के मुताबिक लड़की ने उनको भाई कहकर राखी बांधने की पेशकश क्यों नहीं की? अगर इससे काम नहीं बना तो उन्होंने मौके की नजाकत को समझते हुए सबकुछ शांति से क्यों नहीं होने दिया। कम से कम जान तो बच जाती। और फिर तुम्हारा तो पुरुष मित्र भी था, शायद यौन संबंधों की आदत रही होगी। ऐसे में जबरन इतना जूझने की क्या जरूरत थी?
काश उन बेचारे लड़कों ने तुम्हारी जान न ली होती, कम से कम इतनी सख्त सजा तो न होती। तब यह एक और अहिंसक बलात्कार होता, 85 फीसदी अन्य मामलों की तरह जो परिवार के भीतर, मुलाकात के बहाने और नशे की हालत में किए जाते हैं। तब वे लड़के वापस आम जिंदगी में लौट जाते। शायद उन्हें बेंगलूरु के निमहांस संस्थान के कुछ श्रेष्ठï मनोवैज्ञानिकों की सलाह भी मिलती। अदालत भी इस सिलसिले में उदारता बरतती।
आश्चर्य नहीं कि हमारे सामने एक त्रासदी उपस्थित हुई जहां आठ जिंदगियां और इतने ही परिवार प्रभावित हुए। एक कीमती युवा जिंदगी खत्म हो गई। एक ने आत्महत्या कर ली, एक को चोटें लगीं और भावनात्मक नुकसान हुआ, जबकि चार अन्य को फांसी होगी। उससे भी चिंता की बात यह है कि कैसे इन आठ युवाओं ने खुद को और अपने परिवारों को इस हालत में पहुंचा दिया, फिर चाहे वे पीडि़त हों या आततायी।
देश को हिला देने वाले निर्भया कांड के बारे में यह सब लिखने के लिए आप मुझसे बेहद नाराज होंगे। अगर आप नाराज हैं तो मैं कहूंगा मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा।
निर्भया कांड के दो साल बाद हरियाणा के सोनीपत में घटी एक घटना की। ओपी जिंदल विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने पुलिस से अपने पुरुष मित्र की शिकायत की। उसने कहा कि वह निरंतर उसे ब्लैकमेल कर रहा है और खुद व अपने दोस्तों से उसका बलात्कार करवा रहा है। उसने सामूहिक बलात्कार की भी शिकायत की।
शिकायत में कहा गया कि लड़के ने उसे अपनी नंगी तस्वीर भेजी और उसपर भी ऐसा करने का दबाव बनाया। बाद में उसे ब्लैकमेल करने लगा कि वह इन तस्वीरों को उसके मां-बाप को दिखाएगा और सार्वजनिक कर देगा। ये आरोप मजिस्ट्रेट के सामने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज कराए गए। इस समय तक निर्भया कांड के बाद का सख्त कानून लागू हो चुका था। मामला ब्लैकमेल, बलात्कार, जबरन शराब पिलाने और मादक पदार्थ का सेवन कराने का था। लड़की ने यह तक कहा कि लड़के ने उस पर सेक्स टॉय खरीद कर इस्तेमाल करने का दबाव बनाया जबकि वह स्काईप पर यह सब देखता। मामला अदालत में आया। सारे पक्ष अच्छे परिवारों से थे और उन्होंने बेहतरीन वकील किए। निचली अदालत की न्यायाधीश सुनीता ग्रोवर ने आरोपों को स्वीकार किया और तीनों लड़कों को बलात्कार, ब्लैकमेल, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के उल्लंघन का दोषी माना और 20 वर्ष की सजा समेत अन्य सजा सुनाईं।
आरोपियों ने उच्च न्यायालय का रुख किया। अब मामला चल रहा है और इसमें वैसे ही वक्त लगेगा जैसे आरुषि मामले तथा अन्य मामलों में लगता आया है। इस बीच सप्ताह के आरंभ में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पीठ ने आरोपियों को जमानत दे दी, उनकी सजा निलंबित कर दी। चूंकि हमारे यहां अपील की प्रक्रिया में वक्त लगता है इसलिए इन लड़कों को छोड़ दिया गया तकि वे बाहर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करें, जिंदगी बनाएं और अदालत की इजाजत लेकर विदेश तक जा सकें।
अदालत ने आदेश दिया कि तीनों लड़कों को दिल्ली के एम्स में चिकित्सकीय सलाह दिलाई जाए। एम्स के निदेशक को कहा गया कि वह इस मामले की पूरी प्रगति से अदालत को अवगत कराएं।
मेरा इरादा अदालती आदेश पर सवाल खड़े करना नहीं है। स्पष्टï है कि उनको शिकायतकर्ता के अतीत, उसके आचरण और आरोपियों के साथ उसके रिश्तों की पड़ताल से तमाम परिस्थितिजन्य साक्ष्य मिले। इसी आधार पर निर्णय किया गया। समझदारी का तकाजा है कि अब हम अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करें।
नीचे मैंने आदेश के कुछ पैराग्राफ लिए हैं। मेरी सहयोगी अपूर्वा विश्वनाथन जो कानून जानती हैं, ने इनका चयन करने में सहायता की है।
ठ्ठ पीडि़त के बयान का अवलोकन और उनका परीक्षण बताता है कि उनके तीनों आरोपितों के साथ यौन संबंध रहे और वे एक स्वच्छंद, अविवेकी रिश्ते में थीं। उन्होंने कभी भी अपनी समस्या अपने कॉलेज प्रशासन, मां-बाप या दोस्तों को नहीं बताई।
ठ्ठ उन्होंने पूछताछ में यह माना कि उनके होस्टल के कमरे की तलाशी में वार्डन को कंडोम मिले थे लेकिन उनके माता-पिता को इस बारे में नहीं बताया गया। उन्होंने यह भी माना कि उन्हें 'क्लासिक' सिगरेट पीने की आदत है। उन्होंने यह भी माना कि उन्होंने मादक पदार्थ लिया लेकिन अपनी मर्जी से नहीं। उन्होंने माना वे 'ज्वाइंट' नामक मादक पदार्थ लेती थीं जिसे सिगरेट की तरह पिया जाता है।
ठ्ठ समूचा परिदृश्य युवाओं की पतनशील मानसिकता को दिखाता है जहां वे मादक पदार्थ, शराब, एकाधिक यौन संबंधोंं जैसे पतनशील रिश्तों में उलझे हैं। उनकी दुनिया स्वच्छंदता और दृश्य रति की दुनिया है। आश्चर्य नहीं कि हमारा सामना एक त्रासदी से है जहां चार युवा जीवन और इतने ही परिवार नरक भोग रहे हैं।
ठ्ठ समान रूप से चिंतित करने वाली बात यह भी है कि इन युवाओं ने फिर चाहे वे पीडि़त हों या आततायी, खुद को और अपने-अपने परिवारों को निहायत खेदजनक स्थिति में ला दिया है। पीडि़ता का बयान उनके बीच स्वच्छंद रिश्तों की एक समांतर कहानी कहता है। इसमें सहभागिता थी, रोमांच था और यौन संबंधों को लेकर प्रयोग भी शामिल थे। इनके चलते सजा के निलंबन की प्रार्थना पर गौर करना बनता है। खासतौर पर यह देखते हुए कि आरोपी खुद युवा हैं और इस घटना में ऐसी हिंसा शामिल नहीं है जो अन्यथा ऐसे मामलों में दिखती है।
ठ्ठ युवती ने माना है कि उसके मित्र हार्दिक ने उसे एक सेक्स टॉय सुझाया जिसने उसे स्वीकार किया। इससे भी रिश्तों की विकृति उजागर होती है।
अब आपको पता चल गया होगा कि मैंने शुरुआती कुछ पैराग्राफ क्यों लिखे। मैं जो कहना चाहता हूं वह स्वत: स्पष्टï है।
मैं न्यायाधीशों के तर्क पर सवाल नहीं कर रहा हूं। न ही मैं पितृसत्ता या नैतिकता की दुहाई दे रहा हूं। मैं केवल यह कह रहा हूं कि वयस्कों के यौन संबंधों और उनकी जीवनशैली को लेकर संवेदनशील होने की जरूरत है। सन 1988 की पुरस्कृत फिल्म द एक्यूज्ड इसके लिए बेहतर शुरुआत होगी। फिल्म में जूडी फॉस्टर ने सामूहिक बलात्कार से पीडि़त महिला की भूमिका निभाई थी। फिल्म में वह सेक्स शो में प्रस्तुति देने वाली बनी हैं। वहां बचाव पक्ष का एक गवाह इसे उचित ठहराते हुए कहता है- 'बलात्कार! यह एक वेश्या है...उसे यह सब पसंद है.. अब यह दूसरों पर आरोप लगा रही है।'
फिल्म में यह दलील नहीं चली। वर्ष 2017 में भी यह नहीं चलनी चाहिए।

Keyword: Freedom, youth, Films, Rape,
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