बिजनेस स्टैंडर्ड - छोटी-मझोली कंपनियों के लिए कारोबारी सुगमता से बनेगी बात
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, December 12, 2017 08:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

छोटी-मझोली कंपनियों के लिए कारोबारी सुगमता से बनेगी बात

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  September 21, 2017

कारोबारी सुगमता के मामले में भारत की प्राथमिकताएं लगातार गलत दिशा में जाती दिख रही हैं। कारोबारी सुगमता संबंधी वैश्विक रैंकिंग पर नजर डालते ही हम इसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अपनी निवेश पूंजी को भारत से बाहर नहीं ले जाने तक सीमित मान लेते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके उच्च-शिक्षित आर्थिक विशेषज्ञ अगर बड़ी कंपनियों के बजाय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर ध्यान केंद्रित करें तो बेहतर नतीजे हासिल कर सकते हैं। एमएसएमई क्षेत्र के लिए कारोबार करना हमेशा से कठिन रहा है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अकेले एक तिहाई का योगदान करने वाले इस क्षेत्र के लिए कामकाज कर पाना आम तौर पर मुश्किल ही बना हुआ है। रोजगार प्रदान करने के मामले में भी यह भारतीय अर्थव्यवस्था का चमकदार क्षेत्र है। वहीं बड़ी कंपनियां अपनी मजबूत संस्थागत क्षमताओं और रसूख के बावजूद ऐसा नहीं कर पाती हैं। शायद इसी वजह से भारत हर साल इस रैंकिंग में समतुल्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में पिछड़ता जा रहा है।
एमएसएमई क्षेत्र की स्थिति एक भीमकाय पशु जैसी है। यहां पर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के लिए कई तरह के कटऑफ रखे गए हैं जिनमें 25 लाख से लेकर 10 करोड़ रुपये तक की निवेश सीमा है। एमएसएमई क्षेत्र ऐसे परिवेश में काम करता है जो काफी हद तक संगठित अर्थव्यवस्था से बाहर है और उसके बारे में सटीक आंकड़े जुटा पाना भी मुश्किल है। स्थानीय भ्रष्टाचार का सबसे अधिक सामना इसी क्षेत्र को करना पड़ता है। श्रम एवं कारखाना निरीक्षक भारतीय संस्कृति में खलनायक का ओहदा हासिल कर चुके हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में सक्रिय उद्यमियों को अपना कारोबारी वजूद बचाए रखने के लिए विकृत व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में गैरकानूनी बूचडख़ानों का तीव्र प्रसार होना कारोबारी सेहत के लिए नुकसानदेह परंपराओं को बढ़ावा देने वाली नियामकीय प्रणाली का एक सटीक उदाहरण है।
छोटी एवं मझोली इकाइयां चलाने वाले उद्यमियों ने 1980 के दशक से ही लगातार कहा है कि उन्हें बैंकों से आसान शर्तों पर कर्ज के बजाय बेहतर कामकाजी माहौल चाहिए। उदारीकरण के पहले इन उद्यमियों की चिंता बिजली और फोन कनेक्शन हासिल करने जैसी बुनियादी सुविधाएं होती थीं। फिर 1990 के दशक से उनका सरोकार कारगर कामकाजी ढांचा खड़ा करने का रहा है लेकिन नियामकीय व्यवधानों की अधिकता, बाजार पहुंच बढ़ाने और कर अनुपालन संबंधी नियम भी चिंता का विषय बन गए हैं।
पिछले एक साल में इस क्षेत्र के लिए हालात काफी प्रतिकूल हुए हैं। एमएसएमई क्षेत्र की गतिविधियों को राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों में इस तरह से पेश किया जाता है कि उनके संकट की गंभीरता का अहसास ही नहीं हो पाता है। हम आर्थिक विकास की धीमी पड़ती रफ्तार और बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़ों से ही यह अंदाजा लगा पाते हैं कि इस क्षेत्र की हालत कितनी खराब हो चुकी है। यह अलग बात है कि कुछ अर्थशास्त्री इन आंकड़ों से असली तस्वीर बयां हो पाने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
नोटबंदी ने एमएसएमई क्षेत्र पर गहरी चोट की। खासकर रोजमर्रा पर काम करने वाली बेहद छोटी इकाइयों के लिए तो नोटबंदी घातक साबित हुई। जो इकाइयां इस वार को झेल पाने की स्थिति में थीं, उन्हें पुराने नोटों को बदलवाने के लिए 30 फीसदी तक कमीशन देना पड़ा। गत 8 नवंबर को नोटबंदी का ऐलान होने के साथ ही पुराने नोट ठिकाने लगाने वाला एक पूरा गिरोह ही अचानक पैदा हो गया था। स्थानीय बाजारों में नकदी नहीं होने से छोटी इकाइयों को अपना कामकाज समेटना पड़ा था। इसका असर यह हुआ कि बड़ी संख्या में बेरोजगार युवक अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हुए।
कुछ महीने बाद ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने से एमएसएमई इकाइयों पर दोहरी मार पड़ गई। किसी पूर्व-परीक्षण के बगैर जीएसटी को लागू किए जाने के एक ही महीने के भीतर इसकी खामियां नजर आने लगीं। बिहार के वित्त मंत्री सुशील मोदी की अगुआई में एक समिति बनाई गई जो जीएसटी में आने वाली अड़चनों को दूर करने के उपाय सुझाएगी। जीएसटी से संबंधित तकनीकी उलझन और दोषपूर्ण ढांचे ने पहले से ही परेशान उद्यमियों और उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट के लिए दु:स्वप्न की स्थिति पैदा कर दी। इससे एमएसएमई क्षेत्र की मुश्किलें और भी बढ़ गई क्योंकि उनमें से काफी इकाइयां जीएसटी के दायरे से बाहर हैं।
यह काफी दुविधापूर्ण स्थिति है। एमएसएमई इकाइयों को कर प्रणाली में शामिल करने से लागत और जटिलताएं दोनों ही बढ़ जाएंगी। वहीं इन्हें दायरे से बाहर रखने का मतलब है कि इस क्षेत्र की छोटी इकाइयों को खरीदार ही नहीं मिल पाएंगे। ब्रांडेड उत्पादों पर कर लगाने और गैर-ब्रांडेड उत्पादों को दायरे से बाहर रखने जैसी सीमित सोच छोटी इकाइयों को अपना ब्रांड बनाने से परहेज करने के लिए मजबूर करेगी। अगर ऐसा ही रहा तो आगे चलकर निरमा जैसे स्थानीय ब्रांड का उभर पाना खासा मुश्किल होगा। उद्यमी खुद को जीएसटी के मुताबिक ढालने में ही लगे हुए हैं। जीएसटी पर बिज़नेस स्टैंडर्ड की तरफ से आयोजित राउंड टेबल में भी उद्यमियों ने ऐसी ही चिंताओं और नाराजगी का इजहार किया था। सत्ता प्रतिष्ठान कारोबारियों और उद्यमियों की चिंताओं के प्रति अनिच्छुक नजर आया। अगर सरकार को अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज करनी है तो उसे  एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ रहा बोझ कम करने पर ध्यान देना चाहिए। सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल दलों की ही अधिकांश राज्यों में सरकारें होने से ऐसा कर पाना मुश्किल भी नहीं होगा।
सरकार ने कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत को 130वें स्थान से 90वें स्थान तक लाने का लक्ष्य रखा है। इस बड़ी सोच को पूरा करने के लिए उसे छोटे कारोबारियों से इतर कहीं और देखने की जरूरत नहीं है।

Keyword: business, ease of doing, MSME,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बिटकॉइन पर नियमन बनाए सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.