बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक मोर्चे पर गहन मंथन का है वक्त
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आर्थिक मोर्चे पर गहन मंथन का है वक्त

अजय शाह /  September 21, 2017

सुधार इसलिए भी जरूरी हैं ताकि कमजोर कंपनियां कारोबार से बाहर हों और श्रम और पूंजी का इस्तेमाल मजबूत फर्म की बेहतरी के लिए किया जा सके। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह
भारत जैसे देश में जहां कम उत्पादकता वाली कंपनियां अनुपालन में हेरफेर करने में सफल रहती हैं, वहां कम और ज्यादा उत्पादकता वाली यानी दोनों तरह की कंपनियां एक साथ देखने को मिलती हैं। जब तक एक मजबूत जीएसटी अनुपालन में सुधार नहीं करेगा, तब तक कम उत्पादकता वाली फर्म भी बरकरार रहेंगी। मजबूत जीएसटी के आने से हमें विशिष्टता वाले उद्योगों के बीच ज्यादा कारोबार देखने को मिलेगा। बैंकिंग संकट के चलते भी विभिन्न फर्मों की स्थिति पर असर हुआ है और संकटग्रस्त कंपनियों की मुश्किल बढ़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक के सुधार, दिवालिया कानून और निस्तारण निगम आदि के आने से भी पूंजी को कमजोर कंपनियों से मजबूत कंपनियों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। ये सारी बातें बताती हैं कि अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन का काम चल रहा है। अगर इसे सही ढंग से अंजाम दिया गया तो जीडीपी वृद्धि का एक नया दौर देखने को मिलेगा। ऐसे में क्रियान्वयन करने वाली टीम की भूमिका काफी अहम हो जाती है।
फिलहाल तीन शक्तियां भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार दे रही हैं। पहला, कम उत्पादकता वाली फर्मों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का प्रभाव। सामान्य परिस्थितियों में बाजार प्रतिस्पर्धा सकारात्मक होती है और कमजोर कंपनियां स्वयं बाहर हो जाती हैं। इससे मजबूत कंपनियों को श्रम एवं पूंजी की आपूर्ति कम लागत पर होती है। इससे बेहतर कंपनियों की क्रय शक्ति में भी सुधार होता है। जब पूंजीवाद कारगर होता है तो कमजोर कंपनियों का निर्गम बेहतर कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ाता है।
पर भारत में ऐसा देखने को नहीं मिला है। यहां उच्च उत्पादकता और उच्च अनुपालन तथा कमजोर अनुपालन और उत्पादकता वाली कंपनियां साथ-साथ देखने को मिलती हैं। कम उत्पादकता वाली फर्म स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण के तमाम मानकों का उल्लंघन करती रहती हैं और कर वंचना भी। इससे उत्पादकता और जीडीपी पर असर होता है। जीएसटी से कर वंचना कम होगी और कई कंपनियों को मुनाफा बढ़ाना होगा या वे बंद हो जाएंगी।
हमारे देश में प्राय: लेनदेन पर कर की परंपरा है। अब मान लीजिए कि एक कंपनी इंजन बना रही है और दूसरी कार, तो यहां दोहरा कराधान हो जाता है। यही वजह है कि वाहन कंपनियां अपना इंजन बनाना पसंद करेंगी जबकि उच्च उत्पादकता की अनिवार्य शर्त विशेषज्ञता है। बेहतर अर्थव्यवस्था वही है जिसमें बड़ी तादाद में विशेषता वाली फर्म एक दूसरे के साथ कारोबार करें।
जीएसटी से लेनदेन पर कर कम होता है और कंपनियों का उत्पादन के अलग-अलग चरणों का जुड़ाव कम होता है। कई फर्म हालिया दिनों में इसे हासिल करने के लिए गहरे कष्ट से गुजरी हैं। अब जबकि देश में विशिष्ट फर्म बढ़ेंगी तो ऐसे जुड़ाव वाली कंपनियों को कष्ट होगा।
तीसरा तत्त्व ऐसी फर्मों से जुड़ा है जो निष्क्रिय हैं। आदर्श स्थिति में तो उनको तत्काल समाप्त कर दिया जाना चाहिए लेकिन भारत में उन्हें बैंक पूंजी मुहैया कराकर लगातार जिंदा रखा जाता है। अब यह प्रक्रिया दबाव में है। अब कोई भी ऋणदाता भुगतान न होने पर दिवालिया संहिता की शरण में जा सकता है। कर्मचारी भी वेतन न मिलने पर ऐसा कर सकते हैं। एक बार इसकी शुरुआत के बाद बैंकों के लिए भी मुश्किल हो जाएगी।
उच्च उत्पादकता वाली फर्म न केवल बेहतर पूंजी के साथ व्यवस्थित वित्तीय संचालन करेंगी  बल्कि उनके सभी भुगतान समय पर होंगे जबकि कम उत्पादकता वाली फर्म लडख़ड़ा जाएंगी। इससे उनके निर्गम का मार्ग प्रशस्त होगा। संसद की एक संयुक्त संसदीय समिति निस्तारण निगम बनाने वाले कानून की समीक्षा कर रही है। इसकी परिकल्पना न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण के वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग ने की थी। इससे वित्तीय पूंजी के प्रयोग को लेकर अनुशासन बढ़ेगा।
इन तीनों की वजह से अर्थव्यवस्था में मंथन शुरू होगा और ये तीनों देश की अर्थव्यवस्था में शामिल कंपनियों को व्यापक तौर पर प्रभावित करेंगे। नीतिगत मोर्चे पर सबसे बेहतरीन क्रियान्वयन टीमों के बावजूद देश में पूंजीवाद के पुनर्गठन की प्रक्रिया धीमी होगी। इसके लिए फर्म के भीतर नई प्रक्रियाओं और तकनीक की तलाश करनी होगी। इन बदलावों से सभी फर्मों के भीतर नई तरह की संगठनात्मक पूंजी तैयार होगी।
उदाहरण के लिए उच्च उत्पादकता वाली कंपनियों के नाटकीय विकास के अवसर होंगे। ये फर्म दिवालिया संहिता के अधीन आने वाली तमाम संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को खरीदने में सक्षम होंगी। इनको श्रम और पूंजी पहले से काफी कम लागत पर मिलेगी और इनकी उत्पादकता में इजाफा होगा। उनको बस खुद में थोड़ा बहुत बदलाव लाकर इन तमाम अवसरों का लाभ उठाना होगा। देश के भविष्य के लिहाज से ये बातें सकारात्मक और मूल्यवान हैं। हालांकि जन नीति के क्षेत्र में चार किस्म के गतिरोध भी हैं। प्रश्न यह है कि नीति निर्माता क्या हासिल करना चाहते हैं?
एक मजबूत जीएसटी वह है जिसमें दर एकल और कम हो, जिसका दायरा व्यापक हो और जो एकीकृत और सक्षम प्रशासन के अधीन संचालित हो।
दिवालिया संहिता में निम्र बातें शामिल करने की आवश्यकता है: वर्ष 2016 के कानून की खामियों को दूर करना, इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया को एक मजबूत संस्थान के रूप में विकसित करना, मजबूत नियमन, तीन नए निजी प्रतिस्पर्धी उद्योगों के लिए सूचना, उपयोगिता, इन्सॉल्वेंसी पेशेवरों और इससे संबंधित उद्योग का गठन, एक सक्षम कंपनी लॉ पंचाट और ऋण वसूली पंचाट, नियमन की कमियों को दूर करना और संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को खरीदारों के लायक बनाना। आरबीआई सुधारों के जरिये इन नियमन और इनकी निगरानी को मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
निस्तारण निगम के लिए भी एक मजबूत कानून की आवश्यकता है। वर्ष 2013 में आई एफएसएलआरसी की रिपोर्ट के बाद वित्त मंत्रालय ने इसके गठन के लिए कार्यबल बनाया था। इसकी अध्यक्षता एम दामोदरन को सौंपी गई। कार्य बल ने निस्तारण निगम के गठन और क्रियान्वयन पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। इसे जल्दी से जल्दी अंजाम तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
अगर इन सभी क्षेत्रों में बेहतर क्रियान्वयन वाली टीम तैनात की जाती हैं तो भारत ढांचागत बदलाव के इस चरण को तेज वृद्धि के दौर में बदलने में कामयाबी हासिल कर लेगा। वहीं अगर क्रियान्वयन के मोर्चे पर कमजोरी बनी रही तो हम कम से कम दशक भर लंबे ठहराव के दौर में प्रवेश कर जाएंगे। अब समय आ गया है कि हम जल्दी से जल्दी सही चयन कर आगे बढ़ें।
(लेखक राष्ट्रीय जन नीति एवं वित्त संस्थान में प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)

Keyword: GST, companies, Economy,
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