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सुदृढ़ीकरण पर ध्यान

संपादकीय /  September 21, 2017

अब यह स्पष्टï हो चला है कि देश की अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर में कमी आ रही है। वर्ष 2016 के आरंभ से लगातार छह तिमाहियों में गिरावट आई है। ताजातरीन आंकड़े 5.7 फीसदी की वृद्घि दर के हैं जो बीते कई सालों में सबसे कमजोर है। यह अप्रैल-जून तिमाही के सालाना आधार पर प्रस्तुत आंकड़े हैं। ऐसे में यह अच्छी बात है कि आखिरकार सरकार अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के तरीके तलाशती दिख रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अन्य मंत्रालयों के सहयोगियों से मुलाकात के बाद कहा है कि सरकार इस मंदी के खात्मे के लिए जरूरी अतिरिक्त कदम उठाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद ये कदम सामने लाए जाएंगे। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि ये उपाय केवल अतिरिक्त व्यय बनकर नहीं रह जाएंगे बल्कि नीतिगत खामियों को दूर करेंगे और अतीत की कमियों की भरपाई करेंगे।
इससे पहले भी मौद्रिक और राजकोषीय नीति के स्तर पर कदमों की मांग उठी थी। ब्याज दरों का निर्धारण आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति करती है और वह मूल्य आधारित संकेतों पर निर्भर रहती है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने यह स्पष्टï कर दिया है कि जहां तक उच्च वृद्घि दर कायम करने की बात है तो गेंद सरकार के पाले में है। परंतु राजकोषीय नीति की शिथिलता खतरनाक साबित होगी। सरकार को राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पथ पर विश्वसनीयता कायम करने में मेहनत करनी पड़ी है। नीति आयोग की तीन वर्षीय कार्य योजना और मध्यम अवधि के राजकोषीय खाके समेत जरूरी दस्तावेजों में लगातार इस बात पर जोर दिया गया है कि राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखा जाए। बहरहाल वर्ष 2013 जैसी स्थिति बनती नहीं दिखती जब देश की अर्थव्यवस्था भुगतान संतुलन के घाटे के कगार पर पहुंच गई थी। विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर है। परंतु वृहद आर्थिक स्थिरता कमजोर है और यह काफी हद तक कमजोर तेल कीमतों की आपूर्ति और विदेशी मुद्रा की निरंतर आवक पर निर्भर है।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया है कि वह अपने बॉन्ड खरीद कार्यक्रम को बंद करेगा। ऐसे में भारत जैसे देश के लिए राजकोषीय संयम से दूरी बनाना गैरजवाबदेही का परिचायक होगा। चाहे जो भी हो राजकोष दबाव में है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने इसे प्रभावित किया है। नई कर व्यवस्था ने भविष्य के राजस्व को लेकर अनिश्चितता पैदा की है। यह अनिश्चितता केंद्र और राज्य दोनों के लिए है। इन अनिश्चित हालात में कोई नई व्यय योजना पेश करना उचित नहीं होगा।
इस समय पूरा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि कैसे सरकार दिए गए साधनों में काम करती है। केंद्र सरकार को इस गलत धारणा के साथ सुधार का वादा नहीं करना चाहिए कि वह खर्च करके वृद्घि की दशा बदल सकती है। वह अतीत में पहले ही ऐसे विचार के मामले में कमजोर साबित हो चुकी है। तेल के मोर्चे पर मिलने वाला लाभ समाप्त होने पर हालात का मुश्किल होना तय है। ढांचागत सुधारों की दिशा में काम करना ही एकमात्र विकल्प है। यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि जब सरकार के भीतर सहमति बन जाती है तो श्रम, भूमि और कृषि बाजार को लेकर गहरे सुधारों की ओर काम करना होगा, बजाय कि व्यय में इजाफा करने के। राजकोषीय समावेशन मौजूदा सरकार की अहम उपलब्धियों में से एक है। इस वर्ष केंद्र सरकार ने 3.2 फीसदी के राजकोषीय घाटे का अनुमान जताया है। अगले वर्ष इसे 3 फीसदी पर लाने की प्रतिबद्घता है। राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन की विशेषज्ञ समिति ने भी इसे वर्ष 2023 तक कम करके 2.5 फीसदी पर लाने की अनुशंसा की है। ऐसे में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के पथ से हटने की मांग को नजर अंदाज करना होगा।

Keyword: Economy, growth rate, RBI,
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