बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी सरकार कर रही हर किसी को नाराज
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, December 17, 2017 03:35 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

मोदी सरकार कर रही हर किसी को नाराज

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 19, 2017

यदि सन 1962 से अब तक के 55 साल के कालखंड पर नजर डाली जाए तो यह पता चलता है कि मतदाताओं ने केवल एक ही प्रधानमंत्री को पूरा दूसरा कार्यकाल सौंपा। वह था प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 2004 से 2014 तक का कार्यकाल। हकीकत में जनता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद से किसी अन्य प्रधानमंत्री को दोबारा निर्वाचित नहीं किया। यह सच है कि अटल बिहारी वाजपेयी को तीन अवसर मिले थे लेकिन उनकी पहली सरकार केवल 13 दिन चली जबकि दूसरी 20 महीने। आखिरकार सन 1999 से 2004 के बीच उन्हें पूरे कार्यकाल वाली सरकार चलाने का अवसर मिला।

 
परंतु राज्यों में इसके एकदम उलट चीजें देखने को मिलती रही हैं। कई ऐसे राज्य हैं जहां एक ही व्यक्ति के नेतृत्व में या एक ही पार्टी की सरकार बार-बार बनती रही। कई मुख्यमंत्रियों को कभी दो तो कभी तीन कार्यकाल मिले। ऐसे में यह सवाल पूछना बनता है कि आखिर दोबारा चुनावी जीत का रहस्य क्या है? मेरा मानना है कि एक ओर जहां किसी भी मौजूदा सरकार की कोशिश होती है उन कदमों पर ध्यान देने तथा उनको चर्चा में रखने की जिनसे मतदाताओं को प्रसन्न किया जा सकता है, वहीं मतदाता उन बातों को याद करने का प्रयास करता है जिनसे उसकी नाराजगी होती है।
 
दूसरे शब्दों में कहा जाय तो जो राजनीतिक दल और प्रधानमंत्री दोबारा चुनाव जीतना चाहते हैं उनको अपनी उपलब्धियों का बेजा बखान करने के बजाय उन चीजों को चिह्नित करना चाहिए जिनसे प्राय: मतदाताओं के नाराज होने का खतरा रहता है। भारत जैसे देश में ऐसी एक ही बात है जो मतदाताओं को नाराज करती है। वह बात है सरकार के ऐसे कदम जो वास्तव में लोगों की सकल आय और उनकी खर्च करने लायक आय को कम करते हैं। इसमें दो राय नहीं कि भारत मूल रूप से एक सहिष्णु देश है और हम भारतीय तमाम कठिनाइयां सहन करने के लिए मन ही मन तैयार रहते हैं। हमारे पास तमाम मुसीबतें पहले से ही थीं। इस बीच केंद्र की यह सरकार तो भारतीयों को गरीब बनाती हुई नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बिल्कुल यही कर रही है। बुरी बात यह है कि अभी शुरू हुआ यह सिलसिला अगले आम चुनाव के पहले तक चरम पर पहुंच जाएगा। सन 1977 में इंदिरा गांधी के साथ ठीक यही हुआ था। सन 1979 में मोरारजी देसाई, सन 1989 में राजीव गांधी, 1996 में नरसिंह राव और 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी एकदम यही हुआ था।
 
सवाल यह है कि मनमोहन सिंह इसके अपवाद कैसे रहे? दरअसल इसकी कई वजह रहीं। सन 2004 से 2008 के बीच उनकी सरकार ने किसानों को दिया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य करीब दोगुना कर दिया। इसके अतिरिक्त करीब 75,000 करोड़ रुपये मूल्य का कृषि ऋण माफ किया गया, किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी में इजाफा किया गया और उनको मिलने वाले ऋण में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी की गई। कुलमिलाकर देखा जाए तो सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों पर काफी व्यय किया। वर्ष 2004 से 2009 के बीच पांच साल की अवधि में करीब 6 लाख करोड़ रुपये गांवों पर खर्च किए गए। नरेंद्र मोदी ने इसके एकदम उलट काम किया। उन्होंने कृषि सब्सिडी में कमी की, विभिन्न फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में नाम मात्र का इजाफा किया और किसी तरह का कर्ज माफ नहीं किया। उन्होंने कृषि ऋण में भी किसी प्रकार की बढ़ोतरी का प्रयास नहीं किया। ऐसे में जाहिर है वह अपने आपको किसान हितैषी प्रधानमंत्री तो बताते हैं लेकिन किसान अगर उनसे सहमत नहीं हो पाते हैं तो इस बात को समझा जाना चाहिए।
 
ऐसा भी नहीं है कि मोदी को किसानों के वोट की अहमियत नहीं पता। उन्हें यह अच्छी तरह पता है। परंतु अगर आप गुजरात के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों से पूछेंगे तो वे आपको बताएंगे कि उन्होंने एक बड़ी चूक की है। उन्होंने मान लिया कि शेष भारत के किसान भी उनकी कृषि नीतियों को समग्रता में लेकर अपनी प्रतिक्रिया देंगे जैसा कि गुजरात के किसानों ने किया। परंतु ऐसे लोग आपको यह भी बताएंगे कि केवल गुजरात के किसान ही नहीं बल्कि हर कोई आर्थिक गतिविधियों को लेकर अलग-अलग रुख रखता है। संक्षेप में कहें तो वे सरकार को सेवा प्रदाता नहीं मानते बल्कि उनको लगता है कि सरकार का काम सुविधाएं मुहैया कराना है और वे उसकी इस भूमिका से खुश हैं। 
 
जाहिर सी बात है जो तरीका गुजरात में कारगर रहा वह शेष भारत में काम नहीं करेगा। खासतौर पर हिंदी भाषी राज्यों में जहां से भाजपा को 282 में से 183 लोकसभा सीट मिली हैं। महाराष्ट्र और गुजरात के प्रदर्शन को भी हटा दें तो शेष 19 या 20 राज्यों में भाजपा को केवल 50 सीट मिलीं। यानी भाजपा उन राज्यों के मतदाताओं को खिझा रही है जिन्होंने उसे वोट दिया था। इसका यह अर्थ नहीं कि भाजपा दोबारा जीतेगी ही नहीं। शायद वह जीते लेकिन संभव है वह साधारण बहुमत गंवा दे। यह नाराजगी गुस्से में बदल सकती है। सरकार के पास अब ज्यादा वक्त नहीं है। भाजपा को अभी यह समझना होगा कि सुविचारित आर्थिक नीतियां अपने साथ बुरे राजनीतिक निहितार्थ समेटे रहती हैं क्योंकि उनके अल्पावधि में कई नुकसान होते हैं।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या चमड़ा क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलने से बढ़ेगा रोजगार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.