बिजनेस स्टैंडर्ड - आयात उदारीकरण की भूली-बिसरी दास्तान
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आयात उदारीकरण की भूली-बिसरी दास्तान

शंकर आचार्य /  September 19, 2017

एकपक्षीय, बहुपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार उदारीकरण आदि सभी ने देश में आयात लाइसेंसिंग समाप्त करने में भूमिका निभाई है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं शंकर आचार्य 

 
वर्ष 1990 तक के तीन दशक तक हमारी व्यवस्था में आयात पर अत्यंत जटिल मात्रात्मक प्रतिबंध लगे हुए थे। ये प्रतिबंध उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय तथा सीमा शुल्क प्रशासन की देन थे। लगभग तमाम आयात लाइसेंसिंग के अधीन थे। प्रतिबंधित, सीमित, सीमित अनुमतियोग्य, सारणीबद्घ और खुला आम लाइसेंस (ओजीएल) जैसी श्रेणियां एकदम आम थीं। प्रतिबंधित का अर्थ था पूरा प्रतिबंध जबकि सीमित का अर्थ प्राय: बहुत सीमित होता था यानी प्रतिबंध के करीब। वहीं ओजीएल का अर्थ हमेशा आयात सीमाओं से पूरी मुक्ति नहीं होता था। कई बार यह केवल वास्तविक उपयोगकर्ताओं के लिए ही मुक्त था। कारोबारी आयात नहीं कर सकते थे। कई सीमित और सीमित अनुमति वाले उत्पादों का आयात विशेष आयात लाइसेंस के जरिये किया जाता था। 
 
आयात लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया भी खासी जटिल और अस्पष्टï थी। सन 1980 के दशक के मध्य में वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के मंत्रालय में नवनियुक्त आर्थिक सलाहकारों के रूप में प्रणय रॉय और मैं कई बार आयात नीति समिति की हर पखवाड़े होने वाली बैठक में शिरकत करते थे। इसकी अध्यक्षता आयात और निर्यात के मुख्य नियंत्रक के हाथ होती थी। जब हमने विशिष्टï मामलों को समझा तो हमने उदारीकरण के पक्ष में दलील देने का प्रयास किया। हम अक्सर पूरी प्रक्रियाओं से परेशान हो जाते थे। शायद यह भी एक वजह थी कि प्रणय ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और एनडीटीवी की स्थापना कर भारतीय टेलीविजन उद्योग की शक्ल बदल दी। 
 
आयात को लेकर सख्ती की इस व्यवस्था और ऊंची व विविध दरों के ढांचे के चलते तमाम कारोबार योग्य उत्पाद ऊंचे, अनिश्चित और अस्पष्टï संरक्षण के तहत संचालित थे। विदेश व्यापार और किफायती घरेलू उद्योग के विकास के लिए उचित आर्थिक हालात मौजूद नहीं थे। परंतु सन 1991 के बाद यह सब बदल गया। बहरहाल, सन 1991 के बाद नई सीमा शुल्क दरों और विनिमय दरों का उदय हुआ और तब से यह पता लगा पाना काफी हद तक मुश्किल हो चला है कि मात्रात्मक प्रतिबंध से जुड़ी पुरानी नीति का क्या हुआ। उदाहरण के लिए राकेश मोहन द्वारा संपादित एक हालिया समीक्षा में हर्ष वर्धन सिंह सीमा शुल्क के दायरे का विस्तृत ब्योरा देते हैं लेकिन अपने 50 पन्नों की रिपोर्ट में आयात लाइसेंसिंग और मात्रात्मक प्रतिबंध पर बमुश्किल एक पन्ना ही खर्च किया है।
 
दूसरे विश्व युद्घ के बाद हुए जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ ऐंड ट्रेड (गैट) में मात्रात्मक प्रतिबंध की इजाजत नहीं थी। केवल बैलेंस ऑफ पेमेंट के दबाव की अत्यंत जोखिम भरी स्थिति में ही अस्थायी तौर पर इसकी इजाजत दी जा सकती थी। इसे बीओपी कवर का नाम दिया गया था। सन 1950 के दशक के विदेशी मुद्रा संकट के बाद हमारी सरकार ने मात्रात्मक प्रतिबंध की मदद से भुगतान संतुलन का प्रबंधन किया। यह अस्थायी व्यवस्था थी लेकिन इसे अगले कई दशकों तक प्रयोग में लाया जाता रहा। मुझे जिनेवा की कई यात्राएं याद आती हैं जो सन 1980 और 1990 के दशक के आरंभ में कई वाणिज्य सचिवों के साथ की गईं। यह पूरी कवायद मात्रात्मक प्रतिबंध को बचाने के लिए थी। यह कठिन था क्योंकि हम यह जानते थे कि बीतते समय के साथ यह व्यवस्था घरेलू उद्योगों के बचाव का जरिया बनकर सामने आई।
 
अच्छी बात है कि सन 1990 के दशक के आरंभ में व्यापार नीति उदारीकरण को लेकर जो शुरुआती तेजी थी उसमें कच्चे माल, बीच की वस्तुओं और पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध समाप्त हो गया। इसके परिणाम सन 1992 की निर्यात-आयात नीति में सामने आए। इसका अर्थ यह था कि टैरिफ लाइन का 60 फीसदी हिस्सा लाइसेंसिंग और मात्रात्मक प्रतिबंध से परे हो गया। बची हुई चीजों में उपभोक्ता वस्तुएं शामिल थीं जिन पर नीतिगत निर्णय टल गया था। समय बीतने के साथ-साथ मात्रात्मक प्रतिबंध के कारण मिली घरेलू राहत ने अपनी बड़ी जगह बना ली। यही वजह है कि सन 1996 तक भी मात्रात्मक प्रतिबंध से मुक्त टैरिफ का दायरा 61 फीसदी के आसपास ही बना रहा।
 
बहरहाल, सन 1993 के बाद हमारी भुगतान संतुलन की स्थिति में काफी सुधार हुआ। ऐसा व्यापार और विनिमय दर सुधारों की बदौलत हुआ था। ऐसे में गैट में हमारे वार्ताकारों का भी धैर्य समाप्त होता जा रहा था। हमारे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की ओर से दबाव बढ़ रहा था। इनमें सबसे प्रमुख नाम अमेरिका का था। इसलिए हमने मात्रात्मक प्रतिबंध से बचने की अपनी भुगतान संतुलन संबंधी सफाई को समाप्त करने के लिए छह वर्ष का चरणबद्घ समय मांगा। अन्य साझेदार तो सहमत हो गए लेकिन अमेरिका ने हमें अदालत में घसीट लिया। उसने ऐसा विश्व व्यापार संगठन की विवाद निस्तारण प्रक्रिया के अधीन किया। हम वहां हार गए और हमें अप्रैल 2001 तक मात्रात्मक प्रतिबंध समाप्त करना पड़ा। सन 1998 से 2000 के बीच दो साल में इनकी हिस्सेदारी 33 फीसदी से घटकर 12 फीसदी पर आ गई। जबकि मुक्त आयात की हिस्सेदारी 87 फीसदी हो गई। सन 2001 तक 95 फीसदी टैरिफ मात्रात्मक प्रतिबंध से मुक्त हो गया था और हम विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के अनुरूप काम करने लगे थे। स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण तथा संस्कृति के क्षेत्र में यह जारी रहा। 
 
मात्रात्मक प्रतिबंध के समापन के आखिरी दिनों में ऐसी आशंकाएं थीं कि उपभोक्ता वस्तुओं के आयात में तेजी आएगी। उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए एक वॉर रूम स्थापित किया गया। हालांकि ऐसी आशंकाएं निर्मूल ही साबित हुईं। उपभोक्ता वस्तुओं का आयात नहीं बढ़ा। बाजार आधारित विनिमय दर ने अपना काम किया। सन 1998 में कोलंबो में आयोजित 10वीं दक्षेस बैठक में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि दक्षेस देशों से होने वाले आयात के मामलों में भी मात्रात्मक प्रतिबंध लागू नहीं होगा। यह दक्षेस देशों के साथ प्राथमिकता वाले व्यापार समझौते के अधीन हुआ। इसके बाद भी आयात में कोई बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली जबकि आशंका ऐसी ही थी। देश के आयात को लाइसेंसिंग प्रतिबंधों से निजात दिलाने की इस रोचक कहानी का एक पहलू यह भी है एकपक्षीय, बहुपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार उदारीकरण संबंधी कदमों ने भी इसमें अपने-अपने वक्त पर अपनी-अपनी भूमिका निभाई है। 
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