बिजनेस स्टैंडर्ड - स्टार्टअप के स्वप्न को कैसे करें साकार
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स्टार्टअप के स्वप्न को कैसे करें साकार

अजित बालकृष्णन /  September 18, 2017

थोड़े बहुत जरूरी सुधारों के साथ देश के स्टार्टअप जगत में नई जान फूंकी जा सकती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
हाल ही में कुछ लोग मुझसे मिलने आए। वे चाहते थे कि मैं देश के स्टार्टअप जगत की सहायता करने में उनकी मदद करूं। मुझे वाकई उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। उन्होंने आते ही मेरे खाने की मेज पर एक बड़ा सा कागज बिछा दिया। जिस पर एक तीन मंजिला इमारत का चित्र बना था। इस इमारत का प्रवेश द्वार बहुत भव्य था।  उनमें से एक ने कहा कि यह एक ऐसी इमारत है जहां दर्जनों स्टार्टअप रह सकती हैं। मैंने उनसे पूछा कि इससे स्टार्टअप की मदद कैसे होगी। जवाब मिला कि एक बार इमारत का काम पूरा हो जाने के बाद हम उन्हें कार्यालय बनाने के लिए सस्ती जगह दे सकेंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी स्टार्टअप के लिए सस्ता कार्यालय तलाश करना अत्यंत अहम है। 
 
मुझे उन्हें यह समझाने में वक्त लगा कि वे जो प्रयास कर रहे हैं वह अचल संपत्ति क्षेत्र से जुड़ा मसला है। इस बीच मेरे जेहन में तमाम तस्वीरें कौंध गईं: तमाम जगहों पर राजनेता युवा स्टार्टअप संस्थापकों के साथ तस्वीरों में नजर आते, सरकार ने स्टार्टअप को एक पूरी वेबसाइट ही समर्पित कर दी। स्टार्टअप चलाने वालों से कहा गया कि वे श्रम कानून और पर्यावरण कानून जैसी चीजों को लेकर बहुत अधिक परेशान नहीं हों। लेकिन नीति निर्माण में अचानक बदलाव आया और स्टार्टअप की जगह विनियमन और सुधार जैसे शब्दों ने ले ली।
 
इसे समझा जा सकता है। देश में युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार तैयार नहीं हो पा रहे। कपड़ा, चमड़ा, धातु, वाहन, रत्न एवं आभूषण, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी और बीपीओ उद्योग जो रोजगार की रीढ़ हुआ करते थे, वे सभी संघर्ष कर रहे हैं। चिंता की बात यह है कि जिन उद्योगों में वृद्धि हो रही है, वहां भी रोजगार अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रहे। चूंकि लोगों को लग रहा है कि स्टार्टअप रोजगार की समस्या हल कर सकती है इसलिए आइए पहले जानते हैं कि स्टार्टअप दरअसल है क्या? तमाम चीजों को परिभाषित करने वाली वेबसाइट विकीपीडिया पर भरोसा करें तो स्टार्टअप दरअसल एक ऐसा तेजी से विकसित होता उद्यम है जो एकदम नई और अलग सेवा, उत्पाद या मंच उपलब्ध कराता है। यह मूलतया इंटरनेट आधारित तकनीक से किया गया नवाचार होता है जो बाजार की जरूरतों को पूरा करता है। 
 
अनुभव बताता है कि स्टार्टअप कुछ खास चरणों से गुजरती हैं। पहले चरण में सबसे बड़ा जोखिम होता है स्टार्टअप दी जाने वाली सेवा या वस्तु का नमूना तय लागत में उपलब्ध करा पाता है या नहीं। लागत ऐसी होनी चाहिए कि उपभोक्ताओं में इसे लेकर उत्सुकता पैदा हो सके। यह वह चरण है जहां उत्पाद से जुड़ा जोखिम सामने होता है। एक बार इस चरण को पार करने के बाद अगला जोखिम यह है कि कारोबार को सफल बनाने के लिए पर्याप्त तादाद में ग्राहक हैं या नहीं। यह बाजार के जोखिम का चरण है। इस चरण को पार करने के बाद राह अपेक्षाकृत आसान होती है। स्टार्टअप संस्थापक अब कारोबार बढ़ाने के लिए अनुभवी लोगों को साथ जोड़ सकते हैं और कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं। इन दोनों स्तरों पर किस तरह का निवेश और कितना निवेश चाहिए? मेरा अनुमान है कि देश की स्टार्टअप को करीब 50 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये के बीच का निवेश चाहिए। यह निवेश नौ महीने से एक साल की अवधि के लिए चाहिए। ताकि उत्पाद से जुड़े जोखिम से पार पाया जा सके। आगे बाजार जोखिम से निपटने के लिए करीब 1-3 करोड़ रुपये का ऋण अगले छह माह तक और चाहिए। अगर इन दो चरणों पर स्टार्टअप सफल रहती है तो वेंचर कैपिटल और अन्य लोग उसकी फंडिंग के लिए आगे आते हैं। यानी वास्तविक चुनौती इन दोनों चरणों से पार पाने की है। इन दो स्तरों के बाद उद्यमियों की मदद के लिए इन्क्यूबेटर का प्रस्ताव भी सामने आया। मौजूदा स्टार्टअप नीति में आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम आदि में ऐसे इन्क्यूबेटर के लिए उदार वित्त पोषण की व्यवस्था है। इसके अलावा भी हर राज्य सरकार ने इन्क्यूबेटर परियोजना चला रखी है। ये सारे प्रयास कुछ हद तक मदद करेंगे लेकिन एक अहम घटक फिर भी नदारद रहेगा। 
 
सूक्ष्म स्तर पर स्टार्टअप उद्यमी को दो या तीन लोगों की आवश्यकता होती है जो मिलकर 25-25 लाख रुपये का निवेश करें। इन्हें ऐंजल इन्वेस्टर कहा जाता है। आदर्श स्थिति में तो इन निवेशकों की उम्र और इनका अनुभव उद्यमी से ज्यादा होना चाहिए। इसके अलावा उनमें उस उत्पाद और कारोबार की बेहतर समझ भी आवश्यक है। अगले चरण में बाजार जोखिम के स्तर पर यही निवेशक या कुछ नए निवेशक 25 से 50 लाख रुपये प्रत्येक की और पूंजी लगा सकते हैं। पैसे से भी अधिक अहम यह है कि ये निवेशक उद्यमियों के ग्राहकों की संख्या बढ़ाने में उनकी मदद करें या उन्हें सही कर्मचारियों का चयन करने में मदद पहुंचाएं। इसका अर्थ यह हुआ कि सही ऐंजल इन्वेस्टर वही होगा जो अनुभवी हो और जिसके पास उद्योग का व्यापक अनुभव हो। तभी स्टार्टअप प्रगति कर सकेगी।
 
सवाल यह है कि सही ऐंजल निवेशकों को आगे आने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाए? हमने इस दिशा में एक अहम चीज जोड़ी है। सीमित दायित्व साझेदारी (एलएलपी)। भारत में यह 2008 में अस्तित्व में आई। एलएलपी एक ऐसा कारोबारी और विधिक संस्थान होता है जो साझेदारों से अलग होता है। ऐसे में एक ऐंजल निवेशक एलएलपी में निवेश करता है। उसे यह चिंता नहीं सताती कि उद्यम की जवाबदेही उसकी जवाबदेही में बदल जाएगी। इसके साथ ही एलएलपी का प्रशासन साझेदारी समझौते के तहत होता है और उसे हमारे कंपनी अधिनियम का सामना नहीं करना पड़ता है। 
 
हमें अब एक कदम और आगे बढऩे की आवश्यकता है। यानी आयकर अधिनियम में कुछ ऐसा बदलाव करने की जरूरत है ताकि शुरुआती दिनों में स्टार्टअप एलएलपी को होने वाला नुकसान हर एलएलपी साझेदार द्वारा अन्य आय से निपटाया जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि एलएलपी निवेशक को कर बचत अपने रिटर्न के रूप में मिलेगी। यह शुरुआती चरण में होगा जब स्टार्टअप को नुकसान हो रहा हो। अगर स्टार्टअप शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाता है तो कोई नुकसान नहीं होता और ऐंजल निवेशक को उसका पैसा वापस मिल जाता है। अगर ऐसा हो सका तो बड़ी तादाद में ऐंजल निवेशक सामने आएंगे। हमारे स्टार्टअप स्वप्न को पूरा करने के लिए उनकी बहुत आवश्यकता है। हमें इस दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है। 
Keyword: startup, company, policy,,
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