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चिंताजनक आंकड़े

संपादकीय /  September 18, 2017

पिछले हफ्ते जारी आंकड़ों से पता चला कि 2017-18 की पहली तिमाही में भारत का चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.4 फीसदी या 14.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले चार वर्ष में उसका उच्चतम स्तर है। इसके पीछे मुख्य कारण बढ़ता हुआ स्वर्ण आयात था, जो पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मुकाबले 69 फीसदी अधिक रहा। अगस्त में कुल आयात पिछले वर्ष अगस्त की तुलना में 20 फीसदी बढ़ा, जबकि निर्यात में केवल 10 फीसदी बढ़ोतरी हुई। इस प्रकार उस महीने में व्यापार घाटा बढ़कर 11.64 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष अगस्त में 7.7 अरब डॉलर ही था। सौभाग्य से त्वरित संकट का कोई खतरा नहीं दिख रहा है क्योंकि इसी महीने विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। लेकिन लक्षण स्पष्टï हैं और चिंता जनक हैं: भारत से निर्यात की रफ्तार प्रतिद्वंद्वी देशों से होने वाले निर्यात जितनी नहीं हो पा रही है और विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा संतोषजनक तरीके से बढ़ता नहीं दिख रहा है। रोजगार सृजन तब तक नहीं होगा, जब तक विनिर्माण में, विशेष रूप से श्रम की अधिकता वाले क्षेत्रों में तेजी से बढ़ोतरी नहीं होती है। घरेलू मांग उस स्तर तक नहीं पहुंच पाएगी, जो विनिर्माण में आवश्यक वृद्घि के लिए जरूरी है। इसीलिए निर्यात जरूरी हो जाता है। लेकिन श्रम के आधिक्य वाले क्षेत्रों जैसे कपड़ा और परिधान भी लागत को लेकर बहुत संवेदनशील हैं और भारत से निर्यात अभी तक पर्याप्त रूप से प्रतिस्पद्र्घी नहीं हो पाया है। 

 
एक ओर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कागजी कार्रवाई और खर्चीले नियमों को कम करने के प्रयास जारी रहें और उनमें तेजी लाई जाए। दूसरी ओर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रतिस्पर्धा क्षमता पर रुपये की ऊंची कीमत का प्रभाव पड़ रहा है।  8 सितंबर को रुपया एक बार फिर 64 प्रति डॉलर से नीचे चला गया। इस वर्ष जनवरी से रुपया डॉलर की तुलना में 6 फीसदी मजबूत हुआ है। इससे मार्जिन घट जाता है या प्रतिस्पर्धा की क्षमता में कमी आती है, जिसे निर्यातक आसानी से नहीं झेल सकते। 2013 में अमेरिकी ट्रेजरी की प्राप्तियों में बढ़ोतरी के समय से ही यह चलन नजर आ रहा है, जिसमें उस स्तर से भी महंगा नजर आता रहा है, जो स्तर भारत के व्यापार के लिए जरूरी है। इसका कारण क्या है? एक कारण यह है कि विदेशी मुद्रा का प्रवाह अच्छा रहा है। इसे भारत में भरोसे का संकेत माना जाता है, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि विनिमय दर पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता आया है। जनवरी से विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 6.6 अरब डॉलर लगाए हैं और भारतीय डेट में उन्होंने 20.3 अरब डॉलर का निवेश किया है। इस कारण रुपये में मजबूती आना तो तय ही है। शायद शेयरों से इतनी अधिक चिंता नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस तरह का प्रवाह पलट भी सकता है और सचमुच ऐसा होना शुरू भी हो चुका है। लेकिन डेट बिल्कुल अलग मुद्दा है। यह देखना पड़ेगा कि डेट में विदेशी निवेश की अभी क्या सीमा तय है और उस सीमा के कारण भारतीय कंपनी जगत को नुकसान तो नहीं हो रहा है क्योंकि धन के नए स्रोतों तक पहुंचने का मौका देकर कंपनियों की मदद करने के बजाय रुपये की कीमत में वृद्घि के साथ यह प्रतिस्पर्धा की क्षमता को कम कर रहा है। 
 
भारतीय रिजर्व बैंक की कार्रवाई की भी बारीकी से पड़ताल की जानी चाहिए। रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार से अभी जो राहत मिली है, वह कुछ परिस्थितियों में बदल भी सकती है। मिसाल के तौर पर पश्चिम एशिया में अस्थिरता से तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसलिए यह तय नहीं है कि 2013 से अभी तक रिजर्व बैंक पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार तैयार कर पाया है अथवा नहीं। इससे केंद्रीय बैंक को रुपये की मजबूत होने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में भी मदद मिल गई होती। स्पष्टï है कि सब कुछ ऐसा ही नहीं चलने दिया जा सकता है और कुछ कठोर फैसले करने ही होंगे।
Keyword: GDP, growth,,
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