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पूंजीकरण में अव्वल वित्तीय फर्में

कृष्ण कांत / मुंबई 09 17, 2017

ऋण क्षेत्र में हो रहा तेजी से विकास

कुल बाजार पूंजीकरण में बैंक और एनबीएफसी की हिस्सेदारी अब सबसे ऊंचे स्तर पर

भारत में ऋण या कर्ज देने वाला क्षेत्र तेजी से विकास कर रहा है और इस क्षेत्र की सफल कंपनियों पर हाल के दिनों में इक्विटी निवेशकों का दुलार भी उमड़ रहा है। सभी सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण में बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की हिस्सेदारी सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई है क्योंकि विनिर्माण और गैर-वित्तीय कंपनियों जैसे कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को कमजोर मांग का सामना करना पड़ रहा है।

बैंकों और बीमा कंपनियों सहित एनबीएफसी का समेकित बाजार पूंजीकरण मार्च 2014 के 17.2 फीसदी और मार्च 2012 के 17.3 फीसदी से बढ़कर 22.3 फीसदी हो गया है, जो पिछले दो दशक में सर्वाधिक है। दूसरी ओर विनिर्माण कंपनियों का बाजार पूंजीकरण घटकर दस साल के निचले स्तर 54 फीसदी पर आ गया है जबकि वित्त वर्ष 2014 के अंत में यह 55 फीसदी और पांच साल पहले करीब 57 फीसदी थी।

बाजार पूंजीकरण में सबसे ज्यादा गिरावट गैर-वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों टाटा कंसल्टेंसी, इन्फोसिस और विप्रो आदि में आई है। गैर-वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों का बाजार पूंजीकरण घटकर सबसे निचले स्तर 23.7 फीसदी पर आ गया है, जो तीन साल पहले 28 फीसदी पर था। बैंकों और एनबीएफसी का समेकित बाजार पूंजीकरण पिछले तीन साल में 145 फीसदी बढ़कर 30.4 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है और मार्च 2014 से इसमें सालाना 29 फीसदी की दर से इजाफा हो रहा है। इसी अवधि में विनिर्माण कंपनियों का समेकित बाजार पूंजीकरण 85 फीसदी बढ़कर 73.6 लाख करोड़ रुपये रहा और इस दौरान सालाना आधार पर इसमें 19.2 फीसदी की वृद्धि देखी गई।

हालांकि बाजार पूंजीकरण में इस तेजी का ज्यादा फायदा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नहीं मिल पाया है क्योंकि वे मुख्य रूप से ऋण देने के कारोबार से जुड़े हैं और कॉरपोरेट क्षेत्र की ओर से ताजा निवेश नहीं होने से कर्ज की मांग में नरमी का रुख बना हुआ है। गैर-वित्तीय सेवा क्षेत्र का बाजार पूंजीकरण इस दौरान 61 फीसदी बढ़कर 32.4 लाख करोड़ रुपये रहा और मार्च 2014 से सालाना आधार पर इसमें महज 14.6 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है।

यह विश्लेषण सक्रिय रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के वित्त वर्ष 1994-95 से साल के अंत में बाजार पूंजीकरण और राजस्व के आधार पर किया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि नमूने का आकार हर साल बढ़ता रहा क्योंकि इस दौरान कई कंपनियां सूचीबद्ध हुई हैं। उदाहरण के तौर पर वित्त वर्ष 2017 में नमूने में 3,552 कंपनियां थीं जबकि वित्त वर्ष 1995 में इनकी संख्या 1,551 थी। हालांकि वास्तविक आंकड़ा उतना मायने नहीं रखता है क्योंकि यह विश्लेषण कुल बाजार पूंजीकरण के प्रतिशत पर आधारित है।

भले ही कुल आंकड़ों में ऐसा नजर नहीं आता हो लेकिन रिटेल फाइनैंस में आई तेजी विनिर्माण और सेवा क्षेत्र जैसे संबंधित क्षेत्रों में भी दिखनी शुरू हो गई है। उदाहरण के लिए इस समय सबसे ज्यादा तेजी यात्री कारों और दोपहिया वाहनों सहित टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और संगठित खुदरा क्षेत्र में दिख रही है। इन क्षेत्रों में लोन के जरिये खरीद की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में फाइनैंस का जोर बढ़ रहा है और औद्योगिक विकास तथा सेवा निर्यात में लगभग ठहराव आ चुका है।

इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक जी चोक्कालिंगम ने कहा, 'निजी क्षेत्र के बैंक और खुदरा गैर बैंकिंग फाइनैंस कंपनियां लगातार वृद्धि हासिल कर रही हैं जबकि बाकी अर्थव्यवस्था में ठहराव की स्थिति है। इसलिए वित्तीय कंपनियां निवेशकों की चहेती बनी हुई हैं।' 

विभिन्न क्षेत्रों की सूचीबद्ध कंपनियों की राजस्व  वृद्धि में यह बात नजर आती है। बैंकों और गैर बैंकिंग कंपनियों का मुख्य राजस्व पिछले तीन साल के दौरान 7.3 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ा है। यह देश के सबसे तेजी से बढऩे वाले क्षेत्रों में से एक है। इसी अवधि में यूटिलिटी और निर्माण फर्मों समेत विनिर्माण कंपनियों का संयुक्त राजस्व 2.8 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ा। लेकिन गैर वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनियों की शुद्ध बिक्री 4.8 फीसदी की वार्षिक दर से कम हुई। बैंकों और वित्तीय कंपनियों को भारतीयों द्वारा उपभोक्ता सामान, वाहन और घर के लिए ऋण लेने से भी फायदा हुआ है।

भारतीय रिजर्व बैंकों के अनुसार पिछले तीन साल में पर्सनल लोन या पारिवारिक ऋण 18 फीसदी सालाना की चक्रवृद्धि दर से बढ़ा है। दूसरी तरफ इस दौरान मौजूदा मूल्यों पर खर्च योग्य आय (कर कटौती के बाद) में 10.2 सालाना चक्रवृद्धि दर से इजाफा हुआ। कुल मिलाकर पिछले तीन साल में घरेलू ऋण संचयी स्तर पर बढ़ा है जबकि इस दौरान खर्च योग्य आय 35 फीसदी बढ़ी है। 

इस सबका असर यह हुआ कि खुदरा उधारी में तेजी आई और निजी क्षेत्रों के बैंकों तथा गैर बैंकिंग कंपनियों जैसे खुदरा ऋणदाताओं के मूल्यांकन में तेज इजाफा हुआ। इन एनबीएफसी में एचडीएफसी, बजाज फाइनैंस, इंडिया बुल्स हाउसिंग, इक्विटास होल्डिंग्स, पीएनबी हाउसिंग और भारत फाइनैंशियल इनक्लूजन शामिल है। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज में शोध प्रमुख धनंजय सिन्हा कहते हैं कि अब देश में विकास की कहानी वित्तीय क्षेत्र गढ़ रहा है। इससे खुदरा उधारी, खासतौर पर एनबीएफसी के शेयर मूल्यांकन में बुलबुले जैसी स्थिति बन गई है। उनका मानना है कि यह रुझान कुछ समय बरकरार रह सकता है। इसकी वजह रोजगार और आय में कमजोर बढ़त के बावजूद अर्थव्यवस्था में निजी खपत पर बढ़ती निर्भरता है। सिन्हा ने कहा कि कॉरपोरेट निवेश और निर्यात में मंदी के दौर में सरकार वित्तीय खर्च के जरिये खपत को प्रोत्साहन दे रही है ताकि अर्थव्यवस्था में तेजी लाई जा सके। अलबत्ता यह आशंका भी है कि उद्योग और निर्यात में तेजी नहीं आने से यह चक्र टूट सकता है।
Keyword: ऋण क्षेत्र, बाजार पूंजीकरण, बैंक, एनबीएफसी, हिस्सेदारी, इक्विटी निवेशक, बीमा,
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