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बीच में नहीं छोड़ें जीवन बीमा पॉलिसी का साथ

संजय कुमार सिंह /  09 17, 2017

भारत में जीवन बीमा कंपनियों द्वारा बेची गई पॉलिसियों के प्रभावी रहने की दर काफी कम है। अगर 5 साल के समय को मानक बनाकर देखें तो इस अवधि के दौरान जीवन बीमा पॉलिसियों के चालू रहने की दर (हैंडबुक ऑफ इंडियन इंश्योरेंस स्टैटिस्क्सि के अनुसार) 28 प्रतिशत है। इसका मतलब हुआ कि इस अवधि यानी 5 साल बाद बाद आधी जीवन बीमा कंपनियां अपनी 28 प्रतिशत से भी कम पॉलिसियां सक्रिय रख पाती हैं। घरेलू वित्त पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की एक समिति ने पॉलिसियों के प्रभावी रहने की इस कमजोर दर पर भारी चिंता जताई है। समिति ने कहा कि लोग यह नहीं समझते हैं कि पॉलिसी बीच में बंद होने से भविष्य में मिलने वाले उनके लाभ के दावे पर असर होगा। 

 
जीवन बीमा पॉलिसियों के बीच में ही बंद हो जाने के लिए जानकार कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस में मुख्य परिचालन अधिकारी ललिता भाटिया का मानना है, 'कभी-कभी ग्र्राहक नियम एवं शर्तें ठीक से समझे बिना ही पॉलिसी खरीद लेते हैं। इससे उनका मोहभंग बढ़ता है। जब उन्हें लगता है कि इस पॉलिसी से उन्हें अपने वित्तीय लक्ष्य हासिल करने में मदद नहीं मिलेगी तो वह इसे बीच में ही रोक देते हैं।' ऐसा अक्सर तब होता है जब सुरक्षा की जरूरत के बजाय कर बचाने के मकसद से आनन-फानन पॉलिसियां खरीद ली जाती हैं। बीमारी या नौकरी छूट जाने, शादी या समारोह आदि में बेतहाशा खर्च जैसे कारणों से वित्तीय संकट खड़ा होने पर लोग अपनी पॉलिसी बंद हो जाने देते हैं। एजेंट को मिलने वाले प्रोत्साहन का ढांचा भी एक वजह है जिसके कारण कई लोग पॉलिसियों में बदलाव करते हैं। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार पर्सनलफाइनैंस डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'जीवन बीमा पॉलिसी की बिक्री पर मिलने वाला अग्रिम कमीशन बाद में मिलने वाली कमीशन के मुकाबले ज्यादा होता है।
 
यानी पॉलिसीधारक को पुरानी पॉलिसी जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय एजेंट उसे एक बंद करवाकर दूसरी पॉलिसी बेच देता है।' अगर आपको कोई खराब पॉलिसी बेची गई है और आपको इसका एहसास साल भर के भीतर हो जाता है तो शायद  प्रीमियम पूरी तरह गंवा कर भी ऐसी पॉलिसी को बंद कर देना उचित है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्राहकों को पूरी तरह सोच-समझकर या किसी विश्वसनीय स्रोत की सलाह पर ही बीमा पॉलिसी खरीदनी चाहिए। पॉलिसी खरीदने के बाद उनको उसे पूरे समय तक चलाते रहना चाहिए। पॉलिसी को बंद होने से बचाने के पक्ष में पहला कारण तो यही है कि इसके बंद होने पर आपका जोखिम कवर खत्म हो जाता है। पॉलिसीएक्स डॉट कॉम के मुख्य कार्याधिकारी और संस्थापक नवल गोयल कहते हैं,' पॉलिसी बीच में ही बंद होने का मतलब है कि ग्राहक को मृत्यु लाभ या परिपक्वता लाभ नहीं मिलेगा।' इतना ही नहीं, पॉलिसी दोबारा शुरू करना भी खासा मुश्किल भरा हो जाता है। गोयल कहते हैं, 'अगर आप भविष्य में पॉलिसी लेना चाहेंगे तो कुछ ही विकल्प बचेंगे क्योंकि बड़ी बीमा कंपनियां आपके पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए आपको पॉलिसी देने से हिचकिचा सकती हैं।' 
 
यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसियों (यूलिप) में लॉक इन अवधि होती हैं। इसलिए आप इनसे पांच साल बाद ही रकम निकाल सकते हैं। मान लें कि आप दो प्रीमियम का भुगतान करने के बाद पॉलिसी लौटा देते हैं। बीमा कंपनी कुछ शुल्क काटकर शेष रकम डिस्कंटीन्यूड पॉलिसी फंड में डालेंगी। बीमा कंपनी फंड प्रबंधन शुल्क काट सकती हैं, जो कोष के मूल्य का 0.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। निकासी किए जाने तक आपको इस रकम पर 4 प्रतिशत ब्याज मिलेगा।  परंपरागत पॉलिसी के मामले में अगर आप शुरू में ही प्रीमियम बंद कर देते हैं तो आपको रकम गंवानी पड़ सकती है। 
 
गोयल कहते हैं, ' भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) शुरुआती 7 साल के लिए पॉलिसी लौटाने (सरेंडर) पर रकम तय करता है। सातवें साल से आपको जो रकम मिलती है, वह बीमा कंपनी की नीति (आईआरडीएआई से मंजूर) पर निर्भर करती है।' अगर आप दूसरा प्रीमियम भुगतान करने से पहले ही पॉलिसी सरेंडर कर देते हैं तो आपको कोई रकम नहीं मिलेगी। तीसरे साल में छोडऩे पर आपको चुकाए गए प्रीमियम का 30 प्रतिशत मिलता है। 
Keyword: insurance, बीमा पॉलिसी,
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