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उच्च गति वाली ट्रेन एक अनिवार्य पहल

नीलकंठ मिश्रा /  September 17, 2017

अक्सर यह आलोचना होती है कि क्या तेज गति वाली ट्रेन के लिए आवंटित फंड का इस्तेमाल मौजूदा रेल क्षमताओं की सुरक्षा बढ़ाने और उनका विस्तार करने में नहीं होना चाहिए। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा


भारतीय रेल द्वारा उच्च गति वाली रेल (एचएसआर) के मार्ग प्रस्तावित किए जाने के दशक भर बाद देश की पहली एचएसआर लिंक की आधारशिला रख दी गई है। यह रेल अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलेगी। इसका परिचालन शुरू होने में पांच से छह वर्ष का समय लगेगा। दोनों शहरों के सफर में अभी जहां 6 से 8 घंटे का वक्त लगता है, वहीं यह घटकर लगभग 2 घंटे रह जाएगा। अगर ट्रेन सभी 12 स्टेशनों पर रुकती है तो यह सफर करीब 3 घंटे का होगा। माना जा रहा है कि 508 किलोमीटर की इस परियोजना के पूरा होने में 1.1 लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यह भारतीय रेल की अब तक की सबसे महत्त्वाकांक्षी परियोजना है। 
 
भारतीय रेल के समक्ष यूं तो समस्याओं का अंबार है। सुरक्षा, समय की पाबंदी और कर्ज का जोखिम (वेतन और पेंशन रेलवे के राजस्व में दो तिहाई से अधिक के हिस्सेदार हैं। इसके अलावा कोयला, लौह अयस्क और खाद्यान्न जैसे प्रमुख राजस्व कारकों का ढांचागत समायोजन भी राजस्व को प्रभावित करते हैं)। क्षमता विस्तार के लिए भी रेलवे ऋण के भरोसे है। यही वजह है कि उसे अक्सर इस आलोचना का सामना करना पड़ता है कि क्या एचएसआर के लिए इस्तेमाल होने वाले फंड का इस्तेमाल मौजूदा रेल क्षमताओं की सुरक्षा और विस्तार के काम में करना बेहतर नहीं होता।
 
मेरी नजर में यह बहस अनावश्यक है क्योंकि एचएसआर किसी भी अन्य गतिविधि को रोकती नहीं है। चाहे जो भी हो लेकिन इस परियोजना के लिए उपलब्ध फंड (जापान से मिला रियायती ऋण इस परियोजना के व्यय की 85 फीसदी पूर्ति करेगा। 0.1 फीसदी की दर पर मिला यह ऋण 50 वर्ष के लिए है।) इसका कहीं अन्य उपयोग नहीं किया जा सकेगा। ऐसी परियोजनाओं के लिए सस्ता ऋण एक सहज और सामान्य चीज है क्योंकि दुनिया के कम ही इलाकों में एचएसआर काम कर सकती है। चीन, जापान और यूरोप तीन ही जगह के सहायता संघ इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि दो ऐसे शहर हों जो अधिक आबादी वाले और अमीर हों। कम से कम ऐसे कि हर साल करीब एक से चार करोड़ लोग इस पर सफर कर सकें। इन शहरों के बीच की दूरी भी 500 से 1000 किमी के बीच होनी चाहिए। इससे कम दूरी तेज गति वाली ट्रेन के लिए व्यवहार्य नहीं होती और अधिक दूरी होने पर विमानन सेवा कहीं अधिक किफायती हो सकती है। हमारे देश में पहले ही 9 एचएसआर मार्ग चिह्निïत किए जा चुके हैं। अब काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि यह परियोजना कैसी रहती है।
 
देखना होगा कि क्या यह परियोजना आर्थिक दृष्टिï से व्यावहारिक साबित होती है या नहीं? परियोजना के लिए लगभग मुफ्त में मिल रही पूंजी के चलते वित्तीय रिटर्न की बाधा लगभग दूर हो चुकी है। लेकिन मुंबई और अहमदाबाद के लिए एक सप्ताह पहले लिया गया हवाई टिकट महज 2,000 रुपये का है। ऐसे में 2,500 से 3,000 रुपये का ट्रेन टिकट लेकर साल में 1.5 करोड़ लोग यात्रा करेंगे या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। 
 
यह बात समझना अहम है कि एचएसआर न केवल हवाई, सड़क और रेल यात्रियों में से कुछ को अपनी ओर आकर्षित करेगी, बल्कि उसके अपने अलग यात्री भी होंगे। चूंकि एक नया विकल्प मौजूद होगा तो लोग उसका इस्तेमाल भी करेंगे। चीन में करीब आधे यात्री खास एचएसआर का सफर करते हैं। एचएसआर ऐसे यात्रियों को लक्षित करती है जो उसी दिन लौटना चाहते हों। सूरत से बांद्रा कुर्ला काम्प्लेक्स (बड़ा कारोबारी ठिकाना) पहुंचने में ऐसी ट्रेन को एक घंटा लग सकता है। इसका मासिक किराया करीब 35,000 रुपये हो सकता है। अगर बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स में काम करने वाले कुछ हजार कर्मचारी सूरत में रहना शुरू कर दें तो साल भर में कई लाख यात्राएं शुरू हो जाएंगी। क्या ठाणे, विरार और बोइसर (टे्रन इन सभी स्टेशनों पर रुकेगी) या वापी के लोगों को वहां रहने और मुंबई में काम करने या अहमदाबाद में काम करने वालों के वडोदरा में रहने का विकल्प व्यवहार्य साबित होगा? विमान यात्राओं के उलट ट्रेन यात्राओं में बीच वाले स्टेशनों से भी लोग चढ़ते-उतरते हैं। मुंबई हवाई अड्डïे को शहर से बाहर स्थानांतरित किया जा रहा है। यह बात भी एचएसआर के हक में जाएगी।
 
इसके अलावा ओईसीडी के मुताबिक राजस्व तो एचएसआर के सकल लाभ का महज 30 फीसदी है। करीब 50 फीसदी तो रेल यात्रियों का बचने वाला समय है। इसके अलावा बढ़ी हुई विश्वसनीयता भी एक पहलू है। यह लाभ भले ही रेलवे को न मिले लेकिन यात्रा का औचित्य तो इससे स्थापित होता ही है। एक पूर्ण संचालित एचएसआर का पर्यावरण प्रभाव भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह विमानों या कारों की तुलना में बहुत कम कार्बन उत्सर्जन करती है।
 
जापान में पहली एचएसआर 1964 में चली। उसके बाद सन 1970 के दशक में इसने यूरोप का रुख किया। चीन ने दो दशक पहले इसकी शुरुआत की और अब दुनिया की दो तिहाई एचएसआर पटरियां चीन में हैं। वहां 20,000 किमी से अधिक पर परिचालन हो रहा है जबकि 25,000 किमी निर्माण की प्रतीक्षा में हैं। इनका शुरुआती पूंजी निवेश सामान्य ट्रेन की तुलना में छह गुना रहा। अब शांघाई-पेइचिंग जैसे व्यस्त मार्गों पर यह मुनाफा कमा रही है। इसकी वजह से जो आर्थिक बदलाव आया है वह भी उल्लेखनीय है। भारत के लिए भी अब वक्त आ गया है कि वह इस तकनीक के साथ प्रयोग कर डाले। 
 
भारत में यूं तो निवेश की कमी रहती है लेकिन इस परियोजना का उदाहरण बताता है कि बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए कैसे सस्ती पूंजी जुटाई जा सकती है। दिल्ली मेट्रो रेल निगम देश भर की मेट्रो रेल परियोजनाओं के लिए सलाहकार का काम कर रही है। अगर यह परियोजना सफल रही तो एचएसआर के लिए देश भर में वही भूमिका निभा सकती है। ऐसे में समुद्री सुरंग और एडवांस सिग्नल तकनीक नए लाभ लेकर आ सकती है। किसी भी अन्य परियोजना की तरह यहां भी क्रियान्वयन बहुत मायने रखेगा। देरी करने से लागत बढ़ेगी और इसकी आर्थिक व्यवहार्यता कम होगी। तकनीक हस्तांतरण और कौशल विकास को देखें तो यह परियोजना जापान से अनिवार्य सोर्सिंग भी सस्ती फंडिंग की एक वजह है। आगे चलकर खरीद के देसीकरण की मदद से इसे संतुलित किया जा सकता है। 
Keyword: india, japan, narendra modi, bullet train,,
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