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बेकार की दहशत और बुनियाद की ताकत

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 15, 2017

होमियोपैथी अपेक्षाकृत आधुनिक चिकित्सा पद्घति है। इसकी खोज जर्मनी में सैमुअल हैनीमेन ने सन 1796 में की। किसी ने इसकी सराहना की तो किसी ने सवाल उठाया तो कुछ लोगों ने इसे खारिज किया। विकसित दुनिया में तो इसे छद्म विज्ञान कहकर इसका मखौल तक उड़ाया गया। भारत में यह आज भी मुख्य धारा की चिकित्सा शैली है। हर छोटे बड़े शहर में इसके चिकित्सक हैं और उनमें से ज्यादातर विश्वसनीय चिकित्सक डॉ. बनर्जी नाम के ही मिलेंगे। अपने गृह स्थान जर्मनी में यह पद्घति लगभग मृतप्राय है। भारत में यह फलफूल रही है और केंद्र सरकार इसे अच्छी खासी आर्थिक मदद भी देती है। आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्घ और होमियोपैथी) इसका उदाहरण है। हमारे देश में इसका मजाक उड़ाना खतरनाक है।  

 
भारत में होमियोपैथी की लोकप्रियता की वजह भी जरूर होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह पद्घति बनी ही ऐसे लोगों के लिए है जो बीमारी की शंका भर होते ही मीठी सफेद गोलियां चूसना शुरू कर देते हैं। यह सिलसिला महीनों तक चलता है। आपको कोई असर नहीं नजर आता लेकिन धीरे-धीरे आपको लगता है कि आप ठीक हो रहे हैं। दूसरी बात इसका कोई नुकसान नहीं होता जबकि तगड़ी दवाई या शल्य चिकित्सा का प्रभाव तुरंत दिख सकता है। 
 
क्या हम होमियोपैथिक मनोदशा वाला देश बन चुके हैं। यह सोच अन्य क्षेत्रों में भी लागू होती है। खासतौर पर प्रशासन और बुनियादी विकास के क्षेत्र में। आप किसी भी आकार की परियोजना का जिक्र कीजिए और लाखों लोग आकर बताने लगेंगे कि कयामत आ जाएगी। इस सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखी तो वही सिलसिला चालू हो गया। कांग्रेस नेता और अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तो ताज महल की याद दिलाते हुए कहा कि कैसे उसके चलते भारत आर्थिक संकट, अकाल और भुखमरी का शिकार हो गया था। उन्होंने कहा कि बुलेट ट्रेन तो चलेगी लेकिन उसके अलावा क्या होगा इसकी कल्पना कर लीजिए। ऐसी ही आलोचना कई और हलकों से आई। क्या भारत इसका बोझ उठा सकता है, क्या यह व्यवहार्य है, क्या इसे चलाना आर्थिक दृष्टिï से समझदारी भरा होगा? सबसे तगड़ी आलोचना कुछ इस रूप में सामने आई कि जब देश में 17,000 मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग हैं और ट्रेनें लगातार बेपटरी हो रही हैं तो क्या देश को बुलेट ट्रेन के लिए आगे बढऩा चाहिए? ये वही लोग हैं जो शिकायत करते रहे हैं कि सन 1971 के बाद देश में ट्रेनों की अधिकतम गति नहीं बढ़ी है। 
 
सबसे रोचक आर्थिक दलील यह है कि हवाई यात्रा का टिकट इतना सस्ता होने पर भला बुलेट ट्रेन का टिकट कौन खरीदेगा? यह बात हर कोई भूल रहा है कि हवाई टिकट के दाम में कमी केवल निजीकरण के चलते आई है क्योंकि क्षमता और आपूर्ति बढ़ी है। विमानन क्षेत्र अप्रतिस्पर्धी और महंगे सरकारी प्रभुत्व से निकलकर मुक्त बाजार के हाथ में आया और सफल हुआ। हवाई सफर का जबरदस्त लोकतंत्रीकरण हुआ है। बहरहाल, संसद की परिवहन मामलों की स्थायी समिति ने सन 2013 में छह अन्य बड़े हवाई अड्डों के निजीकरण का विरोध किया। उसकी ओर से बोलते हुए माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि समिति निजीकरण और परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने के खिलाफ है। बुलेट ट्रेन की आलोचना करने वाले सोच रहे हैं कि अब विमान किराया कभी नहीं बढ़ेगा और न ही बुलेट ट्रेन का किराया कम होगा। न ही वे इसके चलते जमीन के मूल्य में बदलाव और शहरीकरण की दलील को ध्यान में रख रहे हैं। वे कार्बन उत्सर्जन करने वाली कारों और राजमार्गों की समस्या को भी तवज्जो नहीं दे रहे हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि 50 साल के लिए नाम मात्र के ब्याज पर लिया गया ऋण हमें बरबाद कर सकता है। देश के करोड़ों गरीब यात्रियों को इससे कोई लेनादेना नहीं है। जब भी कोई बड़ी परियोजना शुरू होती है तो ऐसा ही होता है। जब ई श्रीधरन ने कोंकण रेलवे का काम शुरू किया और जब सन 1995-99 में नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के युवा परिवहन मंत्री के रूप में मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे शुरू किया था तब भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कहा गया था कि इससे पर्यावरण और सरकारी खजाने पर भारी असर होगा। आज हम इनके बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते। देश में बनाओ, चलाओ, हस्तांतरित करो आधार पर बना पहला एक्सप्रेसवे इस क्षेत्र में चले देशव्यापी अभियान के लिए प्रेरणा बन गया। 
 
परियोजना की पूरी वसूली टोल नाके से हो जाती है। परंतु इसका वास्तविक लाभ कहीं और दिखता है। एक्सप्रेसवे ने पुणे को भीड़ भरे मुंबई का विकल्प बना दिया। यह अब आईटी, नवाचार और नई अर्थव्यवस्था का केंद्र बन चुका है। इसने अरबों डॉलर की संपत्ति निर्मित की है। कोंकण रेलवे देश का गौरव है और वाम के गढ़ केरल की जीवनरेखा भी। अतीत में योजना आयोग भी यह काम करता था। वह किसी बड़ी और महत्त्वाकांक्षी परियोजना को फाइल के स्तर पर ही खारिज कर देता था। एक किस्सा यह भी है कि योजना भवन ने मारुति परियोजना को ख्वाब करार देते हुए कहा था कि उसके अनुमान के मुताबिक हिंदुस्तान में सालाना 50,000 से अधिक कारें नहीं बिकेंगी। हिंदुस्तान मोटर्स और प्रीमियर पहले ही कार बना रही हैं तो मारुति की क्या जरूरत? इस बात को समझदारीपूर्वक ठुकरा दिया गया। आज देश वाहन क्षेत्र की विश्व शक्ति है। वर्ष 2016-17 में देश में 30 लाख से अधिक कारें बिकीं और 7.5 लाख कारें निर्यात की गईं।
 
महानगरों के हवाई अड्डों के निजीकरण को लेकर चल रही बहस को देखें। सरकारी संपत्तियों के निजीकरण के स्वाभाविक वाम विरोध के अलावा व्यवहार्यता, जरूरत से ज्यादा क्षमता, संसाधनों की कमी आदि अनेक पहलू रहे हैं। आज मुंबई, दिल्ली और बेंगलूरु में क्षमता से ज्यादा यात्री हैं और इनका तेजी से विस्तार हो रहा है। हवाई क्षेत्र में जबरदस्त उछाल और विमान किरायों में भारी कमी, ये दोनों ही बिना इसके संभव नहीं हो सकते थे। दिल्ली हवाई अड्डे के निकट बनी एयरोसिटी को तब सफेद हाथी कहकर खारिज कर दिया गया था। दिल्ली हवाई अड्डे के निजीकरण पर सीएजी की रिपोर्ट चर्चा में रही थी, अब उसका भी कहीं कोई जिक्र नहीं। ऐसी ही तमाम दलीलें दिल्ली मेट्रो के वक्त भी सुनने को मिली थीं। आज 11 शहरों में मेट्रो बन रही है और दिल्ली में इसका चौथा चरण पूरा हो रहा है। 
 
टिप्पणी: परिवहन विशेषज्ञ और आईआईटी प्रोफेसर दिनेश मोहन ने सन 2002 में कहा था, 'मुझे नहीं लगता कि सन 2021 में पांचवां चरण पूरा होने तक मेट्रो बची रह सकेगी।' कई मामलों में होमियोपैथी सोच की भी जीत हुई है। मुंबई सी लिंक को बांद्रा से वर्ली तक एक तिहाई बनाकर छोड़ दिया गया। वर्सोवा-बांद्रा और वर्ली-चौपाटी का काम नहीं हुआ। दिल्ली में बारापूला एलिवेटेड कॉरिडोर आधा बनाकर छोड़ दिया गया। अब इसे पश्चिम की ओर बढ़ाया जा रहा है और सात साल में काम पूरा होगा। 
 
देश में कुप्रशासन का एक जीता जागता नमूना है राजधानी का राव तुला राम मार्ग जिसे दिल्ली हवाई अड्डे जाने वाले आठ लेन के राजमार्ग के दो सिरों को जोडऩे वाला बनाया गया था। यह एक संकरा रास्ता है। इसके पीछे एक अनकही वजह यह भी है कि पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरामन की जाति के एक ताकतवर समूह से सरकार ने वादा किया था कि उस पहाड़ी को नहीं छेड़ा जाएगा जिस पर लोकप्रिय स्वामी मलाई मंदिर बना था। कुछ ही साल के भीतर उसका पुनर्निर्माण और विस्तार करना पड़ रहा है। दिल्ली-जयपुर और दिल्ली-अमृतसर राजमार्गों को छह लेन वाला बनाया जा रहा है। आठ लेन वाला दिल्ली-गुडग़ांव राजमार्ग पूरा होने के पहले ही छोटा पडऩे लगा है। सरकार पहले इसे आठ के बजाय 12 लेन में बनाने का प्रस्ताव ठुकरा चुकी थी। यही वजह है कि देश में बुनियादी क्षेत्र का काम चलता ही रहता है। होमियोपैथी शैली की योजना नुकसानरहित नहीं है। बुलेट ट्रेन में अच्छी बात यह है कि परियोजना का नियंत्रण जापान के हाथ रहेगा। मोदी सरकार को लेकर चाहे जो भी कहें लेकिन यह आरोप नहीं लगा सकते उसमें गति और आकार को लेकर पुरातन भारतीय भय कायम है। यह बात दीगर है कि उसने अपनी सरकारी प्रतिबद्घता को होमियोपैथी तक बढ़ा लिया है।
Keyword: india, japan, narendra modi, bullet train,,
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