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नए नायकों की तलाश

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 15, 2017

आज से 20 वर्ष पहले एक प्रचलित तरीका यह था कि अगर सरकार या सरकारी क्षेत्र किसी काम को ठीक से नहीं कर पा रहा तो उसे निजी क्षेत्र को सौंप दो। यह तरीका सफल भी रहा। हमारे सामने निजी विमानन कंपनियों, फोन कंपनियों, निजी बैंकों (कम से कम कुछ) और उदारीकरण के बाद एल्युमीनियम, तांबे और जस्ते जैसी धातु कंपनियों के उदाहरण हैं जिनके प्रदर्शन के आधार पर यह व्यापक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि खुली प्रतिस्पर्धा में सरकारी क्षेत्र की हालत बहुत कमजोर है। यह भी कि उपभोक्ताओं को सही सेवा तभी मिल पाती है जब निजी क्षेत्र को बाजार में प्रवेश मिलता है। यह तब भी है जब ये निजी कंपनियां गुणवत्ता के मामले में बहुत स्तरीय नहीं रही हैं। फोन कंपनियां इसका उदाहरण हैं। या कई विमानन कंपनियां बंद हो गईं। इसे भी प्रतिस्पर्धी बाजार का उदाहरण माना जा सकता है। 

 
लेकिन यह सीधी सपाट अवधारणा अब बदल चुकी है क्योंकि दिवालिया सरकारी बैंकों की इस हालत के लिए निजी कर्जदार ही जिम्मेदार हैं। हर तिमाही में सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। बैंकों को परिचालित करने के लिए जरूरी पूंजी की आवश्यकता लगातार असामान्य स्तर तक बढ़ती चली जा रही है। ऐसे में निजी क्षेत्र को भी कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। बहरहाल, सरकारी क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियों की दरिद्रता और एयर इंडिया जैसे सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा लिए गए ऋण को सरकारी बैंकों की इस खस्ता हालत की वजह नहीं माना जा सकता है। हर कोई जानता है कि आखिरकार सरकार जिम्मा उठाएगी और बैंकों का पैसा सुरक्षित रहेगा। असली समस्या निजी ऋण की है। यह समझने के लिए कम्युनिस्ट होना भी जरूरी नहीं है कि सरकारी बैंकों की समस्या किसानों की कर्ज माफी की वजह से नहीं है। 
 
आप कह सकते हैं कि कारोबार अपने आप में जोखिम भरा होता है। बीते एक दशक में कई बाजारों में उतार-चढ़ाव आया जिसका पूर्वानुमान नहीं था। बुनियादी ढांचा क्षेत्र की परियोजनाओं के पूरा होने में लगने वाले समय को भी ठीक तरह से नहीं समझा जा सका। इन सारी दलीलों को समझा जा सकता है, बशर्ते कि अन्य समस्याएं सामने न आ जाएं। घरेलू परियोजनाओं से जुड़े मामलों में दामों में अनावश्यक इजाफे के बचाव में यह दलील सामने आती है कि उनकी लागत सबसे कम थी। लेकिन इससे यह सवाल उठता है कि ऊंची लागत वाले क्या कर रहे थे? क्या वे और अधिक कमाई करना चाहते थे? जिन फर्मों ने पूंजी लागत में फर्जी इजाफा करके राजमार्ग परियोजनाओं के लिए कर्ज लिया उनको भी ऐसे ही सवालों के जवाब देने होंगे। यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि विमानन कंपनियों के मुताबिक हमारे यहां हवाई अड्डïा शुल्क दुनिया में सबसे अधिक है। क्या यह भी बढ़ी हुई परियोजना लागत की वजह से है?
 
अगर हम यह मान लें कि इन क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण निजी कारोबारी घराने विफल रहे तो भविष्य के लिए क्या संकेत मिलते हैं? बुनियादी निवेश के क्षेत्र में इसके असर का भी ध्यान रखना होगा। अगर हमारी राजनीतिक फंडिंग की प्रकृति ऐसी है तो भी हम हमेशा यह दलील नहीं दे सकते कि अगर सरकार या सरकारी क्षेत्र विफल है तो निजी क्षेत्र को काम सौंप दिया जाए। आज किस सरकारी बैंकर में यह साहस है कि वह निजी राजमार्ग परियोजना को कर्ज दे? किसी बिजली परियोजना को दिए गए कर्ज की सुरक्षा की भला क्या गारंटी है? क्या रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक सामरिक साझेदार की भूमिका के लिए आज बोली लगा रहे लोगों पर भरोसा किया जा सकता है कि वे तय समय में विमान, प्रक्षेपास्त्र अथवा टैंक आदि की आपूर्ति कर सकेंगे। या फिर हमें भविष्य में भी ऐसे मामलों में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट ही पढऩे को मिलेंगी?
 
हमें सार्वजनिक क्षेत्र में एयर इंडिया जैसी कहानी के विकल्प तलाशने की जरूरत है और ये विकल्प मौजूद भी हैं। खासकर अगर हम बड़ी परियोजनाओं के लिए निजी कंपनियों का चयन करते समय बाजीगरी करने वाली कंपनियों को किनारे नहीं कर पाते हैं तो सशक्त सार्वजनिक कंपनी खड़ा करने की पुरानी कामयाबी को दोहरा पाना सबसे बड़ी चुनौती है। इन सार्वजनिक कंपनियों ने अपने प्रदर्शन से ऊंचे मानदंड स्थापित किए हैं। एनटीपीसी, दिल्ली मेट्रो, अमूल डेयरी और इसरो जैसे सार्वजनिक संस्थान इसकी मिसाल हैं। अगर हम पहले इस तरह के सशक्त सार्वजनिक संस्थानों को खड़ा करने वाले लोगों की शिनाख्त कर पाए हैं तो निश्चित रूप से हम आज भी ऐसा कर सकते हैं।
Keyword: aviation, विमानन,
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