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विमान वाहक पोत निर्माण की गति तेज करने का वक्त

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  September 14, 2017

यह अच्छी बात है कि डोकलाम में भारत और चीन के बीच गतिरोध आपसी सहमति पर समाप्त हुआ। अगर दोनों देशों के बीच लड़ाई की स्थिति बन जाती तो क्या होता इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। खुलकर कहें तो चीन की तैयारी और सीमा पर उसके हथियारों के सामने हम कमजोर पड़ जाते। हम शायद हिंद महासागर में भी उससे पिछड़ जाते जहां हमें सामरिक बढ़त हासिल है।

 
नौसेना का दूसरा देसी विमान वाहक पोत आईएनएस विशाल तैयार करने का प्रस्ताव लगातार रक्षा सचिव और नौसेना के बीच झूलता रहा। मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि जल्दबाजी में निर्णय लेना सही नहीं होगा क्योंकि विमान वाहक पोत काफी खर्चीला होता है। इसके चलते सेना और वायुसेना की जरूरी खरीद रोकनी पड़ सकती है। विडंबना देखिए कि 31 मार्च को उसने 7,000 करोड़ रुपये की ऐसी पूंजी सरकार को लौटा दी जो वह व्यय नहीं कर पाई। 
 
आईएनएस विशाल हमारी सैन्य शक्ति की जरूरी चीजों में से एक होगा। नौसेना ने कई वर्ष लगाकर अपनी जरूरतें तय की हैं। अमेरिकी नौसेना से गहन चर्चा के बाद भारतीय सैन्य अधिकारी इस नतीजे पर पहुंचे कि हमें कम से कम 65,000 टन क्षमता वाले परमाणु क्षमता संपन्न विमान वाहक की आवश्यकता है। इसमें ऐसी सुविधा भी हो कि ज्यादा भार वहन वाले विमान को जल्दी उड़ाया जा सके। आईएनएस विशाल में यह क्षमता होगी कि वह हिंद महासागर की निगरानी कर सके। 
 
रक्षा मंत्रालय की ढिलाई के बीच नौसेना को आईएनएस विक्रमादित्य से काम चलाना पड़ रहा है। यह 26 मिग-29 विमान ढो सकता है जो अब अविश्वसनीय हो चुके हैं। साथ ही 10 हेलीकॉप्टर भी। जंगी तैयारी के हिसाब से यह बहुत कम है। पहला स्वदेशी विमान वाहक आईएनएस विक्रांत कोचीन शिपयार्ड द्वारा बनाया जा रहा है। उसके निर्माण की गति बहुत धीमी है। वह 2019 तक तैयार हो जाएगा लेकिन वह युद्ध स्तर पर काम करने लायक 2022-23 तक ही होगा। जाहिर सी बात है एक बार ऑर्डर देने के बाद आईएनएस विशाल को बनने में कम से कम 10 साल तो लगेंगे।
 
इसके विपरीत विमान वाहक पोत बनाने का काम देर से शुरू करने के बावजूद चीन काफी आगे निकल गया है। यूक्रेन के एक विमान वाहक पोत को नए सिरे से तैयार करने और इस प्रक्रिया में सीखने के बाद चीन की नौसेना ने अप्रैल में शानडॉन्ग नामक दूसरे पोत पर काम शुरू कर दिया। माना जा रहा है कि यह 2020 तक काम करने लायक हो जाएगा। विश्लेषकों की मानें तो चीन बहुत कम समय में ऐसे 5-6 विमान वाहक पोत तैयार कर लेगा।
 
दरअसल शक्ति संतुलन गड़बड़ा रहा है। विमान वाहक पोत की सफलता में उसके चालक दल की अहम भूमिका होती है। खासतौर पर जो उड़ान संबंधी काम संभालते हैं। इसमें कैटापल्ट (प्रक्षेपक) लॉन्च भी शामिल है जहां अत्यंत कम दूरी में जहाज को तेज गति से उड़ान भरनी होती है। स्काई जंप वाले युद्धपोतों आईएनएस विराट और आईएनएस विक्रमादित्य के आगमन के साथ भारत की कैटापल्ट लॉन्च की क्षमता बहुत हद तक प्रभावित हुई। 
 
यह बहस भी लंबे समय से चली आ रही है कि क्या विमान वाहक पोत वाकई में आधुनिक युद्ध की जरूरत हैं? तमाम अन्य सैन्य दलीलों की तरह इसकी जड़ें भी संसाधनों की लड़ाई में निहित हैं। दुनिया भर में वायुसेनाओं को लगता है कि विमान वाहक पोत उनके क्षेत्र में दखल है। वे अक्सर विमान वाहक पोतों को महंगा तैरता हुआ हवाई क्षेत्र कहती हैं जिसे उनकी नजर में एक ऐंटी शिप मिसाइल या तॉरपीडो की मदद से डुबाया जा सकता है। वायु सेनाओं का दावा है कि तटवर्ती बेस से उडऩे वाले विमान जिन्हें हवा में ईंधन दिया जा सके, कहीं अधिक आसानी से सैकड़ों मील दूर स्थित निशाने पर हमला कर सकते हैं। उनका यह भी कहना है कि विमान वाहक पोतों के बचाव के लिए एक पूरा जंगी बेड़ा उनके साथ होना जरूरी होता है।
 
नौसेना में आंतरिक स्तर पर भी संसाधनों का संघर्ष है। पनडुब्बी कर्मचारियों की ओर से भी विमान वाहक पोतों का विरोध नजर आता है। यहां बहस के केंद्र में समुद्री क्षेत्र का नियंत्रण है। तटीय इलाकों से हवाई सहयोग की दलील में दम नहीं है क्योंकि विमान वाहक पोत समुद्र में कहीं अधिक भीतर तक जाकर कार्रवाई करने में सक्षम होते हैं। परंतु इस दलील में दम है कि तयशुदा मार्गों पर इसे पनडुब्बी के जरिये निशाना बनाया जा सकता है। उनकी दलील यह भी है कि पनडुब्बी के बेड़े का खर्च विमान वाहक पोत से बहुत कम होता है। जबकि दुश्मन को रोकने की उसकी क्षमताएं कमोबेश वैसी ही होती हैं। परंतु वे यह नहीं बताते कि पनडुब्बियां समुद्र पर त्रिआयामी दृष्टि नहीं रख सकतीं। जबकि विमान वाहक पोत का यह मूलभूत काम है। इसके अलावा पनडुब्बियां जब अपनी बैटरी को चार्ज करने या नियंत्रकों से संवाद के सिलसिले में सतह पर आती हैं तो उनके लिए अलग तरह का जोखिम उत्पन्न हो जाता है।
 
चाहे जो भी हो नौसेना विमान वाहक पोत और पनडुब्बियों के बीच चुन रही हो ऐसा भी नहीं है। उसे दोनों क्षेत्रों में अहम उपलब्धियों की आवश्यकता है। उसके ऊपर वैश्विक रूप से साझा विशालकाय अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र के बचाव का दायित्व है। उसे प्राकृतिक आपदाओं के मामले में और हिंद महासागर के बचाव के क्रम में ऐसा करना ही है। यह काम उसके दो तट रेखाओं के मूल काम के अलावा है। उसे न केवल हिंद महासागर क्षेत्र में काम करना है बल्कि जमीनी लड़ाई में समुद्री सहयोग भी करना है। नौसेना के दीर्घकालिक समुद्री क्षमता की योजना में तीन विमान वाहक पोतों और 24 पनडुब्बियों की बात कही गई है। अब वक्त आ गया है कि इनके निर्माण का काम शुरू हो। हमें इस दिशा में तेजी से काम करना होगा। 
Keyword: defiance, रक्षा उपकरण, विमान वाहक पोत,
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