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ट्विटर-फेसबुक के युग में कूटनीति का बदलता रूप

श्याम सरन /  September 14, 2017

कूटनीति को बदलते दौर के हिसाब से खुद को लगातार उन्नत और विकसित करना होगा। अब एक राजनयिक के लिए नेटवर्किंग के कौशल में महारत हासिल करना जरूरी है। बता रहे हैं श्याम सरन

 
पूर्व ब्रिटिश राजनयिक टॉम फ्लेचर ने अपनी पुस्तक 'नेकेड डिप्लोमेसी' में डिजिटल दौर की कूटनीति पर प्रकाश डाला है। फ्लेचर की राय में कूटनीति की शुरुआत पाषाण युग में ही हो गई थी और हमारा वह पूर्वज पहला राजनयिक था जो अपने पड़ोसियों को शिकार करने या भोजन की तलाश में मिलजुलकर काम करने के लिए राजी करने में सफल रहा था। क्या उसके बाद से कुछ नहीं बदला है? भारत डोकलाम को लेकर धमकी भरा अंदाज अपना रहे चीन को जिद छोडऩे और श्यामेन में मिलकर काम करने के लिए राजी करने में सफल रहा है। ऐसा लगता है कि कूटनीति ने वर्तमान में अपेक्षित नतीजे दे दिए हैं। तकनीक में तीव्र प्रगति से हमारी जिंदगी में भी काफी बदलाव आ रहे हैं लेकिन मानवता के समक्ष चुनौती अब भी काफी बुनियादी स्वरूप वाली ही है। हमारे समक्ष यही चुनौती है कि हिंसा और वर्चस्व की पुरातन उत्कंठा को काबू में रखते हुए हम एक व्यक्ति, समुदाय, समाज और देश के तौर पर कैसा बरताव करते हैं? 
 
कूटनीति को आम तौर पर देशों के बीच के रिश्तों के संदर्भ में देखा जाता है लेकिन कभी-कभी रिश्तों को संभालकर रखने में घरेलू स्तर पर भी विदेश से कहीं ज्यादा कूटनीति की जरूरत पड़ जाती है। धरती पर इंसान का वजूद बने रहने तक उसे एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने के गुर सीखने होंगे जिससे कूटनीति की प्रासंगिकता भी बनी रहेगी। इस तरह कूटनीति का मतलब डिजिटल मौत को गले लगाना नहीं है लेकिन कूटनीति के तौर-तरीके बदल जाएंगे।
 
सूचना युग में डिजिटल तकनीक खूब फली-फूली है। अधिक समय नहीं हुआ जब सूचना पर देशों के आधिपत्य, इस तरह की सूचनाओं तक पहुंच को बाधित कर देने की उनकी क्षमता और उससे खिलवाड़ करने की शक्ति से प्राधिकार हासिल होता था। लेकिन वर्तमान में देश गुणवत्तापरक और विश्वसनीय सूचना का तीव्र प्रसार कर पाने की क्षमता होने की स्थिति में ही प्रासंगिक बने रह सकते हैं। गोपनीयता को दी जाने वाली तरजीह की जगह अब पारदर्शिता ने ले ली है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सार्वजनिक पटल पर अद्यतन सूचनाओं की आभासी बौछार की स्थिति पैदा कर दी है। इसने देश के 'आम आदमी' को भी सशक्त किया है। इसके चलते राज्य एवं उसके प्रतिनिधि अभूतपूर्व एवं व्यापक सार्वजनिक समीक्षा की जद में आ गए हैं।
 
परंपरागत कूटनीति में एक परिष्कृत एवं गोपनीय विधा के अभिजनवादी उपक्रम होने के सभी प्रतीक मौजूद हैं। परंपरागत कूटनीति के तहत राजनय की विधा में शिक्षित और परिष्कृत भाषा तथा कूटनीति के औपचारिक तरीकों में दक्ष लोगों को ही देशों के बीच संपर्क साधने का सबसे अच्छा जरिया माना जाता रहा है। डिजिटल युग ने परंपरागत कूटनीति को इस कदर प्रभावित किया है कि राजनयिक अब कम औपचारिक हो रहे हैं और उनसे संपर्क साधना भी सुगम हो गया है। इससे राजनयिक अपने देश के भीतर और बाहर दोनों ही जगहों पर अब आम लोगों की पहुंच में आ गए हैं। इस तरह 'राज-नय का मोहल्ला-नय' के साथ जुड़ाव होने लगा है। आधुनिक कूटनीति की मांग है कि वर्गीकृत ढांचों के जरिये ऊध्र्वाधर के बजाय क्षैतिज चैनलों से नेटवर्किंग की कला में भी महारत हासिल हो। यह सार्वजनिक पहुंच जरूरी गोपनीयता के साथ-साथ चलनी चाहिए। असल में संवेदनशील परिस्थितियों में पारदर्शिता अक्सर मामला बिगाडऩे का काम करती है। इसमें कोई शक नहीं है कि पारदर्शिता का सार्वजनिक मंचों एवं मीडिया के साथ समावेश अब पहले की तुलना में अधिक अहम हो गया है और यह असरदार कूटनीति के सामने चुनौती भी बनकर उभरा है।
 
डिजिटल युग में कूटनीति संचार की गति पर अधिमूल्य लगाती है। फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म किसी सूचना एवं उससे संबंधित विचारों के त्वरित प्रसार को संभव बना देते हैं। राजनयिक विश्वसनीय सूचना प्राप्त करने और अपने आकलन को सार्वजनिक मंच पर ले जाने के लिए इन साधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए ताकि गलत धारणा और गलत जानकारी को न्यूनतम किया जा सके। विदेश मंत्रालय भारत सरकार का वह पहला मंत्रालय था जिसने सोशल मीडिया के इन माध्यमों का इस्तेमाल शुरू किया। इस तरह विदेश मंत्रालय ने कूटनीति को डिजिटल युग के अनुरूप ढालने में अग्रदूत की भूमिका निभाई है। घटनाओं पर तीव्र प्रतिक्रिया देने और सूचना वक्र पर दूसरों से आगे रहने की यही काबिलियत कूटनीति के एक बेहद अहम हिस्से को कमतर कर सकती है। राज्य को किसी खास स्थिति में पहुंचने के लिए राजी करने के पहले मंत्रणा और मीमांसा करना किसी भी राजनयिक की मूल जिम्मेदारी होती है। ऐसे में जब दो देशों के बीच तनाव की स्थिति हो तो तत्काल और सीधी प्रतिक्रिया देना जोखिम-भरा काम हो सकता है। 
 
दूसरी तरफ अगर किसी खास स्थिति में प्रतिक्रिया देने में देर हो गई तो भी जोखिम बढ़ सकता है क्योंकि मौजूदा दौर में घटनाएं पलक झपकते ही घट जाती हैं। जवाब भी आसान नहीं होते हैं। इन दिनों देशों के प्रमुख भी ट्विटर पर मौजूद हैं और किसी घटना पर व्यक्त उनके विचार बहुत जल्द फैल जाते हैं। आज नेता अक्सर एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। विश्वास कीजिए, कभी-कभी नेताओं की व्यक्तिगत कूटनीति राजनयिकों के वार्तालाप से कहीं अधिक ठोस नतीजे देने में सफल रहती है। लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि सभी राजनेता राजनय के मर्मज्ञ नहीं हैं और न ही वे विचार-संप्रेषण में माहिर होते हैं। इसलिए इस व्यक्तिगत कूटनीति के बड़े जोखिम भी होते हैं।
 
डिजिटल युग के पहले राजनयिकों को अपने प्रतिनिधि देश से कूटनीति का प्राधिकार मिलता था। लेकिन डिजिटल युग में राज्य का ही प्राधिकार कम हुआ है लिहाजा राजनयिकों को अब अपनी सरकार के साथ अपने देश की जनता का भी प्रतिनिधित्व करना होता है। एक राजनयिक को मेजबान देश की सरकार के साथ वहां के लोगों, नागरिक समाज, मीडिया और उद्योग एवं कारोबारी जगत से भी संवाद रखना चाहिए। राजनयिक का दायरा काफी व्यापक हो गया है और उसके लिए एक साथ कई कार्यों को अंजाम देना अपरिहार्य हो गया है। दरअसल डिजिटल दौर में गैर-सरकारी समूहों का प्रभाव भी बढ़ गया है। वे सीमा-पार भी अपना नेटवर्क कायम करने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में एक राजनयिक के लिए नेटवर्किंग के कौशल में महारत हासिल करना जरूरी है। वह धारणा पुरानी पड़ चुकी है कि एक राजनयिक कूटनीतिक भाषा वाले खत लिखने या कूटनीतिक संवादों के जरिये दो देशों के रिश्तों की दिशा तय करता है। वर्तमान में राजनयिकों को नेटवर्क के नाजुक अवयव के तौर पर खुद को स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस नेटवर्क में अब सरकारें सर्वाधिक अहम और प्रभावी अवयव नहीं रह गई हैं।
 
कूटनीति को बदलते दौर के हिसाब से खुद को लगातार उन्नत और विकसित करना होगा। प्रतिस्पद्र्धी देशों और नेटवर्कों की जटिल दुनिया में दो देशों के बीच संघर्ष के खतरे काफी बढ़ गए हैं। कई बार सोशल मीडिया भी अंतर-देशीय मतभेदों को उभारने का काम करता है। कूटनीति धुंधले इलाकों में ही सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम करती है और जब भी मुद्दों को श्वेत-श्याम रूप में पेश किया जाने लगता है तो उसका असर घट जाता है। डिजिटल दौर में कूटनीति के सामने यही चुनौती है कि तनाव पैदा करने की क्षमता रखने वाले धुंधले इलाकों की शिनाख्त कर उनका हल निकाला जाए। सोशल मीडिया में देश-विदेश में अक्सर सुनाई देने वाली अप्रिय ध्वनियों को शांत करने की जरूरत है ताकि शोर के बजाय हम एक-दूसरे की बातों को सुन सकें।
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ अध्येता हैं। उनकी पुस्तक 'हाऊ इंडिया सीज द वल्र्ड' हाल ही में प्रकाशित हुई है)
Keyword: social media, twitter, facebook, politics,,
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