बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रवासियों के साथ विदेशों में पंख फैलाती हिंदी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 17, 2017 10:57 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम खबर

प्रवासियों के साथ विदेशों में पंख फैलाती हिंदी

दिल प्रकाश /  09 13, 2017

हिंदी दिवस

भारतीय मूल के लोग पूरी दुनिया में फैले हैं। वे अपने साथ अपनी संस्कृति और भाषा को भी दुनिया के कोने-कोने में ले गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक 30 से अधिक देशों के करीब 100 विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्यापन केंद्र खुले हैं और सैकड़ों विदेशी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। विदेशों में हिंदी में पुरवाई सहित कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन और मौलिक लेखन हो रहा है। मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी और त्रिनिडाड जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों की अच्छी-खासी संख्या है और इसी वजह से वहां हिंदी के प्रति लोगों में प्रेम हैं। इसके अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और कई यूरोपीय देशों में भी हिंदी बोलने वालों की कमी नहीं है।

मॉरीशस में हिंदी एक अहम भाषा है और वहां इस भाषा में कई पत्र-पत्रिकाओं और साहित्य का प्रकाशन होता है। मॉरीशस में भारतीय 19वीं शताब्दी में बंधुआ मजदूरों के रूप में गए थे। इनमें से अधिकांश बिहार और उत्तर प्रदेश के थे। उन्होंने विकट परिस्थितियों के बावजूद अपनी संस्कृति और भाषा को बरकरार रखा। धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के उदय होने से मॉरीशस में हिंदी का व्यापक विकास हुआ। आज वहां वसंत, रिमझिम, पंकज, आक्रोश, इन्द्रधनुष, जनवाणी एवं आर्योदय जैसी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है। मॉरीशस में साल 2001 में हिंदी सचिवालय की स्थापना की गई थी।

इसी तरह दक्षिण प्रशांत महासागरीय देश फिजी की आबादी में 44 फीसदी भारतीय हैं। गिरमिटिया मजदूर के तौर पर 19वीं सदी में वहां पहुंचे थे। प्रवासी भारतीयों ने अपनी मेहनत से न सिर्फ इस देश को आबाद किया, बल्कि वहां हिंदी की ज्योति भी जलाए रखी। वहां नियमित रूप से हिंदी में गोष्ठिïयां, सम्मेलन और प्रतियोगिताएं आयोजित होती रहती हैं। फिजी के संविधान में हिंदी को मान्यता दी गई है और वहां सरकारी कामकाज, अदालतों और संसद में इस भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहां पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है। 1957 में गठित हिंदी साहित्य समिति भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार को बढ़ावा देती है।

ब्रिटेन और अमेरिका में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय रहते हैं। वहां कई ऐसी संस्थाएं हैं जो हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दे रही हैं। ब्रिटेन के लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिंदी पठन-पाठन की व्यवस्था है। वहां से प्रवासिनी, अमरदीप तथा भारत भवन जैसी कई पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। इसके अलावा बीबीसी से नियमित रूप से हिंदी कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। इसी तरह अमेरिका में 30 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई होती है। इसी प्रकार अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं भी हिंदी में पाठ्यक्रम आयोजित करती हैं।

कैरेबियाई देश त्रिनिडाड ऐंड टोबेगो में भारतीय मूल के लोगों की आबादी करीब 45 फीसदी है। वहां वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय में हिंदी पीठ की स्थापना की गई है। गुयाना में भी भारतीयों की तादाद आधी से अधिक है और वहां के विश्वविद्यालयों में बीए स्तर पर हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था है। इसी तरह यूरोपीय देशों - फ्रांस, इटली, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नॉर्वे, डेनमार्क तथा स्विट्जरलैंड, जर्मनी, रोमानिया, बुल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में हिंदी के पठन-पाठन की व्यवस्था की गई है। पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका में भी हिंदी बहुत लोकप्रिय है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से हिंदी में कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। श्रीलंका में भारत से आई बच्चों की कई पत्रिकाएं बहुत लोकप्रिय हैं। श्रीलंका के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय रहते हैं। वहां कई ऐसे एफएम चैनल हैं जिन पर दिनभर हिंदी फिल्मी गाने बजते रहते हैं। खाड़ी देशों से हिंदी की कुछ इंटरनेट पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती हैं।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर देवेंद्र चौबे का कहना है कि जहां तक विदेश में हिंदी का सवाल है, पिछले दो तीन दशकों में स्थिति बदली है। खासकर, 1990 के बाद जब से आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रियाएं शुरू हुई, तब से कम से कम तीन क्षेत्रों में विदेशी लोगों का ध्यान हिंदी की तरफ गया है। पहला यह है कि आर्थिक और उत्पादन क्षेत्र से सम्बद्ध कंपनियों का ध्यान इस तरफ गया कि आबादी के लिहाज से भारत एक विशाल बाजार है। इसलिए ऐसे लोगों की जरूरत है, जिन्हें हिंदी आती हो और वे भारतीय बाजार में कार्य कर सकें। जापान, कोरिया और चीन आदि देशों से काफी बड़ी संख्या में लोग आए। उन्होंने हिंदी की पढ़ाई की और वापस लौटकर पुन: भारत में मौजूद कंपनियों में काम करने आए।

दूसरी बात यह हुई कि पहले हिंदी की पढ़ाई विदेश में रहने वाले लोग सिर्फ एक विदेशी भाषा की जानकारी के रूप में करते थे। संस्कृत का ज्ञान और अध्यात्म के रूप में। लेकिन विदेश में रहने वाले लोगों को लगा की आधुनिक भारत की सबसे बड़ी भाषा हिंदी है और इसमें ज्ञान का भी सृजन हो रहा है। इसलिए विद्वानों ने हिंदी में मौजूद स्रोतों के आधार पर आधुनिक भारत को समझने का प्रयास किया। मेरी जानकारी में अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य यूरोपीय देशों के विद्वानों ने हिंदी में मौजूद स्रोतों के आधार पर किताबें लिखीं। फ्रांसिस्का ओरिसिनी आदि कई ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने हिंदी स्रोतों के आधार पर लेखन कर हिंदी के विदेशी विद्वान के रूप में अपना दबदबा बनाया।

चौबे ने कहा कि तीसरी बात यह हुई कि इधर ऐसे विदेशी विद्वानों की पीढ़ी उभर आई है जो हिंदी में सृजनात्मक लेखन कर रहे हैं। इनमें भारतीय मूल के लोग भी है और विदेशी मूल के भी। ये लोग सृजनात्मक लेखन के आधार पर विदेश में बैठकर हिंदी और भारत को समृद्ध कर रहे हैं। मॉरीशस के अभिमन्यु अनंत, रामदेव धुरंधर, बेणी माधव, राम खेलावन, राज हीरामन सहित ब्रिटेन और अमेरिका में रहने वाले तेजेंद्र शर्मा, जापान के तोमिओ मिजकामी आदि प्रमुख हैं।

दूसरी ओर हिंदी लेखक विमल कुमार का कहना है कि फिल्मों ने विदेशों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा बीबीसी और जर्मन रेडियो जैसी विदेशी प्रसारण सेवाओं का भी बहुत योगदान रहा है। हिंदी के कई विद्वान विदेशों में जाकर अध्यापन करते हैं और वहीं बस गए हैं। यह विदेशों में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण है। विदेशों में भी हिंदी में मौलिक लेखन हो रहा है। हिंदी को लेकर विदेशों में कई सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं जिनमें हिंदी के विद्वानों को पुरस्कृत किया जाता है। अलबत्ता विदेशी हिंदी लेखकों की यह शिकायत रहती है कि उन्हें मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जाता है। कुमार ने कहा कि विदेशों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए वहां हिंदी के लेखकों की जयंती मनाई जानी चाहिए और हिंदी पुस्तकों के विदेशी भाषा में अनुवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

Keyword: हिंदी दिवस, भारतीय मूल, संस्कृति, भाषा, अध्यापन, मॉरीशस, प्रवासी भारतीय,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मूडीज के बाद दूसरी एजेंसियां भी बढ़ाएगी भारत की रेटिंग?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.