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तकनीक के सोपान पर हिंदी के बढ़ते कदम

राजीव शर्मा /  09 13, 2017

हिंदी दिवस : ई-बुक में ढलती-उभरती हिंदी

 हिंदी में व्यापक संभावना को ध्यान में रखते हुए कई जाने-माने प्रकाशक अपनी बहुत-सी किताबों के ई-संस्करण ले आए हैं और कुछ लाने की तैयारी में हैं। वैसे, ई-बुक प्रतिस्पर्धा नहीं, विकल्प पेश कर रही हैं

मानव सभ्यता के विकास में तकनीक के बढ़ते कदमों की छाप पग-पग पर दिखती है। किताबें भी इससे अछूती नहीं हैं। पाषाण-युग की पथरीली राहों पर चलकर ये आधुनिक मानव को 'सिलिकन रूट' पर ले आई हैं। शिला-लेख और ताम्र-पत्र अब माइक्रोचिप में दर्ज होकर 'ई-बुक' में तब्दील हो चुके हैं। कंप्यूटर, टैबलेट, फैबलेट और मोबाइल फोन पर देखी, पढ़ी और सुनी जाने वाली इन ई-किताबों के पन्ने 'बाइनरी कोड' में खुल रहे हैं। कंप्यूटर भले ही अभी तलक हर खासोआम तक न पहुंच पाया हो, लेकिन मोबाइल फोन ने यह हद पार कर दी है। यही वजह है कि ज्यों-ज्यों मोबाइल फोन की पहुंच बढ़ रही है, उसी के साथ बढ़ रही है इन किताबों की पाठक संख्या। कुछ समय पहले तक केवल अंग्रेजी तक सीमित रहने वाली ई-बुक ने अब हिंदी भाषा-भाषियों को भी अपनी जद में लेना शुरू कर दिया है। हिंदी की इस व्यापक क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही अब हिंदी प्रकाशक ई-बुक से कोई परहेज नहीं कर रहे हैं। हिंदी के कई जाने-माने प्रकाशक अपनी बहुत-सी किताबों के ई-संस्करण ले आए हैं और कुछ लाने की तैयारी में हैं।

देश में हिंदी के बड़े प्रकाशकों में शुमार प्रभात प्रकाशन के निदेशक डॉ. पीयूष कुमार कहते हैं कि आज के दौर में पाठक ई-बुक की मांग करते हैं, ई-बुक के बिना काम नहीं चलेगा। हमने पहले ही काफी देरी से ई-बुक की शुरुआत की है लेकिन अब हमारा इस ओर काफी ध्यान है। आजकल पाठक सब कुछ बहुत जल्दी चाहते हैं। अगर कोई किताब आज प्रकाशित हुई है तो वे चाहते हैं कि अगले दिन ही उन्हें वह किताब मिल जाए। आने वाला समय इंटरनेट-तकनीक का ही है अगर हम उसके साथ नहीं चलेंगे तो टिक नहीं पाएंगे।

पीयूष बताते हैं कि अब तक हम हिंदी की लगभग 750 किताबें ई-बुक के रूप में ला चुके हैं। ये किताबें ईपब फॉरमैट में एमेजॉन किंडल, गूगल पर उपलब्ध हैं। हमारी ई-बुक सामान्य किताब से करीब 30 प्रतिशत कम मूल्य पर मिलती हैं। अगर सामान्य किताब 100 रुपये मूल्य की है तो उसकी ई-बुक का मूल्य 70 रुपये रहता है। हमारी योजना है कि इस साल 31 दिसंबर तक 3,000 किताबें ई-बुक के रूप में आ जाएं।

फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के महाप्रबंधक प्रदीप छाबड़ा को पुस्तक प्रकाशन क्षेत्र में 27 साल का अनुभव है। वे विभिन्न सरकारी विभागों में सेवाएं दे चुके हैं तथा नैशनल बुक ट्रस्ट की ओर से चार साल विश्व पुस्तक मेले के आयोजन में शामिल रहे हैं। इनके अनुसार, ई-बुक के बारे में अगर अमेरिका का उदाहरण लें तो पहले वहां ई-बुक की चार प्रतिशत हिस्सेदारी थी लेकिन अब वह घटकर दो प्रतिशत पर आ गई है। ई-बुक एक विकल्प है लेकिन यह कागज (सामान्य पुस्तक) को पूरी तरह से हटाकर उनकी जगह नहीं ले सकती है। यह इसलिए एक विकल्प बनी कि जहां आप किताब नहीं पढ़ सकते, वहां ई-बुक से पढ़ा जाए। छाबड़ा कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि ई-बुक अन्य किताबों को हटा देंगी। भविष्य में भी असली किताबें तो रहेंगी ही। अगर विस्तृत रूप से देखा जाए तो इससे पाठकों की संख्या बढ़ी ही है, क्योंकि अब ई-बुक के रूप में पाठकों को एक अच्छा विकल्प मिला है। एेसा ही पत्रिकाओं में भी हो रहा है। दुनिया काफी तेजी से चल रही है, बदल रही है। ऐसे में हमें भी दुनिया के साथ चलने के लिए तेज होना ही पड़ेगा।

संदीप देव पिछले कई वर्षों से डिजिटल मीडिया-प्रकाशन से जुड़े हुए हैं और हैरी पॉटर शृंखला का प्रकाशन करने वाले प्रकाशक ब्लूम्सबरी की हिंदी में पहली मूल पुस्तक के लेखक भी हैं। वे बताते हैं कि पुस्तक प्रकाशन क्षेत्र में ई-बुक की फिलहाल पांच प्रतिशत ही भागीदारी है। आजकल लोग ई-बुक पढ़ने की अपेक्षा उसका स्टोर ज्यादा कर रहे हैं। उनमें ई-बुक डाउनलोड करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एेसे भी कई उदाहरण है जिनमें देखा गया है कि अगर ई-बुक को ज्यादा पसंद किया गया है तो प्रकाशक को पाठकों की मांग और अपने मुनाफे के लिए उसकी सामान्य किताब का भी प्रकाशन करना पड़ा है। यानी ई-बुक और सामान्य बुक एक-दूसरे को प्रोत्साहन दे रही हैं। इनमें प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि ये एक-दूसरे का विकल्प उपलब्ध करा रही हैं। कई जगह ई-बुक ज्यादा लाभकारी दिखती हैं तो कई जगह सामान्य किताबें। उदाहरण के लिए शोध-अध्ययन करने वाले अधिकांश लोग ई-बुक का तो इस्तेमाल करते ही हैं, साथ ही साथ उन्हें अपने उपयोग के लिए उसका प्रिंटआउट भी लेना पड़ता है क्योंकि सभी ई-बुक में टेक्स्ट के नोट बनाने, अंडरलाइन या हाईलाइट करने का विकल्प नहीं होता। दूसरी ओर, एेसे भी कई उदाहरण हैं जिनमें पुरानी किताबों को ई-बुकके रूप में संरक्षित किया जा रहा है।

ई-बुक के भविष्य के बारे में संदीप कहते हैं कि अभी भले ही इनका चलन बहुत ज्यादा न हो लेकिन भविष्य में ई-बुक का और विकास होगा। जब से किंडल ऐंड्रॉयड पर अपनी एेप लाया है, तब से किंडल पर उपलब्ध ई-बुक मोबाइल पर भी उपलब्ध होने लगी हैं। महंगा होने के कारण किंडल डिवाइस हर कोई नहीं खरीद सकता था और मोबाइल के साथ-साथ किंडल को भी साथ रखने में पाठकों को दिक्कत अनुभव होती थी। लेकिन अब मोबाइल पर ही किंडल की ई-बुक उपलब्ध होने से इसकी पाठक संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन एेसा भी नहीं है कि लोग सामान्य किताबों को पढऩा छोड़ देंगे। आज भी रामचरितमानस और गीता की आठ करोड़ प्रतियां बिक रही हैं। इसलिए ई-बुक के साथ-साथ सामान्य किताबों की भी उपयोगिता बनी रहेगी।

साहित्य अकादमी के बिक्री प्रबंधक राजेश कुमार गुप्ता बताते हैं, 'हमारे यहां 24 भाषाओं में किताबें छपती हैं और सबसे ज्यादा मांग हिंदी में रहती है। हिंदी में सबसे ज्यादा किताबें  बिक रही हैं। ई-बुक पर आजकल काफी ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की ओर से भी इस पर काफी जोर है। लोग इन्हें अपना भी रहे हैं, लेकिन अभी इनका ज्यादा प्रचलन नहीं है, क्योंकि अभी देश में ई-साक्षरता की दर कम ही है। इसलिए ई-बुक की बहुत ज्यादा मांग नहीं है। हालांकि आगे इसके लिए भी योजना है और मंत्रालय की तरफ से भी समय-समय पर इस संबंध में निर्देश दिए जाते हैं। ई-बुक पर भी काम चल रहा है। आने वाले समय में ई-बुक भी आएंगी।'

ई-बुक और सामान्य किताबों के प्रति पाठकों की रुचि के संबंध में गुप्ता कहते हैं कि पाठक ई-बुक से उतना नहीं जुड़ पाता है, जितना कि असली किताब से जुड़ता है। किताब हर समय पाठक के हाथ में रहती है, तो उसका लगाव बना रहता है, जबकि ई-बुक एक प्रकार से फिल्म देखने की तरह है। फिल्म देखी और कुछ समय बाद उसे भूल गए। जबकि असली किताब हमारे मन में अंकित हो जाती हैं। इसलिए उसका प्रभाव ज्यादा समय तक रहता है। फिर भी, भविष्य में इनके प्रति रुझान बढऩे की संभावना तो है ही। ई-बुक की अपनी उपयोगिता है।

उपकार प्रकाशन के क्षेत्रीय बिक्री अधिकारी मोहिंद्र का कहना है कि पहले की तुलना में किताबों की मांग में कमी आई है। ऑनलाइन की वजह से काफी फर्क पड़ा है। हमारी मासिक पत्रिका प्रतियोगिता दर्पण ई-बुक में उपलब्ध है। प्रतियोगिता दर्पण के अतिरिक्त अंक भी ई-बुक में उपलब्ध हैं। इसी तरह से टीजीटी, पीजीटी और नेट शृंखला भी ई-बुक में उपलब्ध हैं। जब से कंप्यूटराइजेशन और डिजिटलाइजेशन का रुझान बढ़ा है, ई-बुक निकालने की जरूरत पडऩे लगी है। वैसे, ई-बुक की तुलना में अभी भी ऑफलाइन किताबों की मांग ही ज्यादा है और हमें लगता है कि भविष्य में भी ई-बुक के मुकाबले ऑफलाइन किताबों की मांग ही ज्यादा रहेगी।

डायमंड बुक्स के चेयरमैन नरेंद्र कुमार वर्मा का कहना है कि लोग ई-बुक को डाउनलोड तो कर लेते हैं लेकिन उसे पढ़ते नहीं हैं। इससे पठन-पाठन की रुचि का विकास नहीं होता है इसके के लिए यह जरूरी है कि हम किसी पृष्ठ पर रुकना सीखें। इसके पाठकों में ठहरने की प्रवृत्ति नहीं आ रही है। लोग जल्दी-जल्दी पेज पलटते रहते हैं लेकिन पढ़ते नहीं हैं। 200 पृष्ठों की एक किताब को पढ़ने में करीब 12 घंटे का समय लगता है लेकिन आज की मोबाइल-इंटरनेट वाली नई पीढ़ी के पास इतना समय नहीं होता। अगर आपको ज्ञान चाहिए तो उसके लिए आपको पूरी तन्मयता के साथ पढ़ना और समझना होगा।

वर्मा के अनुसार, 'इंटरनेट की वजह से हिंदी का विस्तार हुआ है। इससे से कोई नुकसान नहीं होगा। इसका फायदा यह है कि अगर कोई विदेश में है और गीता, वेद या पुराण पढऩा चाहता है तो इंटरनेट की मदद से या ई-बुक के रूप में गीता पढ़ सकता है। किताब खरीदने में किराया-भाड़ा या परिवहन लागत ही बहुत ज्यादा आ जाती है लेकिन इंटरनेट पर 100 रुपये की किताब 100 रुपये में ही मिल जाती है। इससे हमारी सभ्यता-संस्कृति का प्रचार हुआ है। हमारे यहां ई-बुक में सबसे ज्यादा मांग गीता की होती है। इसके बाद शायरी, कविता, गजल, सेहत या काल्पनिक विषय-वस्तु वाली की किताबों की मांग होती है। ई-बुक के दाम भी कम होते हैं। अगर कोई किताब 150 रुपये की है तो ई-बुक के रूप में वह 100 रुपये की होगी। हमारी ई-बुक ईपब फॉरमैट में होती हैं। हम 14 प्लेटफॉर्म पर ई-बुक उपलब्ध करा रहे हैं।

'सामयिक प्रकाशन के प्रबंध निदेशक महेश भारद्वाज कहते हैं कि हमारे यहां ई-बुक की तो एक तरह से अभी शुरुआत ही है। भविष्य में क्या प्रवृत्ति रहेगी, यह तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगा लेकिन वर्तमान में पिं्रट संस्करण का ही आधिपत्य है। इसकी तकरीबन 95-96 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

ई-बुक की राह में आने वाली तकनीकी बाधाएं

सामान्य किताब को ई-बुक के रूप में परिवर्तित करने में कई प्रकार की दिक्कतें पेश आती हैं, खासतौर पर हिंदी की ई-बुक तैयार करने में। तकनीकी जानकार बताते हैं कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों पर हिंदी की ई-बुक बनाने में सूत्र या विशेष चिह्नों को लगाने में परेशानी आती है। चूंकि ई-बुक के लिए यूनिकोड फोंट की जरूरत पड़ती है और पुरानी परंपरागत पुस्तकें सामान्य फोंट में बनी होती हैं इसलिए उन्हें ई-बुक के रूप में तब्दील करने के लिए उसकी पाठ्य सामग्री को यूनिकोड में परिवर्तित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में कुछ विशेष चिह्न या वर्तनी में बदलाव की आशंका रहती है। कई डिवाइस एेसे होते हैं जिनमें सीमित फॉन्ट रहते हैं इसलिए हिंदी की ई-बुक में इस पहलू पर भी ध्यान देना पड़ता है और फॉन्ट भी इनबिल्ट करने पड़ जाते हैं ताकि उसे सपोर्ट करने वाले हर डिवाइस में वह सही ढंग से पाठक के सामने आए और कोई त्रुटि न दिखाई दे।

ई-बुक तैयार करने में एक समस्या डिवाइस या हार्डवेयर की विभिन्नता को लेकर भी रहती है। कोई पाठक उन्हें कंप्यूटर पर खोलकर पढऩा चाहता है, तो कोई अपने मोबाइल, टैबलेट या किंडल जैसे किसी अन्य डिवाइस पर। इसलिए ई-बुक तैयार करने में इस बात को ध्यान में रखकर चलना पड़ता है कि वह चार इंच वाले डिस्प्ले पर भी ठीक दिखाई दे और आठ या 21 इंच वाले डिस्प्ले पर भी।

उपन्यास जैसी ई-पुस्तकें तो सामान्य टैक्स्ट वाली होती हैं इसलिए उनकी ई-बुक बनाने में ज्यादा परेशानी नहीं होती, लेकिन जिन पुस्तकों में चित्र, ग्राफ आदि का काफी प्रयोग रहता है, उन्हें सभी डिवाइस के अनुरूप व्यवस्थित करने में खासी मशक्कत करनी पड़ती है।

प्रश्नोत्तर वाली किताबों को ई-बुक के रूप में तैयार करने में भी काफी तकनीकी पेचीदगी रहती है क्योंकि उन्हें इस तरह से तैयार किया जाता है कि हर प्रश्न का सही उत्तर पाठकों को आसानी से मिल जाए। इसके लिए इनमें प्रश्नों के आस-पास ही कोई लिंक या हाइपरलिंक देना पड़ता है।

ई-बुक में आइकॉन, मेटा डिस्क्रिप्शन आदि का भी ठीक से प्रयोग करना होता है। इसी प्रकार विंडोज, लाइनक्स, आईओएस, ऐंड्रॉयड जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए सामान्यत: ई-बुक के अलग-अलग फॉरमैट की जरूर रहती है। इसी तरह इनके प्रोग्राम या ऐप भी अलग-अलग होते हैं।
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