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सरकारी बैंकों में सुधार, किस पर हो सुदर्शन चक्र का वार?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 13, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले सप्ताह देश के सरकारी बैंकों के वित्तीय संकट से निपटने की जरूरत बताते हुए महाभारत को उद्धृत किया। मुंबई में 7 सितंबर को आर के तलवार स्मृति व्याख्यान के समापन अवसर पर उन्होंने कहा, 'इंद्रधनुष योजना अच्छी थी लेकिन भारत में बदलाव के लिए हमें कहीं अधिक ताकतवर योजना बनानी होगी। हमें सप्ताह नहीं लेकिन कुछ महीनों में, मौजूदा स्वामित्व ढांचे के अधीन सरकारी बैंकों में सुधार के लिए सुदर्शन चक्र चाहिए।'
इस दौरान उन्होंने दो अहम मुद्दे उठाए। पहला, उन्होंने यह साफ कर दिया कि सन 2015 में धूमधाम से शुरू की गई इंद्रधनुष योजना कोई खास वांछित परिणाम हासिल नहीं कर सकी है। अपनी बात के दूसरे हिस्से में उन्होंने लेकिन का प्रयोग किया। इससे उनका रुख स्पष्ट होता है। वह चाहते हैं कि अब दूसरी दिशा में तेजी से कार्रवाई की जाए।
सुदर्शन चक्र का जिक्र बताता है कि सरकार को कई अन्य विकल्पों पर काम करने की जरूरत है। हालांकि इसके कई अन्य निहितार्थ भी हैं। एक अन्य स्तंभकार टीसीए श्रीनिवास-राघवन ने पूछा है कि सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल होगा तो शिशुपाल कौन होगा? याद रखें महाभारत में कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के जरिये ही चेदि के शासक शिशुपाल का वध किया था। शिशुपाल के 100 अपराध माफ किए गए थे, 101वें पर वध किया गया।
सवाल यह भी उठता है कि आखिर वह 101वीं गलती कौन सी होगी या अतीत के कौन से अपराध रहे जिनके चलते चक्र का इस्तेमाल होगा? क्या बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी उन पापों में शामिल होगा? या फिर कमजोर योजनाओं को बिना मानकों का पालन किए ऋण देना या फिर सरकार द्वारा सरकारी बैंकों की मदद से सामाजिक लक्ष्य हासिल करना या बिना उनका प्रदर्शन सुधारे उनमें पूंजी डालना इसमें शामिल होगा।
सबसे अहम प्रश्न होगा: शिशुपाल कौन? बैंक, सरकार या कोई और? जाहिर सी बात है देश का केंद्रीय बैंक देश को बहस के मुद्दे मुहैया करा रहा है। एक साल पहले अंधों में काना राजा की कहावत की चर्चा थी। आने वाले कुछ समय तक सुदर्शन चक्र बहस के केंद्र में रहेगा।
सरकार विरल आचार्य द्वारा उठाए गए दो मुद्दों की अनदेखी नहीं कर सकती। इंद्रधनुष में चार अहम घटक थे: सरकारी बैंकों के कामकाज की निगरानी और उनको सरकारी हस्तक्षेप से दूर रखने के लिए बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो की स्थापना, इन बैंकों में निजी पूंजी निवेश कर उनकी पूंजी पर्याप्तता में सुधार, निजी क्षेत्र की प्रतिभाओं को सरकारी बैंकों के साथ जोडऩा और बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार के लिए नई व्यवस्था करना।
बीते दो सालों में इस दिशा में प्रगति हुई है लेकिन वह अपेक्षित नहीं है। बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना जल्दी हो गई और उसने निजी क्षेत्र के कुछ प्रबंधकों को सरकारी बैंकों में नियुक्त कर काम शुरू भी किया। परंतु कुछ समय बाद यह कवायद रुक गई और इसके अपेक्षित नतीजे भी नहीं निकले। बैंक प्रबंधन को सरकारी हस्तक्षेप से बचाना अहम काम था लेकिन अब तक इस दिशा में कोई खास काम नहीं हो सका है।
नई पूंजी डाली गई है लेकिन इसके लिए प्रदर्शन को मानक नहीं बनाया गया। इसी वजह से अच्छे बुरे सभी बैंकों को समान तरीके से निपटाया गया। दिवालिया कानून आने के बाद विधिक औपचारिकताएं भी मजबूत हुई हैं। आरबीआई ऐक्ट के अधीन भी अब उसे यह अधिकार है कि वह इन बैंकों की फंसी हुई परिसंपत्ति को चिह्नित कर सुधार का दबाव बनाए। पहले दिवालिया के कई मामलों की सुनवाई राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट में हो रही है।
परंतु डॉ. आचार्य पुनर्पूंजीकरण और सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी कम करने की समय सीमा तय करके और अधिक कदमों की मांग कर रहे हैं। हाल के दिनों में आरबीआई के किसी वरिष्ठ अधिकारी ने सरकारी बैंकों की समस्याओं पर इतनी स्पष्ट बात नहीं की है।
सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी कम करने के मामले में भी सरकार का प्रदर्शन कमजोर रहा है। फरवरी 2016 में सरकार ने घोषणा की कि वह आईडीबीआई बैंक का निजीकरण करेगी लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं हो सका है। जीएसटी के बाद कर राजस्व से जुड़ी अनिश्चितता ने सरकारी वित्त पर दबाव बनाया है जिससे हालात और जटिल हो गए हैं। इसके अलावा आरबीआई लाभांश, स्पेक्ट्रम नीलामी और विनिवेश तथा पूंजी निवेश की बढ़ती मांग के बीच गैर कर राजस्व की हालत भी बुरी रहने का अनुमान है। आचार्य के सुझावों पर अमल के लिए अतिरिक्त संसाधन कहां से आएंगे। उनका सुझाव है कि देश के जीडीपी के दो फीसदी के बराबर राशि पुनर्पूंजीकरण के लिए चाहिए।
सरकार इस समस्या को बढऩे भी नहीं देना चाहती। सरकार और आरबीआई मिलकर जिस तरह फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहे हैं, वही प्रक्रिया पुनर्पूंजीकरण में भी अपनानी चाहिए। सरकारी बैंकों पर यह दबाव क्यों नहीं बनाया जाता कि वे अपने बेहतर वित्तीय स्थिति वाले अनुषंगी बैंकों की बिक्री करें और उस पैसे से प्रवर्तक बैंक में पूंजी डालें।
इसी प्रकार सरकार इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 33 फीसदी करने पर विचार कर सकती है। सन 2000 में वाजपेयी सरकार ने सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी घटाकर 33 फीसदी करने की बात कही थी। इस दौरान उनकी प्रकृति में कोई बदलाव नहीं करने की बात भी कही गई थी। यानी उनकी हिस्सेदारी व्यापक तौर पर लोगों के बीच ही बांटी जानी थी। उस प्रस्ताव को राजनीतिक प्रतिरोध के चलते खारिज कर दिया गया। 17 वर्ष बाद राजनीतिक माहौल बदल गया है और मौजूदा सरकार के मन में निजीकरण को लेकर कोई आशंका नहीं नजर आ रही। एयर इंडिया के निजीकरण का उसका फैसला तो यही बताता है। सरकार को सुदर्शन चक्र के रूप में सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए व्यापक योजना की घोषणा करनी चाहिए। यह हिस्सेदारी कौन खरीदेगा, इस बात से बाद में निपटा जा सकता है।

Keyword: RBI, Central bank, viral acharya,
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