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ई-वे बिल की राह में हैं कई चुनौतियां

प्रतीक जैन /  September 13, 2017

उद्योग जगत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के अधीन कई तरह की फाइलिंग से जूझ रहा है। अब उसकी चिंता यह है कि ई-वे बिल कैसे काम करेगा। बता रहे हैं प्रतीक जैन

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के सबसे प्रमुख लक्ष्यों में से एक यह भी था कि सभी गैर शुल्कीय अड़चनों, मसलन चेक पोस्ट, प्रवेश शुल्क आदि को समाप्त किया जाएगा ताकि विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर वस्तुओं का आवागमन आसान हो सके। ऐसा होने पर आपूर्ति शृंखला को अधिक सुगम बनाने में मदद मिलती।
जीएसटी लागू होने के बाद 20 से अधिक राज्यों ने पहले ही चेक पोस्ट खत्म कर लिए हैं। इससे वस्तुओं की आवाजाही के समय में 30 से 40 फीसदी का सुधार हुआ है। यह कारोबारियों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए भी अच्छी खबर है क्योंकि इससे जिंसों की कीमतों में काफी कमी आएगी।
बहरहाल, उद्योग जगत इस बात को लेकर काफी चिंतित है कि एक बार सरकार द्वारा ई-वे बिल की व्यवस्था लागू करने के बाद इसमें बदलाव आ सकता है। जीएसटी परिषद ने 5 अगस्त, 2017 की बैठक में इसे मंजूरी दी थी। उसके बाद इस संबंध में नियम अधिसूचित किए गए।
हालांकि अब तक इसके क्रियान्वयन की तारीख तय नहीं हुई है लेकिन ऐसे संकेत हैं कि इसे 1 अक्टूबर, 2017 से लागू किया जा सकता है। तब तक राज्यों को यह इजाजत दी गई है कि वे अपने-अपने वे बिल, रोड परमिट सिस्टम का पालन करें। इसमें वे तरीके भी शामिल थे जो 1 जुलाई, 2017 से पहले अपनाए जाते रहे। संक्षेप में कहा जाए तो प्रस्तावित नियमों के तहत परिवहनकर्ता को एक इलेक्ट्रॉनिक रूप से बने वे बिल या परमिट की आवश्यकता होती है। 50,000 रुपये से अधिक मूल्य वाले हर माल के साथ ऐसा बिल आवश्यक है। शायद कृषि जिंसों को इससे कुछ रियायत दी गई है।
ई-वे बिल को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सरकारी पोर्टल पर तैयार किया जा सकता है। वस्तुओं के आवागमन के पहले यह काम आपूर्तिकर्ता या माल पाने वाला दोनों कर सकते हैं। माल ढुलाई वाला ट्रांसपोर्टर भी इसे तैयार कर सकता है। इसके पहले आपूर्तिकर्ता को ट्रांसपोर्टर की कुछ जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप से देनी होती है। जहां कई तरह की चीजें एक साथ ढोई जानी हों वहां ट्रांसपोर्टर को एक समेकित ई-वे बिल बनाना होगा जिसमें सारा ब्योरा एक साथ हो।
एक बार ई-वे बिल बन जाने के बाद यह 100 किलोमीटर तक की ढुलाई के लिए एक दिन और उसके बाद प्रति 100 किमी हर दिन के हिसाब से वैध होता है।
अगर ई-वे बिल बना लिया गया लेकिन वस्तुओं का परिवहन नहीं हुआ या बिल में दिए गए ब्योरे के मुताबिक वस्तुओं को नहीं ढोया गया है तो इसे इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ही रद्द करना होगा। इसके अलावा अगर ट्रांसपोर्टर वस्तुओं को एक वाहन से दूसरे वाहन में स्थानांतरित करता है तो उसे एक नया ई-वे बिल तैयार करना होगा। तभी वह अपना सामान आगे ले जा सकेगा।
ट्रांसपोर्टरों को यूनीक रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन डिवाइस (आरएफआईडी) की भी आवश्यकता पड़ सकती है। इसे वे अपने वाहन पर लगा सकते हैं और वस्तुओं की आवाजाही के पहले इसे आरएफआईडी से जोड़ा जा सकता है।
यह बात ध्यान देने वाली है कि ई-वे बिल की आवश्यकता अंतरराज्यीय परिवहन में भी पड़ती है, बशर्ते कि यह 10 किमी की सीमा से अधिक दूरी पर हो। पहले ऐसा नहीं था। इतना ही नहीं कई ऐसे राज्य भी थे जिनके यहां पुरानी व्यवस्था में वे बिल की कोई प्रणाली ही नहीं थी।
उद्योग जगत अभी नई प्रणाली से तालमेल बिठाने और कई तरह की फाइलिंग से निपटने में लगा है। उसे यह चिंता है कि पता नहीं ई-वे बिल व्यवस्था किस तरह काम करेगी और इससे क्या चुनौतियां सामने आएंगी?
पहला सवाल तो यह है कि हमें ई-वे बिल की जरूरत ही क्या है? वैट व्यवस्था में इस दलील की गुंजाइश ज्यादा थी कि राज्य सीमा पार गतिविधियों की निगरानी करना चाहेंगे क्योंकि उन्हें बिक्री पर वैट वसूलना होता था। इसके अलावा कई ऐसे राज्य भी थे जिन्होंने प्रवेश शुल्क और रोड परमिट की व्यवस्था कायम की थी ताकि बेहतर कर संग्रह हो सके।
जीएसटी के अधीन यह समस्या काफी हद तक हल हो चुकी है। अब जीएसटीएन में काफी हद तक काम इलेक्ट्रॉनिक हो चुका है और जीएसटी में राज्य की हिस्सेदारी उस राज्य की होती है जहां माल पहुंचता है। चाहे जो भी हो लेकिन ट्रांसपोर्टर को आमतौर पर जीएसटी इनवॉयस रखना होता है। इसमें आपूर्तिकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों का जीएसटी नंबर रहता है। इनकी सत्यता की जांच आसानी से ऑनलाइन तरीके से की जा सकती है।
दूसरा मसला है वैट दरों के मनमाने की वजह से व्यापारिक पथांतरण का। जीएसटी दरों की एकरूपता की वजह से यह भी समाप्त हो चुका है। इस परिदृश्य में एक मजबूत नजरिया यह भी है कि ई-वे बिल सीमित काम ही कर पाएगा। कम से कम कर अनुपालन की दृष्टिï से तो यही कहा जा सकता है।
अगर इसका उलटा भी हो तो प्रस्तावित व्यवस्था समय से काफी आगे प्रतीत होती है। इसमें यह मान कर चला जा रहा है कि प्रौद्योगिकी के मामले में एक खास स्तर की परिपक्वता हासिल कर ली गई है। उदाहरण के लिए परिवहन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित है और शायद वह इस तकनीक संपन्न बदलाव का अनुपालन न कर पाए। इसके अलावा यह व्यवस्था बहुत सख्त और जटिल प्रतीत होती है।
आखिरी बात यह है कि फिलहाल उद्योग जगत इस बात को लेकर शंकालु है कि हालात उसे इंसपेक्टर राज की ओर ले जा सकते हैं और साथ ही वैसे भ्रष्टïाचार की ओर भी। जबकि जीएसटी से उम्मीद की गई थी कि वह इसका उन्मूलन करेगा। जाहिर सी बात है कि ई-वे बिल को लेकर और अधिक विस्तृत अध्ययन और जानकारी की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही सरकार और करदाताओं दोनों के लिए बेहतर स्थिति बनेगी। चाहे जो भी हो लेकिन ई-वे बिल को हड़बड़ी में पेश किया जाना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
संक्षेप में कहा जाए तो इस नई व्यवस्था से जो लाभ हासिल होने हैं वे तो अपनी जगह हैं लेकिन परिचालन संबंधी चुनौतियां और आपूर्ति क्षेत्र की बाधाएं इस लाभ को बेमानी कर सकते हैं। अगर सरकार को भी यह लगता है कि ई-वे बिल का विचार अच्छा है तो भी कहा जा सकता है कि अभी इस विचार का वक्त नहीं आया है।
(लेखक पीडब्ल्यूसी में पार्टनर एवं लीडर इनडाइरेक्ट टैक्स हैं)

Keyword: GST, Filing, e-way bill,
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