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श्रम संगठनों में सुधार की पहल को अंजाम तक पहुंचाना अहम

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  September 12, 2017

संतोष कुमार गंगवार ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार संभालने के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि वह श्रम कानूनों में सुधार की प्रक्रिया को तेज करेंगे और इस कवायद में श्रमिक संगठनों को भी शामिल करेंगे।
अगर चाहत ही नतीजों को तय करती है तो नए श्रम मंत्री अपने लक्ष्य के अलावा भी काफी कुछ हासिल कर लेंगे। लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि गंगवार से पहले भी जो लोग श्रम मंत्रालय का जिम्मा संभाल चुके हैं, वे भी इसी तरह की मंशा जताते रहे हैं। लेकिन गंगवार के पूर्ववर्ती मंत्री अपने मकसद को मनचाहे नतीजों में नहीं तब्दील कर पाए।
सच तो यह है कि किसी भी सरकार में श्रम संगठनों का मुकाबला करने का साहस नहीं रहा है। शुरुआती दौर में कुछ खुशनुमा बयानों और कभी-कभार उठाए जाने वाले कदमों के अलावा बात आगे बढ़ती ही नहीं थी। मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही 44 श्रम कानूनों को समाहित कर चार संहिताओं में सूत्रबद्ध करने की घोषणा की थी। ये संहिताएं औद्योगिक संबंध, मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाजी परिस्थितियों पर बनाई जानी थीं। लेकिन मजदूरी विधेयक संहिता के अलावा अन्य संहिताएं अभी धूल ही फांक रही हैं। मजदूरी संहिता को तो संसद में भी रखा जा चुका है। इसकी वजह बड़ी साफ है। कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि उसे श्रम-विरोधी माना जाए। इसीलिए लगातार कई सरकारों ने श्रम सुधार के विधेयक तो पेश किए लेकिन जब उनकी वजह से श्रमिकों, नियोक्ताओं और तत्कालीन सरकार के जटिल रिश्तों में तनाव पैदा होने के आसार बनने लगे तो उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए। इनमें से कई सुधारों से वास्तव में श्रमिकों के हितों की ही पुष्टि हुई रहती लिहाजा इन विधेयकों का पारित नहीं हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
मोदी सरकार की तरफ से प्रस्तावित एक संहिता का ही उदाहरण लीजिए। इसमें श्रम संगठन में बाहरी लोगों की संलिप्तता में भारी कमी करने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि बाहरी लोग अब श्रम संगठनों में कम दखल कर पाएंगे। असंगठित क्षेत्र में पहले आधी हिस्सेदारी की सीमा थी। संहिता में कहा गया है कि श्रम संगठनों में अब केवल दो बाहरी प्रतिनिधि ही रखे जा सकते हैं। अन्य सभी क्षेत्रों के लिए इसमें बाहरी लोगों को पदाधिकारी होने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पहले संगठन में एक-तिहाई या पांच पदाधिकारियों को शामिल होने की इजाजत होती थी। उसकी तुलना में संहिता ने पदाधिकारियों की संख्या में काफी कटौती कर दी है।
श्रम संगठनों के राजनीतिकरण को कम करने के लिहाज से यह काफी अच्छा कदम है क्योंकि इससे बाहरी लोगों को कामकाज का एजेंडा हाइजैक करने का मौका नहीं मिल पाएगा। ये बाहरी लोग अक्सर अपने राजनीतिक एवं आर्थिक लाभों के लिए दखलंदाजी करते हैं। राष्ट्रीय श्रम आयोग ने श्रम संगठनों में बाहरी लोगों के प्रवेश को न्यूनतम करने के लिए कई कारण गिनाए हैं। बाहरी नेतृत्व इन संगठनों के असली मकसद को कमतर करने और उनकी ताकत को कमजोर करने के अलावा व्यक्तिगत लाभों और अपने पूर्वग्रहों के चलते कई बार श्रम संगठनों के हितों के भी पार चला जाता है।
यह समझने की जरूरत है कि नेताओं ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में अपनी भूमिका को खास सशक्त नहीं किया है। कई साल पहले इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) की आम परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर चुनावों में कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों का समर्थन करने का फरमान जारी कर दिया था। लगभग वैसे ही हालात अपेक्षाकृत परिष्कृत तरीकों से अब भी बने हुए हैं। कई राज्यों में करीब दर्जन भर राजनीतिक दल किसी कारखाने के मजदूर संगठन पर कब्जे के लिए अपनी मजदूर इकाइयों के जरिये लगे रहते हैं। पिछले दशकों में क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दलों का उदय होने से ट्रेड यूनियन भी काफी विभक्त हो गई हैं जिसका असर उनकी एकता और एकजुटता पर पड़ा है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि श्रम संगठनों का राजनीतिक मकसद से प्रेरित होकर काम करने से श्रमिकों की स्थिति बेहतर करने में कोई मदद नहीं मिल पाती है। असलियत तो यह है कि यह श्रम संगठनों के विभाजन की मूल वजह है। इसके चलते श्रम संगठन कामगारों के हितों के लिए भी काम नहीं कर पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि श्रमिकों की परेशानी की मूल वजहों और उनकी मांगों का श्रमिक नेताओं की राय से सामंजस्य ही नहीं बन पाता है।
हालांकि केवल कानूनी प्रावधान कर देने भर से बात नहीं बनेगी। प्रबंधन को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी श्रमिक को जानबूझकर परेशान नहीं किया जाए। इसके अलावा अंदरूनी स्तर पर श्रमिक नेतृत्व को उभरने का मौका देने के लिए उनके नेतृत्व कौशल प्रशिक्षण की भी समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन समेत कई लोगों का मानना है कि किसी भी संगठन को अपना ढांचा तय करने और अपने सदस्यों के चुनाव का बुनियादी अधिकार है। लिहाजा किसी संगठन में बाहरी लोगों को पदाधिकारी बनाए जाने की संख्या को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इस तर्क को स्वीकार कर पाना मुश्किल है। आखिरकार श्रम संगठनों का वजूद ही इसलिए होता है कि श्रमिकों के प्रतिनिधि निकाय के तौर पर वे प्रबंधन से बात कर सकें और श्रमिक हितों को प्रभावित करने वाले मसलों को उठा सकें। अगर गंगवार श्रमिक संगठनों को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि अब वह वक्त नहीं रहा जब श्रमिकों को अपने लिए अच्छी बातों की जानकारी ही नहीं होती थी, तो वह काफी कुछ अच्छा कर जाएंगे।

Keyword: labour, reform, Santosh kumar gangwar,
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