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असहमति के अंत की घृणित परिपाटी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  09 10, 2017

गौरी लंकेश के हत्यारों को तो उनके अंजाम तक पहुंचाया ही जाना चाहिए। उनके साहस और बलिदान के बाद यह जरूरी है कि हमारी बहस अब हिंसात्मक न होकर सभ्य और सुसंस्कृत ढंग से हो।
गौरी लंकेश और उनकी हत्या के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो हम यकीनन जानते हैं। पहली बात, वह एक मजबूत वैचारिक व्यक्तित्व की धनी थीं और उदार-वाम धड़ेे की तीक्ष्ण तर्कवादी शख्सियत थीं। दूसरी बात, उनमें अपने मन की बात कहने का साहस था, वह किसी तरह की धमकी से नहीं डरती थीं। तीसरी बात, जैसा कि मौजूदा ध्रुवीकृत समाज में होता है, जो उनसे सहमत थे वे पूरी तरह सहमत थे और जो असहमत थे वे भी पूरी शिद्दत से उनका विरोध करते रहे। वैचारिक विरोधियों में से कुछ ने उनके कामों पर आरोप मढ़े तो कुछ ने उनको धमकियां दीं।
अगली बात जो हम सुनिश्चित तरीके से कह सकते हैं कि यह एक राजनीतिक हत्या है। हम न तो सोशल मीडिया पर सक्रिय मूढ़ क्लाउसेस (एक काल्पनिक फ्रांसीसी पुलिसकर्मी जो मूर्खताएं करता रहता है) हैं और न ही हममें इतनी राजनीतिक कट्टरता है कि हम आरोप-प्रत्यारोप में उलझे रहें। उसके अपने जोखिम हैं, खासतौर पर जब मामला राजनीतिक हत्याओं का हो। उस स्थिति में यह मामला राजनीतिक हो जाता है और पुलिस-न्यायालय के दायरे में चला जाता है। तब हर बदलते निजाम के साथ हालात बदलने लगते हैं। समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव, असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा के मामलों को याद कीजिए।
यहां सबसे प्रमुख बात यह है कि लोगों को अपनी राय रखने का हक है। उनको अभियान चलाने का हक है। वे दबाव बनाने, विरोध प्रदर्शन के हर उस तरीके का इस्तेमाल कर सकते हैं जो लोकतंत्र में जायज है। बशर्ते कि वे किसी भी तरह की हिंसा की गतिविधि में शामिल न हों। इसी तरह जो लोग असहमत हैं वे भी अपनी असहमति को पूरी मुखरता लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से ही सामने रख सकते हैं। किसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह अपने विचारों या मान्यताओं के लिए किसी पर हिंसा थोपे। कोई भी सुसंस्कृत समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा कि किसी नागरिक को अपने विचारों के लिए प्राण गंवाना पड़े। अगर ऐसा होता है तो हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे जहां कोई जाना नहीं चाहता। मुद्दा यही है कि किसी को उसके विचारों के लिए नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।
एक दशक पहले जब सोशल मीडिया का आगमन हुआ तो हम जैसे कई पुराने लोगों ने इसका मखौल उड़ाया और खारिज कर दिया। जबकि आज हम करोड़ों फॉलोअर्स के साथ लोगों के साथ सीधा संवाद करने में इसका इस्तेमाल करते हैं।
महात्मा गांधी से शुरुआत करें तो भारत में राजनीतिक हत्याओं का एक दौर चला है। इसमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से लेकर हिसाब किताब बराबर करने तथा वैचारिक विरोध तक की घटनाएं शामिल हैं। प्रताप सिंह कैरों, ललित नारायण मिश्र, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी कुछ ऐसे ही नाम हैं। वैचारिक रूप से बंटी हुई इस दुनिया में खासतौर पर पश्चिम बंगाल और बिहार में वाम और दक्षिण दोनों ने हत्याएं की हैं। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू नक्सली हमले में बचे और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के पिता राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा कार पर बम हमले में मारे गए। सन 1978 से 94 तक पंजाब में हजारों लोगों की हत्या हुई। इनमें हिंदी-उर्दू-पंजाबी के प्रमुख प्रकाशन समूह पंजाब केसरी समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण उसके बाद उनके बेटे रमेश चंदर और उनके लिए काम करने वाले तमाम पत्रकार, हॉकर आदि शामिल हैं।
जरनैल सिंह भिंडरांवाले का तरीका एकदम साधारण और प्रभावी था। वह स्वर्ण मंदिर में अदालत लगाता, कुछ लोगों को खड़ा करता और किसी राजनेता या बौद्धिक व्यक्ति पर छलकपट या ईशनिंदा का आरोप लगाता। वह सजा सुनाने का काम वहां मौजूद लोगों पर छोड़ देता। उसने एक राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी पर प्रतिबंध लगाया क्योंकि किसी ने उसे खालिस्तान पर केंद्रित उस बुद्धिजीवी के आलेखों का अनूदित पुलिंदा दिया था। मैंने भिंडरांवाले से पूछा था कि वह किसी बुद्धिजीवी को अपने मन की बात करने पर कैसे निशाना बना सकते हैं? मुझे जवाब मिला, 'अगर कोई आपके गुरु को शाही लुटेरा कहेगा तो आप क्या करेंगे शेखर जी?' मैंने उस संदर्भ को बार-बार पढ़ा तो मुझे पता चला कि उस लेखक ने सिखों के इतिहास की एक व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त किताब रॉबर नोबेलमेन के नाम का शातिर ढंग से शब्दानुवाद कर दिया था। वह केवल मृत्युदंड की प्रतीक्षा कर रहे थे। कई दौर की बातचीत और उदार सिख विद्वानों द्वारा समझाए जाने के बाद ही इस सजा पर पुनर्विचार हुआ। यह डराने वाला अनुभव था।
आज की तरह तब भी लक्षित हत्याओं के लिए बात को ही बहाना बनाया जाता था। मैं जिस प्रत्यक्षदर्शी की बात कर रहा हूं वह अपने धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक पद पर बैठा था। आज यही काम सोशल मीडिया कर रहा है और आपको इसके इस्तेमाल के लिए साधू, बाबा, संत या मौलाना बनने की भी आवश्यकता नहीं है। एक बार आपने ट्विटर पर लोगों को देशद्रोही, विदेशी एजेंट आदि करार देना शुरू कर दिया तो आपने किसी व्यक्ति हत्या या उसे भीड़ के हवाले करने की जमीन तैयार कर दी।
अगर एक बार किसी व्यक्ति या समूह को किसी की जान लेने की नैतिक वजह मिल गई तो बंदूक भी मिल जाएगी। लोग यह उम्मीद भी करेंगे कि बाद में राजनीति मामला संभाल लेगी और कानूनी प्रक्रिया उलझ जाएगी। तब प्रतिद्वंद्वी अपराध की राजनीति को लेकर आपस में लड़ेंगे और हत्यारा बच भी सकता है। मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस के मामले इसी दिशा में हैं। याद कीजिए सन 1978 की वह घटना जब लखनऊ से दिल्ली जाने वाले विमान को कुख्यात पांडेय बंधुओं ने अगवा किया था। वे जनता सरकार द्वारा इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। जब इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आईं तो यह मामला खत्म कर दिया गया। राजनीतिक अपराध करने वालों को न केवल अपनी गरदन बचाने में मदद मिलती है बल्कि उनको पुरस्कार भी मिलता है। गौरी लंकेश की हत्या से बहुत सीधा और सपाट सबक मिलता है। पहली बात, जांच और कानूनी प्रक्रिया को राजनीति से परे रखना चाहिए। ऐसे मामलों को सीबीआई या एनआईए या फिर ऐसे अन्य संगठनों को सौंपने की मांग को खारिज कर दिया जाना चाहिए। आदर्श स्थिति में अदालत को ऐसे मामले सीधे अपनी निगरानी में ले लेने चाहिए। हमारी अदालतों ने ऐसी तमाम नजीर पेश की हैं।
ऐसे हस्तक्षेप के लिए यह राजनीतिक हत्या बहुत महत्त्वपूर्ण है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह मामला भी चैनलों और सोशल मीडिया में उलझकर रह जाएगा। जहां या तो उनके अलग हुए भाई से तुलना की जाएगी या फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री जैसे लोग 21 बंदूकों की सलामी के औपनिवेशिक प्रतीक के साथ इसका लाभ लेंगे जबकि गौरी लंकेश होतीं तो शायद इसका मजाक उड़ातीं। सिद्घरमैया को इस बात का जवाब देना होगा कि आखिर क्यों उनकी कांग्रेस सरकार कर्नाटक के तर्कवादियों को बचाने या उनके हत्यारों को पकड़ पाने में नाकाम रही है।
अगला सबक यह है कि अपनी मौत के साथ ही शायद गौरी लंकेश ने सोशल मीडिया के जवाबदेही भरे इस्तेमाल की बहस भी खत्म कर दी। अब एक तरफ ये तो दूसरी तरफ वो की कोई गुंजाइश नहीं रह गई। कानून को अब घृणास्पद भाषण और हिंसा भड़काने पर समान कार्रवाई करनी चाहिए। इन्हें गंभीर अपराध की तरह दर्ज किया जाना चाहिए। राजनेताओं को भी सोशल मीडिया को भड़काने से बाज आना चाहिए। जुबानी ढंग से निपटना उचित है लेकिन हिंसा को कतई बरदाश्त नहीं किया जा सकता है। यहां प्रधानमंत्री को पहल करनी होगी। किसी को फॉलो करना उसके आचरण की गवाही नहीं है। यह दलील तभी तक कारगर है जब तक कि जिसे फॉलो किया जा रहा है वह कोई सार्वजनिक व्यक्ति या प्रतिद्वंद्वी हो। आपके नाम पर किसी को गाली देने वालों को फॉलो करना दरअसल उनको बढ़ावा देना है।
मीडिया और उदारवादी खेमे के लोगों के लिए सबक यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी और विचारों की आजादी सबके लिए है। क्रोध और ध्रुवीकरण के इस दौर में इन आजादियों का बचाव सार्वभौमिक होना चाहिए, न कि चुनिंदा। उदार होने का अर्थ है दूसरों से संवाद, उनकी बात सुनना न कि उनको खारिज करना। अगर ऐसा हो पाता है तो शायद हम मौजूदा बहस को गाली-गलौज और हिंसा से वापस सभ्यता के दायरे में ला पाएं।

Keyword: gauri lankesh, journalist, murder,
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