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नीतिगत अव्यवस्था!

संपादकीय /  September 10, 2017

शनिवार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की बैठक समाप्त होने के बाद कार खरीदारों के लिए मिलीजुली खबरें रहीं। छोटी कारों के खरीदारों के लिए राहत की खबर थी जबकि एसयूवी या अन्य मझोले आकार की कारों के खरीदारों को अब ज्यादा दाम चुकाना होगा क्योंकि परिषद ने अतिरिक्त उपकर लगाने का निर्णय किया। जीएसटी लागू होने के बाद यह परिषद की दूसरी बैठक थी।
कीमतों में इस बढ़ोतरी का असर त्योहारी मौसम में कार की मांग पर भी पड़ सकता है। जाहिर है कार निर्माता करों में बार-बार बदलाव से खुश नहीं हैं क्योंकि इससे उपभोक्ताओं की रुचि प्रभावित होती है और उनका आकलन गड़बड़ाता है। यह दलील सही है क्योंकि देश का वाहन उद्योग वास्तव में बार-बार नीतिगत बदलाव से प्रभावित हो रहा है।
यह बात पिछले दिनों परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के बयान से भी जाहिर हुई। उन्होंने कहा कि अगर वाहन उद्योग सन 2030 तक पेट्रोल और डीजल वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर नहीं जाता है तो उसके लिए बहुत बुरे परिणाम होंगे। गडकरी चाहते हैं कि बस, तिपहिया, दोपहिया आदि सभी वाहन इलेक्ट्रिक हो जाएं। इसमें दो राय नहीं कि प्रदूषण फैलाने वाली तकनीक से बचने की आवश्यकता है लेकिन ऐसी कठोर चेतावनी का उलटा असर हो सकता है क्योंकि इस बदलाव के लिए जरूरी नीतियां ही मौजूद नहीं हैं। वाहन उद्योग ने अन्य नीतिगत कमियों की भी शिकायत की है। मसलन, सरकार ने अब तक हाइब्रिड कारों को प्रोत्साहन दिया है लेकिन अब उसने कर बढ़ा दिया है। वाहन उद्योग उत्पादन में अचानक बदलाव नहीं कर सकता। गत वित्त वर्ष में देश में करीब 250 लाख वाहन तैयार किए गए। इनमें से 99 फीसदी डीजल-पेट्रोल से चलते हैं। मात्र अगले 13 साल में पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल अव्यावहारिक है। ऐसा इसलिए भी कि इस बदलाव के लिए मौजूदा क्षमताओं की जगह नया निवेश करना होगा। इतना ही नहीं, इसके लिए देश में समुचित बुनियादी ढांचा तैयार करना भी आवश्यक होगा। तभी इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर हम आसानी से रुख कर सकेंगे।
अतीत में भी वाहन निर्माताओं ने अचानक बीएस-4 से बीएस-6 मानक पर जाने संबंधी नीतिगत बदलाव पर नाखुशी जाहिर की थी। इतना ही नहीं कारोबारी नजरिये से भी देखें तो विनिर्माताओं का दावा है कि उनको नीतिगत अनिश्चितता से जूझना पड़ा क्योंकि सरकार अक्सर अपने ही नीतिगत बदलावों को अदालत में बचा नहीं पाती। उदाहरण के लिए एसयूवी श्रेणी के वाहनों द्वारा उत्सर्जन मानक का पालन करने पर भी अदालत ने एक खास अवधि के लिए उनको प्रतिबंधित कर दिया था। जाहिर है देश के तेजी से विकसित होते वाहन बाजार को एक व्यवस्थित नीतिगत शासन चाहिए।
इस वर्ष जुलाई में सरकार ने संसद को बताया कि 2030 तक पूरी तरह बिजलीचालित वाहन व्यवस्था अपनाने को लेकर कोई योजना नहीं है। अगर इस तरह अचानक बदलाव जारी रहे तो सबसे अधिक परेशानी निवेशकों को होगी। सरकार का यह कहना सही है कि उच्च उत्सर्जन मानक अपनाने चाहिए लेकिन आर्थिक प्रोत्साहन समेत एक व्यवस्थित खाका भी आवश्यक है। केवल उसकी मदद से ही इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। यह सच है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए 12 फीसदी जीएसटी के साथ समुचित कर प्रोत्साहन है लेकिन अभी कई सवालों के जवाब तलाशने भी आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए अगर लिथियम बैटरी को अलग से बेचा जाए तो उस पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है। आमतौर पर ग्राहकों को विकल्प मुहैया कराने के लिए दोपहिया वाहनों की बिक्री के वक्त यह बैटरी अलग से ही बेची जाती है। उसके बाद सवाल आता है कि क्या सरकार वाहनों की चार्जिंग का व्यापक ढांचा तैयार कर पाएगी? सरकार की ओर से अगर केवल धमकी दी गई तो यह नुकसानदेह हो सकता है।

Keyword: GST, council, Car, SUV,
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